एक दिन एक बच्चा अपने पिता के साथ बाजार गया। बाजार में चलते-फिरते उसकी नजर खिलौनों की दुकान पर पड़ी। दुकान के बाहर ही प्लास्टिक की एक बंदूक सजी लटक रही थी। बंदूक देख कर उससे रहा नहीं गया। वह अपने पिता से बंदूक लेने की जिद करने लगा। काफी देर तक टालने और मना करने पर भी न मानने के बाद पिता ने उसे बंदूक खरीद दी।
वह बच्चा घर पहुंचा, तो उसने सबसे पहले अपनी मां को बंदूक दिखाई और बोला, ‘ममी, इस बंदूक पर मेरे सपने टिके हैं!’ सुन कर मां घबरा गई कि बेटा क्या कह रहा है। वह सोचने लगी कि कहीं उसका बच्चा बड़ा होकर चोर-डकैत तो नहीं बन जाएगा! फिर शाम होते ही वह अपनी खिलौना-बंदूक लेकर गली-मुहल्ले के अपने यार-दोस्तों पर रोब जमाने लगा। एक मित्र ने समझाया, ‘यार, बंदूक भी कोई पसंद करता है? यह किस काम की है? कुछ लेना ही था, तो क्रिकेट का बल्ला और गेंद लेता। खेलते-खेलते खिलाड़ी बन जाता।’
फिर उसने साफ-साफ पूछा, ‘भई, तुमने बंदूक ली ही क्यों?’ बच्चा जब समझाने लगा तो कहा- ‘मैंने बंदूक यह सोच कर ली है कि मैं बड़ा होकर सेना में जाऊंगा और देश की रक्षा करूंगा।’ सुन कर दोस्त हक्का-बक्का रह गया! जब उसकी मां को पता चला कि उसका बच्चा ऐसा सोचता है, तो उसका भी सिर गर्व से ऊंचा उठ गया।
क्रोध बन जाता है विनाश की आग, मन की गहराइयों में छिपे भाव को समझने की जरूरत है | दुनिया मेरे आगे
ओशो के शब्द हैं, ‘उस मां को, उस पिता को, मैं सच्चा माता-पिता कहता हूं और उस गुरु को, मैं सच्चा गुरु कहता हूं, जो अपने बच्चों और शिष्यों से कहे कि तुम खुद जैसे बनने की कोशिश करना। साथ ही, कभी भूल कर भी किसी और जैसे मत बनना। तो तुम्हारे भीतर एक सुगंध, एक सौरभ, एक गरिमा पैदा होगी, जिसके लिए तुम दुनिया में आए हो।’
आमतौर पर, ऊपर-ऊपर से देख-सुन कर हर कोई अपने मन में किसी के बारे में धारणा बुन लेता है। मिसाल के तौर पर, अगर कोई युवा बेरोजगार तेज धार का चाकू खरीद लाए, तो उसे देखने वाले लोगों के दिमाग में पहला खयाल जरूर कौंधेगा कि चाकू से कुछ ‘गलत’ काम करने का इरादा होगा। बेशक उसकी ऐसी सोच हरगिज न रही हो। हो सकता है कि उसने अपने घर पर फल और सब्जियां काटने के लिए चाकू खरीदा हो।
इसी तरह एक बार एक घरेलू सहयोगी नरेश चूहे मारने की टिकिया लेने मुहल्ले की परचून दुकान पर गया। उसने दुकानदार की तरफ सौ रुपए का नोट बढ़ाया और कहा, ‘भैया, एक फलां कंपनी की चूहे मारने की टिकिया दीजिए।’ दुकानदार ने उससे जानना चाहा कि इसका क्या करोगे, तो वह बिना जवाब दिए, गुमसुम दुकानदार को ताकता रहा। शायद उसे दुकानदार से ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी। दुकानदार ने उसे चूहे मारने की टिकिया देने से मना कर दिया। नरेश खाली हाथ घर लौट आया और अपने साहब से बोला कि दुकानदार ने पता नहीं क्यों उसे देने से इनकार कर दिया है। जबकि कई टिकियां सामने ही रखी हुई थीं। साहब नरेश को परचून की दुकान पर दुबारा ले गए। इस बार साहब ने वही टिकिया मांगी, तो दुकानदार ने बिना कुछ कहे-पूछे निकाल कर सामने रख दी।
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साहब ने दुकानदार से जानना चाहा कि आपने नरेश को क्यों नहीं दी, तो दुकानदार बोला कि नरेश मुझे बता नहीं पाया कि इसका करेगा क्या! अगर वह कहता कि घर में उससे चूहे भगाने हैं, तो मैं फौरन दे देता, लेकिन वह खामोश रहा। इसलिए दुकानदार को संदेह हुआ कि छोटू का इरादा कुछ ‘गलत’ करने का है। यानी कहीं खुद खा ली, तो वह दुकानदार ही फंस जाएगा।
यह भी सच है कि मन में विचार रखने या महज इरादा होना, तब तक अपराध नहीं माना जाता, जब तक उसे अंजाम न दिया जाए। सड़क पर सफर के दौरान वाहनों का जाम लग जाने की सूरत में अगर कोई मन ही मन जल्दी पहुंचने के लिए उल्टी तरफ से जाना चाहे, तो कोई यातायात पुलिसकर्मी उसका चालान नहीं काटेगा, क्योंकि वह केवल चाह रहा है, उल्टी तरफ से गया नहीं है। जबकि अगर उसके मन में विचार उत्पन्न हो, और वह सचमुच गलत तरफ अपना वाहन ले जाए, तब कानून तोड़ने के जुर्म में फंसेगा। कहने का आशय यह कि सिर्फ चाहने या सोचने से किसी काम का हो जाना नहीं मान लिया जा सकता, जब तक कि वह वास्तव में घटित होता हुआ न दिखे।
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वास्तव में, हर व्यक्ति में पूर्ण क्षमता है, चाहे तो वह कल्पना से भी ज्यादा नीचे गिर जाए और चाहे जितना भी ऊपर उठ जाए। मगर ऊपर उठने में चढ़ाई है और चढ़ाई में मेहनत लगती है। साथ ही चढ़ाई मेहनत के साथ सब्र मांगती है। चूंकि नीचे उतरने में ढलान है, बिना श्रम, जल्दी और आसानी से नीचे आ सकते हैं। इसलिए ज्यादातर व्यक्ति कानून तोड़ने का आसान रास्ता अपनाते हैं। इसके अलावा, नीचे उतरना हमेशा आसान लगता है। यों भी, भीड़ के पीछे चलना आसान है, क्योंकि वहां अपना दिमाग नहीं लगाना पड़ता।
व्यक्ति जो भी आज है- अपने विचारों, भावों और कर्मों का जोड़ है। हर किसी का चरित्र अतीत की पूरी श्रृंखला से बनता और बिगड़ता है। इसीलिए पहली गलती पर अमूमन माफ कर दिया जाता है, लेकिन एक के बाद दूसरी, फिर तीसरी, चौथी और गलतियों की पूरी एक श्रृंखला बन जाने के बाद माफी की गुंजाइश जाती रहती है।
