हमने पढ़ना तो सीख लिया है, लेकिन सावधानी और चेतावनी के संकेतों को समझना एवं उन्हें गंभीरता से लेना अभी भी नहीं सीख पाए हैं। तंबाकू उत्पादों पर डरावनी तस्वीरों के साथ चेतावनी लिखी होती है, मगर उन पर शायद ही कोई ध्यान देता है। अगर नजर पड़ भी जाए, तो उसे अनदेखा कर दिया जाता है। यह कहना उचित नहीं है कि तंबाकू उत्पादों की लत सिर्फ व्यक्तिगत समस्या है, बल्कि इससे समाज भी प्रभावित होता है।
तंबाकू का सेवन करने वाले सड़कों, दीवारों से लेकर हर कोने-कूचे में गंदगी फैलाने से परहेज नहीं करते। यह किसी एक व्यक्ति की असभ्यता का प्रमाण नहीं, बल्कि सामूहिक विफलता का द्योतक है। यह उस नीति और व्यवस्था का प्रतीक है, जो चेतावनी तो देती है, पर रोकने का साहस नहीं जुटा पाती। यह उस समाज का दर्पण है, जो खतरे को जानता है, पर आदत और सुविधा के आगे घुटने टेक देता है।
यह विचित्र विडंबना है कि तंबाकू उत्पादों के पैकेट पर ऐसी भयावह तस्वीरें होती हैं, जिन्हें देखकर कोई व्यक्ति सिहर उठे और अपनी आंखें मींच ले। मगर तंबाकू का सेवन करने वालों पर इसका कोई असर नजर नहीं आता है। ऐसे में चेतावनी का कितना महत्त्व है, इस पर तो सवाल उठता ही है, लेकिन व्यवस्था की चुप्पी उससे कहीं अधिक खलती है।
विभिन्न अध्ययनों के मुताबिक, भारत में तंबाकू हर साल लगभग तेरह लाख लोगों की जान लेता है। मुख के कैंसर के मामलों में भारत दुनिया में अग्रणी देशों में गिना जाता है और इसका सबसे बड़ा कारण चबाने वाला तंबाकू है। ये केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि टूटते परिवारों, अधूरे सपनों और उन चेहरों की अधूरी कहानियां हैं, जो धीरे-धीरे अपनी पहचान खो देते हैं।
सरकारी अस्पतालों के कैंसर वार्ड में भर्ती हर वह आदमी, जो स्वयं को देखने से बचता है, मात्र एक मरीज नहीं है। वह उस पूरे तंत्र की विफलता को दर्शाता है, जो वर्षों तक उसे सस्ता नशा उपलब्ध कराता रहा, पर उससे बाहर निकलने का कारगर रास्ता नहीं दे सका। सिनेमा हाल में दिखाए जाने वाले तंबाकू निषेध संबंधी विज्ञापनों को याद किया जा सकता है। इसके दृश्य इतने वितृष्णापूर्ण होते हैं कि हम असहज होकर आंखें फेर लेते हैं। यानी हम जिस सच्चाई को एक क्षण नहीं देख पाते, उसी सच्चाई को कुछ लोग अपने नियमित जीवन में जीते रहते हैं।
सवाल है कि जब परिणाम इतने गंभीर हैं, तो तंबाकू उत्पादों पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही? क्या इन उत्पादों पर चेतावनियां चस्पां कर देना ही पर्याप्त है? और क्या इस तरह की चेतावनी का जमीनी स्तर पर कोई असर हो भी रहा है? यह स्थिति किसी ऐसे जहर की बोतल जैसी है, जिस पर ‘स्वास्थ्य के लिए हानिकारक’ की चेतावनी तो लिखी है, फिर भी उसे सहजता से खुले बाजार में बेचा जा रहा है। क्या उत्तरदायित्व के निर्वाह का यही एक औपचारिक तरीका है कि चेतावनी चस्पां कर दीजिए और फिर सब कुछ सामान्य रूप से चलने दीजिए।
तंबाकू उत्पादों के प्रति आकर्षण सावधानी से रचा गया एक भ्रम है। ऐसा भ्रम जो इसके रंगीन पैकेट और सुगंधित स्वाद की थोथी छवि में छिप जाता है। यही वजह है कि इसकी सामाजिक स्वीकार्यता बनी हुई है।
हालांकि, तंबाकू उत्पादों की खरीद एवं बिक्री के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन उनका प्रभाव भी कागजों में ही सिमट कर रह जाता है। ये उत्पाद रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, सरकारी कार्यालयों एवं अस्पतालों के बाहर और विद्यालयों के आसपास आसानी से मिल जाते हैं। यह सच है कि जब कोई वस्तु हर जगह दिखाई देने लगे, तो उस पर प्रश्न उठना स्वतः ही बंद होने लगता है और यही सबसे संकटपूर्ण स्थिति है।
यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट है, जो हमारी स्वास्थ्य-व्यवस्था पर सवाल उठाता है। हम जानते हैं कि इस समस्या की जड़ किसी लत में नहीं, बल्कि एक जटिल आर्थिक और नीतिगत ढांचे में भी छिपी है।
