उपहार या भेंट अपने आप में विशेष होता है। हम किसी मित्र या फिर बहुत ही विशेष शख्स के लिए बड़े चाव और सुकून से कुछ खास सामान खरीदते हैं और यह भी ध्यान रखते हैं कि यह पाने वाले की पसंद का हो। इसे खरीदते समय हमारे मस्तिष्क में यह जरूर चल रहा होता है कि अमुक सामान जो खास व्यक्ति के लिए खरीदा जा रहा है, वह उसकी पसंद का हो, वह उसका उपयोग करेगा। कई बार यह पसंद हमें पहले से पता होती है, तो कई बार हम खोज-बीन कर इस बात का पता लगाकर सामान खरीदते हैं। आमतौर पर कहा जाता है कि भेंट की राशि की समीक्षा नहीं की जाती। मगर गाहे-बगाहे भेंट के सामान और उनकी उपयोगिता की समालोचना हम कर ही लेते हैं। सबसे बड़े उदाहरण के तौर पर शादियों, जन्मदिन या अन्य ऐसे आयोजनों पर प्राप्त उपहार की बात करें, तो आयोजन की समाप्ति के बाद प्रत्येक उपहार को खोलकर उसे देखने की उत्सुकता अलग ही होती है। भेंट एक तरह से ऐसे आयोजनों का एक अनिवार्य घटक है, जिसके बगैर आयोजन की पूर्णता अधूरी समझी जाती है।
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भेंट में औपचारिकताओं और भावनाओं के अलग-अलग स्तरों का समावेश होता है। अक्सर रिश्तेदारों या मित्रों के यहां मिलने जाने से पहले कुछ सामान हम साथ ले जाने के लिए खरीद लेते हैं और यह भी जेहन में रखते हैं कि अगर उनके घर में बच्चे हों तो भेंट का स्वरूप हम क्या रखें। पुराने दिनों में गांव में यह परिपाटी हुआ करती थी कि किसी रिश्तेदार के यहां कोई महिला या बच्चे या फिर अन्य सदस्य साथ आते थे, तो उनकी विदाई से पहले उनके लिए खास कपड़े खरीदे जाते थे। बगैर नए कपड़ों के उन्हें विदा नहीं किया जाता था। यह एक तरह से सम्मान से भी जुड़ी बात होती थी।
हमारे समाज में भेंट का एक स्वरूप और रिवाज यह भी है कि मान लीजिए कि हम किसी बर्तन में अपने जानने वाले को कुछ पकवान देते हैं और यह मानकर कि वह बर्तन हमें पकवान खाली कर वापस कर दिया जाएगा। मगर ऐसा अमूमन होता नहीं है कि वह बर्तन हमें खाली अवस्था में मिले। बदले में हमें यह बर्तन कुछ सामान से भरा हुआ ही मिलता है। अब यह रिवाज हमें किसी किताब में पढ़ाई नहीं गई है, न ही स्कूलों में भेंट संबंधी किसी अध्याय को शामिल किया गया है, लेकिन हमारे सामाजिक ताने-बाने में यह चीज गहराई से रम गई है कि हम इस परंपरा का पालन जरूर करते हैं।
वास्तव में भेंट किसी अवसर विशेष में बंधा नहीं होता है, न ही इसकी कोई सीमा तय है। अब किसी के यहां किसी दूर प्रदेश से कोई अपना मिलने आता है, तो हम शहर विशेष की कोई खास और प्रसिद्ध चीज उन्हें भेंट करते हैं और वापसी की यात्रा के समय यह भी ध्यान में रखते हैं कि यात्रा में उन्हें किसी जरूरी सामान की कमी न हो। उनकी इस परेशानी को दूर करने के लिए हम हर संभव छोटी-मोटी चीजों से उनका थैला भर देते हैं। ऐसे में मेहमान को सौंपे गए ये सामान भी भेंट की श्रेणी में ही माने जाते हैं। साथ जाने वाले ये भेंट हमारे एहसास को भी साथ-साथ लिए चलते हैं।
इसके अलावा, हम जब कभी नई जगह पर सैर-सपाटे के लिए निकलते हैं, तो वहां के प्रसिद्ध खान-पान, पहनावे, उपयोग की चीजें भी अपने मुताबिक खरीदते हैं, पर हमारी यह खरीद स्वयं तक सीमित नहीं होती। हम अपने परिवारजनों, मित्रों आदि के लिए भी खरीदारी करते हैं। ऐसे में कई बार हमारा सामान रखने का थैला भी हमारे ढोने की क्षमता से बाहर हो जाता है, पर हम इस वजन की परवाह ही कब करते हैं। भेंट किए जाने वाले ऐसे उपहारों में हमारी भावनाएं भी जुड़ी होती हैं, जो हमारे सामान के वजन को कम कर देती हैं या इसे साथ ले जाने की हमारी क्षमता को बढ़ा देती हैं। एक बात और कहा जा सकता है कि इन वस्तुओं को सही सलामत ले जाने की जितनी फिक्र हमें होती है, यह साथ ले जाने वाला व्यक्ति ही समझ सकता है कोई और नहीं।
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खुद से खरीदे गए उपहार की बात ही अलग होती है। इसमें हम धन से अधिक किसी के लिए अपने समय और विवेक को समर्पित करते हैं। उपहार अपेक्षाओं से परे भी होते हैं और अमूमन आश्चर्यजनक सुखद अनुभव भी दे जाते हैं। हम किसी खास व्यक्ति को ही उपहार देना पसंद करते हैं और वह भी उनसे कुछ पाने की इच्छा के बगैर।
पर हमारे जीवन में कुछ ऐसे भी अति विशेष क्षण आते हैं, जब हमारे द्वारा दिए गए उपहार के बदले हमें एक अलग रूप में इसी तरह कुछ नवाजा जाता है, तो यह स्वयं में एक पूर्णता के भाव का सृजन करता है, जिसे शब्दों में बयां करना किसी दौर में संभव नहीं होता है। ऐसे क्षण जीवन के विशेष पल के रूप में याद की तरह बस जाते हैं और उम्र भर के लिए घर कर जाते हैं। इस तरह से मानव जीवन में उपहार का सरोकार समय और किसी भी मोल से परे है। बंधनों को मजबूत करते उपहार प्राचीन समाज से लेकर कारपोरेट जगत रूपी समाज में भी उतने ही प्रचलित और आपसी समन्वय को बेहतर करने के माध्यम हैं।
