दुनिया भर में व्यापक बदलाव हो रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान ने असाध्य कही जाने वाली कई बीमारियों पर काबू पा लिया है। औसत आयु बढ़ी है और तकनीक ने इलाज को पहले से कहीं अधिक आधुनिक और आसान बना दिया है। आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में महिलाएं पहले की तुलना में दीर्घायु जीवन जी रही हैं। मगर यह भी सच्चाई है कि लंबी उम्र के बावजूद महिलाओं को समय पर बेहतर चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन की हाल में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार करोड़ों महिलाएं आज भी ऐसी जिंदगी जी रही हैं, जिसमें दर्द है, उपेक्षा है, गलत इलाज है और एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था है, जो अब भी पुरुष शरीर को ‘मानक’ मान कर चलती है। दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति होने के बावजूद महिलाओं के लिए समान और संवेदनशील इलाज अब भी एक चुनौती है।
विश्व में महिलाओं की औसत आयु लगभग 73.8 वर्ष है, जो पुरुषों की औसत आयु करीब 68.4 वर्ष से अधिक है। फिर भी उनके जीवन का लगभग पच्चीस फीसद से अधिक समय खराब सेहत के साथ गुजरता है। यानी महिलाएं लंबे समय तक पुरानी बीमारियों और लगातार पीड़ा से त्रस्त रहती हैं। वे कई बार बिना इलाज या गलत निदान से भी जूझती हैं।
सवाल है कि आखिर महिलाओं के लिए अनुकूल और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं क्यों संभव नहीं हो पा रही हैं? क्यों महिलाओं और पुरुषों के लिए समान स्वास्थ्य सेवाएं विकसित नहीं की जा रही हैं? अगर इन सवालों का जवाब ईमानदारी से तलाशें, तो इस स्थिति के पीछे पितृसत्तात्मक सोच है, जिसमें महिलाओं को कमतर आंका जाता है और उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है।
शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम महिलाएं भी इससे बच नहीं पा रहीं। वे लगातार चिकित्सा पूर्वाग्रहों का सामना करती हैं। कई बार उनकी पीड़ा को ‘भावनात्मक’, ‘हार्मोन संबंधी’ या सामान्य कह कर टाल दिया जाता है। यही कारण है कि महिलाओं की सेहत का सवाल अब केवल चिकित्सा का विषय नहीं रहा, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता का सवाल भी बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की अनेक संरचनाएं महिलाओं को केंद्र में रख कर नहीं बनाई गईं। इसे केवल अस्पतालों की कमी कह कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, बल्कि यह उस सोच का परिणाम है जिसमें पुरुष शरीर को ‘सामान्य’ और महिला शरीर को ‘विशेष परिस्थिति’ मान लिया जाता है।
दुनिया भर में हृदय रोग महिलाओं की मौत की सबसे बड़ी वजहों में शामिल है, लेकिन दिल के दौरे के जिन ‘सामान्य’ लक्षणों को चिकित्सा जगत लंबे समय से पहचानता रहा है, वे अधिकतर पुरुषों के अनुभवों पर आधारित रहे हैं। महिलाओं में दिल की बीमारी के संकेत कई बार अलग रूप में सामने आते हैं। अत्यधिक थकान, मितली, सांस फूलना, पीठ या जबड़े में दर्द जैसे लक्षणों को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता।
महिलाओं में हृदय रोग का पता अक्सर देर से चलता है
यही वजह है कि महिलाओं में हृदय रोग का पता अक्सर देर से चलता है। दिल का दौरा पड़ने के बाद महिलाओं में मृत्यु का खतरा पुरुषों की तुलना में अधिक देखा जाता है। कई मामलों में उनकी शिकायतों को सामान्य मान कर अस्पताल से वापस भेज दिया जाता है, जिससे स्थिति गंभीर हो जाती है। इसी तरह माहवारी, माइग्रेन, हार्मोन असंतुलन और रजोनिवृत्ति जैसी समस्याओं को अक्सर ‘सामान्य’ कह कर टाल दिया जाता है। लाखों महिलाएं वर्षों तक दर्द सहती रहती हैं। इस कारण कई बार उनकी गंभीर बीमारियां छिपी रह जाती हैं।
अगर भारत की स्थिति पर नजर डालें, तो देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में मातृत्व पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया गया है। गर्भावस्था, प्रसव और शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाओं में सुधार भी हुआ है। जननी सुरक्षा योजना, आशा कार्यकर्ता और संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने जैसी पहलों ने सकारात्मक प्रभाव डाला है, लेकिन समस्या यह है कि महिला स्वास्थ्य को अब भी ‘मातृत्व’ तक सीमित कर दिया जाता है। जबकि एक महिला की पहचान केवल मां के रूप में ही नहीं होती। किशोरावस्था, कामकाजी जीवन, मानसिक स्वास्थ्य, वृद्धावस्था और रजोनिवृत्ति से जुड़ी उसकी जरूरतों पर अब भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।