तंबाकू उद्योग से लाखों किसान, श्रमिक और छोटे दुकानदार जुड़े हैं। सरकार को इससे हर वर्ष बड़े पैमाने पर राजस्व मिलता है। यानी एक तरफ स्वास्थ्य का संकट है, दूसरी तरफ आर्थिक निर्भरता। इसी द्वंद्व के कारण सरकारी नीतियां आधा रास्ता तय करने के बाद इसी चौराहे पर आकर ठहर जाती हैं।
कुछ राज्यों ने तंबाकू उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने की पहल की है, लेकिन वह भी पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रही है। कहीं चोरी-छिपे इन उत्पादों की बिक्री हो रही है, तो कहीं तंबाकू उत्पाद नाम और रूप बदलकर फिर बाजार में लौट आते हैं। यानी समस्या समाप्त नहीं होती, सिर्फ अपना चेहरा बदल लेती है।
यह तर्क भी दिया जाता है कि तंबाकू उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध से उसका अवैध बाजार बढ़ेगा। इस आशंका का तार्किक आधार हो सकता है, लेकिन क्या इस डर के कारण हम समस्या को जस का तस स्वीकार कर लें? क्या यह इस तथ्य की स्वीकारोक्ति नहीं कि हम समाधान से ज्यादा उसकी कठिनाई से डर रहे हैं?
सच तो यह है कि समाधान किसी एक निर्णय में नहीं, बल्कि कई स्तरों पर एक साथ काम करने में निहित है। सर्वप्रथम उत्पादन और वितरण पर कड़ा नियंत्रण करना होगा। इसके साथ ही तंबाकू किसानों के लिए वैकल्पिक आजीविका के ठोस विकल्प तलाशने होंगे। नशा मुक्ति केंद्रों की सुलभता और उनकी सामाजिक स्वीकार्यता के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास करने होंगे।
सबसे महत्वपूर्ण यह समझना है कि तंबाकू सेवन के दुष्प्रभाव को लेकर जागरूकता केवल विज्ञापन या चेतावनियों से ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक स्तर पर फैलानी होगी। क्योंकि जब कोई बड़ी शख्सियत या प्रभावशाली चेहरा स्वयं तंबाकू का सेवन करता है, तो उसका हर संदेश फीका और कमजोर पड़ जाता है। आचरण और संदेश के बीच की यह दूरी भरोसे को धीरे-धीरे खत्म कर देती है।
जब कोई व्यक्ति तंबाकू उत्पादों की लत का शिकार होता है, तो उसका असर केवल उसके शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार और आसपास के अन्य लोगों पर भी इसका प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। तंबाकू के सेवन से होने वाली बीमारी के इलाज का खर्च, मानसिक तनाव, रोजमर्रा की अनिश्चितता और कई बार असमय मृत्यु का सामना, यह सब एक परिवार को मानसिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर कर देता है।
तंबाकू के सेवन का अभ्यस्त व्यक्ति उसी समाज का हिस्सा होता है, जो उसे यह लत तो देता है, पर उससे बाहर निकलने के लिए पर्याप्त सहारा नहीं देता। कई बार यह लत कठिन श्रम, तनाव और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ी होती है। मगर यह भी उतना ही सच है कि कठिन परिस्थितियों में नशीले पदार्थों का सहारा लेना समस्या का हल नहीं हो सकता। इसलिए समाधान दोषारोपण में नहीं, बल्कि साथ खड़े होने में है।
‘स्वच्छ भारत’ अभियान को केवल झाड़ू लगाने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसमें बुरी आदतों को सुधारने, स्वस्थ मानसिकता से जीने और नशे से दूर रहने के पहलुओं को शामिल करने की भी जरूरत है। मगर व्यवस्था की चुप्पी इस तथ्य को कब जनता के सामने स्थापित करेगी, यह देखने वाली बात है।
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आमतौर पर नशा न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि मानसिक और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है। यह आदत कब लत में तब्दील हो जाए, पता नहीं चलता। आदत को एक सकारात्मक अवधारणा के तौर पर देखा जाता है, जबकि लत या व्यसन एक नकारात्मक अवधारणा है। यह एक मनोविकार है, क्योंकि जिस नशे के सेवन की लत लग जाए, उसके बिना जीवन की निरंतरता असंभव दिखाई देती है। आदत बदलना संभवत: आसान हो सकता है, पर लत से पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल लगता है। चिकित्सक भी मानते हैं कि नशीले पदार्थों का सेवन अनेक बीमारियों की जड़ है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
