एक कहावत है ‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन’। आज औद्योगीकरण की वजह से दुनिया भर में बाजार तेजी से बदलते जा रहे हैं। इसी के साथ फैशन की दुनिया में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। हम सब समाज में रहते हैं और समाज के साथ ही चलते हैं। मगर आज की सामाजिकता अपने नए स्वरूप में दुनिया के समक्ष है। आज का समाज लोगों के बजाय बाजार पर ज्यादा निर्भर होता गया है।
विज्ञापनों के संसार में पलक झपकते ही इतनी तेजी से बदलाव आ रहा है कि हमारी कौन-सी चीज कब पुराने फैशन में तब्दील हो जाएगी, इसका हमें पता भी नहीं चल पाता है। मगर कोई चीज जितनी तेजी से आती है, कई बार उतनी ही तेजी से चली भी जाती है।
अब कई जगह होटल और रेस्तरां कांच की चमचम से निकलकर ‘आपणी ढाणी’, ‘आपणो गांव’, ‘आपणी टपरी’ जैसे नामों से परंपरागत रूप से बने दिखाई देते हैं। उनकी झोंपड़ीनुमा बनावट बरबस ही गांव का अहसास करवाती है। इनमें वही गांव का खाना, फर्नीचर, सजावट और मान-मनुहार की झलक दिखाई देती है। अब पिज्जा, बर्गर और केक-बिस्कुट भी ‘मिलेट्स’ यानी मोटे अनाज के बनने लगे हैं। राजस्थान में कहा जाता है कि ‘मोटा खाना और मोटा पहनना’ सेहत के लिए अच्छा होता है।
मोटे अनाज से बने व्यंजन कोई नई चीज नहीं, वह अलग-अलग अनाजों को मिलाकर बनाए गए व्यंजन ही हैं, जो अब फैशन और सेहत की दुहाई देते हुए हमारे बीच में हैं। अब केक पेस्ट्री की जगह मोटे अनाज से बने लड्डू, मठरी, तिल की चक्की बाजार में है। ‘प्रिजर्व्ड़ कोल्ड ड्रिंक’ की जगह छाछ, नींबू पानी, कैरी पानी, जलजीरा, राबड़ी जैसे पेय लोगों की पसंद बनते जा रहे हैं।
अब मैदा की ब्रेड और मैगी आटे से भी बनने लगी है। पुराने मटके जहां घरों से गायब हो गए थे, वे अब नलके की टोंटी लगे हुए मटकों के नए रूप में सामने हैं। यह नया मटका पुराने का ही नया रूप है। घरों में बनने वाले अलग-अलग तरह के मंगोड़ी, अचार, चटनी, मुरब्बे अब बाजार में हैं। ये शुद्ध तेल मसालों में बने हुए होने का दावा करने लगे हैं।
कहीं-कहीं सरसों, तिल जैसे तिलहनों के तेल अब कच्ची घाणी के रूप में भी मिलते दिखाई देते हैं। उनमें शुद्धता और ताजा होने का दावा किया जाता है। नीम की दातुन, सहजन और देसी बबूल की पत्तियों का पाउडर, सूखी तोरई से बना ‘झांवा’ बड़ी-बड़ी महंगी दुकानों और वेबसाइटों पर नए रूप में हमारे सामने हैं।
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तुलसी और नीम की पत्तियां, जो हमारे लिए औषधि के रूप में थीं, वे आज पैकेटों में उपलब्ध हैं। रहन-सहन की बात करें, तो जहां बहुत गर्मी पड़ती है, वहां खुले वस्त्र पहनने का चलन था। राजस्थान में अब घाघरे स्कर्ट के रूप में सामने हैं और इसी तरह अन्य स्थानीय परिधान भी। अब लड़कियों के ‘बैलबाटम’ नए तरह की पैंट के रूप में बदल गए हैं। पुराने कपड़ों से बने पायदान, दरियां, शो पीस, पुरानी जींस से बने नए सामान और पुरानी साड़ियों और अन्य पुराने कपड़ों से बने डिजाइनर वस्त्र तथा अन्य वस्तुओं को बनाने के तरीकों से वेबसाइटें भरी हुई हैं।
नया सुविधाजनक हो सकता है, आधुनिक चलन या फैशन के मुताबिक लगता है, लेकिन विवाह या विशेष आयोजनों पर परंपरागत पोशाक और आभूषण पहनने का अब भी खासा चलन है। हम जिन आभूषणों को पुराना और चलन से बाहर कहकर छोड़ रहे थे, वही आज ‘दादी मां फैशन’ के रूप में सबसे बड़ा स्टाइल का प्रतिरूप बनकर चल रहा है। पुराने आभूषणों में जो गरिमा और आकर्षण है, वह नई में कहां? इसलिए विशेष अवसरों पर पुराने गहनों को आज भी महिलाएं नए के मुकाबले शान से खानदानी विरासत के रूप में पहनती हैं। महिलाएं साड़ियों पर जहां ‘ब्रोच’ लगाया करती थीं, वह आज कोट पर भी चमकता है।
कोई नया गीत, जिसकी पूरे देश में धूम मची होती है, वह जल्दी ही हर आयुवर्ग की जुबान पर चढ़ जाता है। लोग उसका अर्थ समझ पाएं, उससे पहले ही वह गीत ऐसा गायब होता है कि इस खोए गीत को याद करने के लिए भी स्मृति में बहुत ढूंढ़ना पड़ता है। पुराने गीत जिनके शब्द, भाव और संगीत की लय ऐसी थी कि आज भी वे गीत हमारी स्मृति में बने हुए हैं। पुरानी धुनों में नई धुन का तड़का भी ‘फ्यूजन’ के प्रयोग के रूप में लगाने का चलन भी नया हैस जो नए रूप में मनभावन तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है।
आज तकनीक ने विज्ञापन और बदलते बाजारों से हमारे जीवन को तेजी से बदला है, जिसमें सुविधा है, चकाचौंध है और एक हद तक किसी समस्या का हल ढूंढ़ निकालने की तकनीक है। इसने पुरानी चीजों की जगह तेजी से बदली है। मगर जो चीजें जमीन से जुड़ी थी और बहुत श्रम से बनी थीं, उनमें काफी सुकून भी था। उनमें अपनापन था और वे हमारे शरीर एवं जीवनशैली के अनुकूल थी। आज भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग सुकून और जीवन में शांति के लिए जंगलों, प्राकृतिक स्थानों और ध्यान केंद्रों की ओर रुख करने लगे हैं। बात सिर्फ नए को अपनाने से इनकार की नहीं है, बल्कि नए की अंधी दौड़ से आगे यह सोचते हुए चुनना है कि जो पुराना है, वह कितना बेहतर है। साथ ही इसमें क्या बदलना है और क्या छोड़ना है!