‘द लांसेट’ में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार पिछले तीन दशकों में दुनिया भर में मातृ मृत्यु दर में कमी आई है। हालांकि हाल के वर्षों में इस सुधार की रफ्तार धीमी पड़ती दिखाई दे रही है। वर्ष 2023 में दुनिया भर में लगभग करीब ढाई लाख महिलाओं की मौत गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी जटिलताओं के कारण हुई। इससे स्पष्ट है कि आज भी अनेक देशों, विशेषकर निम्न और मध्य आय वाले देशों में मातृत्व महिलाओं के लिए जोखिम भरा है। भारत उन देशों में शामिल है जहां मातृ मृत्यु के मामले सबसे अधिक दर्ज किए जाते हैं। वर्ष 2023 में देश में करीब 24,700 महिलाओं की मृत्यु गर्भावस्था और प्रसव से संबंधित कारणों से हुई।
मानसिक स्वास्थ्य के मामले में भी महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। घरेलू दबाव, आर्थिक निर्भरता, हिंसा, सामाजिक अपेक्षाएं और लगातार श्रम उनके मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करते हैं। फिर भी बड़ी संख्या में महिलाएं अवसाद, चिंता और मानसिक थकान का इलाज नहीं करा पातीं। इसका कारण केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक सोच भी है। महिलाओं की तकलीफ को अक्सर कमजोरी, ज्यादा सोचने की आदत या घरेलू चिंता कह कर नजरअंदाज कर दिया जाता है। गांवों में स्थिति और जटिल है।
वहां स्वास्थ्य सुविधाओं की दूरी, महिला चिकित्सकों की कमी, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक संकोच मिल कर महिलाओं के लिए इलाज को कठिन बना देते हैं। कई परिवारों में पुरुष सदस्यों की बीमारी को लेकर ही चिंता की जाती है, जबकि महिलाएं तब तक इलाज नहीं करातीं, जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों से बार-बार यह बात सामने आई है कि देश में बड़ी संख्या में महिलाएं एनीमिया और कुपोषण की शिकार हैं।
ऐसे में हालात बदलने के लिए कदम उठाने होंगे। विद्यालय स्तर पर किशोरियों को स्वास्थ्य, पोषण और मानसिक स्थिति के बारे में जरूरी शिक्षा दी जानी चाहिए। माहवारी और प्रजनन स्वास्थ्य को शर्म के बजाय जब सामान्य स्वास्थ्य की तरह देखा जाएगा, तभी स्थितियां बदलेंगी। कार्यस्थलों पर महिलाओं के स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के लिए संवेदनशील नीतियां बनानी होंगी। वृद्ध महिलाओं के स्वास्थ्य को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में अधिक महत्त्व देना होगा, क्योंकि अक्सर उनकी समस्याओं को ‘उम्र का असर’ कह कर टाल दिया जाता है। हमें यह समझना होगा कि महिला स्वास्थ्य केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है।
एक अस्वस्थ महिला का असर पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। अगर महिलाएं लगातार बीमारी, थकान और मानसिक दबाव में जी रही हों, तो उसका प्रभाव अगली पीढ़ी तक जाता है। बीमार और थकी हुई महिलाओं के सहारे कोई समाज लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रह सकता। भारत ने स्वास्थ्य क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन असली प्रगति तभी मानी जाएगी जब महिलाएं केवल दीर्घायु ही नहीं बल्कि सम्मानजनक, स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जी सकेंगी।
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साम्या के दिन की शुरुआत सुबह के अलार्म से होती है और यहीं से शुरू हो जाती है उनकी भागदौड़। सुबह उठते ही किचन में नाश्ते की तैयारी करना, बच्चे का टिफन तैयार करना और फिर उसे स्कूल रवाना करके अपनी जिंदगी की दौड़ में मसरूफ हो जाना। एक हाथ में ऑफिस की फाइल और दूसरे में घर की जिम्मेदारी, यही आज की सुपरवुमेन की हकीकत है। आज के दौर में एक वर्किंग वुमेन की जिंदगी इन दो पाटों के बीच पिस रही है। सुपरवुमेन दिखने की चाहत, घर से लेकर ऑफिस तक की जिम्मेदारी ने महिलाओं के कंधों का बोझ बढ़ा दिया है। इस बोझ के तले महिलाओं की मानसिक सेहत खोखली होती जा रही है। क्या आप भी बिना किसी खास वजह के हर वक्त थकान और घबराहट महसूस करती हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक।
