समय बदलता है, तो उसके साथ सफलता की परिभाषाएं भी बदल जाती हैं। एक समय था, जब किसी व्यक्ति की सफलता उसके चरित्र, ज्ञान, ईमानदारी और समाज के प्रति उसके योगदान से आंकी जाती थी। गांव में सबसे सम्मानित व्यक्ति वह होता था, जो न्यायप्रिय हो। शहर में वही प्रतिष्ठित माना जाता था, जिसकी वाणी और व्यवहार पर लोग विश्वास करते थे। धन आवश्यक था, पर सम्मान का एकमात्र आधार नहीं था।

आज परिदृश्य बदल चुका है। सफलता का नया गणित तैयार हो गया है, जिसमें समीकरण कुछ यों दिखाई देता है- जितना अधिक धन, उतनी अधिक प्रसिद्धि-जितनी अधिक प्रसिद्धि, उतनी अधिक सफलता। इस गणित में चरित्र का स्थान धीरे-धीरे हाशिये पर खिसकता जा रहा है।

आधुनिक समाज ने उपलब्धियों की चमक को इतना बढ़ा दिया है कि उपलब्धि तक पहुंचने का रास्ता अक्सर दिखाई नहीं देता। किसी युवा से पूछा जाए कि वह जीवन में क्या बनना चाहता है, तो बहुत-से उत्तरों में एक बात समान मिलेगी- ‘मुझे मशहूर होना है।’ यह कम लोग बताते हैं कि वे किस क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहते हैं।

प्रसिद्धि साध्य नहीं, साधन होनी चाहिए थी, लेकिन आज वही लक्ष्य बनती जा रही है। बाजार ने इस सोच को और तीखा बना दिया है। विज्ञापन हमें लगातार बताते हैं कि महंगी घड़ी, आलीशान घर, विदेशी कार और ब्रांडेड वस्त्र ही सफल जीवन के प्रमाण हैं। सोशल मीडिया इस भ्रम को प्रतिदिन पुष्ट करता है। मगर कैमरे की रोशनी अक्सर संघर्षों की परछाइयों को छिपा देती है।

आर्थिक सुरक्षा मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाती है, परिवार का भविष्य संवारती है और समाज में अनेक अवसर उपलब्ध कराती है। समस्या धन से नहीं, धन के प्रति दृष्टि से है। जब धन साधन से बढ़कर जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है, तब नैतिकता धीरे-धीरे बोझ लगने लगती है। फिर ईमानदारी की जगह चतुराई, सेवा की जगह स्वार्थ और धैर्य की जगह संक्षिप्त रास्ते लेने लगते हैं।

इसी प्रकार प्रसिद्धि भी अपने आप में बुरी नहीं है। किसी वैज्ञानिक की खोज, किसी लेखक की रचना, किसी खिलाड़ी का अनुशासन या किसी कलाकार की साधना अगर उसे प्रसिद्धि दिलाती है, तो वह समाज की उपलब्धि है, लेकिन जब प्रसिद्धि बिना सार्थक उपलब्धि के केवल प्रदर्शन पर टिकने लगे, तब समाज का मूल्यबोध बदलने लगता है।

सबसे अधिक चिंता चरित्र के बदलते स्थान को लेकर है। चरित्र कोई ऐसा आभूषण नहीं, जिसे अवसर देखकर पहना और उतार दिया जाए। यह तो मनुष्य का वह मौन परिचय है, जो तब भी साथ रहता है, जब कोई देख नहीं रहा होता। दुर्भाग्य से आज चरित्र का मूल्य सफलता मिलने के बाद याद किया जाता है। अगर व्यक्ति धनी और प्रसिद्ध है, तो उसके दोषों को भी उपलब्धियों के नीचे दबा दिया जाता है।

दूसरी ओर, साधारण जीवन जीने वाला ईमानदार व्यक्ति कई बार समाज की दृष्टि से ओझल रह जाता है। युवा ऐसे दौर में बड़े हो रहे हैं, जहां सफलता का मूल्यांकन क्षणभर में होता है। किसी पोस्ट पर आए ‘लाइक’, किसी वीडियो को देखने वालों की संख्या और किसी नाम के ‘फॉलोअर्स’ ही मानो उपलब्धि के प्रमाणपत्र बन गए हैं। ऐसे वातावरण में यह समझाना कठिन होता जा रहा है कि जीवन की सबसे बड़ी सफलताएं अक्सर आंकड़ों में नहीं मापी जा सकतीं।

इतिहास इस संदर्भ में बहुत बड़ा शिक्षक है। धन की चमक समय के साथ धूमिल हो जाती है, प्रसिद्धि का शोर भी एक दिन शांत पड़ जाता है, पर चरित्र की सुगंध पीढ़ियों तक बनी रहती है। यही कारण है कि समाज आज भी उन लोगों को श्रद्धा से याद करता है, जिन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए कठिनाइयां स्वीकार कीं, लेकिन अपने मूल्य नहीं छोड़े।

शिक्षा व्यवस्था भी इस परिवर्तन के बीच खड़ी है। अगर विद्यालय केवल अंक देना सिखाएं और घर केवल प्रतिस्पर्धा, तो चरित्र निर्माण का कार्य कौन करेगा? बच्चों को यह बताना होगा कि सफलता केवल आगे निकलने का नाम नहीं, बल्कि सही रास्ते पर चलते हुए आगे बढ़ने का नाम है।

सवाल है कि क्या हम अपने बच्चों से यह पूछते हैं कि वे अच्छे इंसान बन रहे हैं या केवल अधिक कमाने वाले? क्या हम समाचारों में चरित्रवान लोगों की चर्चा उतनी ही रुचि से करते हैं, जितनी चर्चित लोगों की? जब तक समाज स्वयं अपने आदर्श नहीं बदलेगा, तब तक सफलता का नया गणित भी नहीं बदलेगा।

वास्तव में सफलता का सही सूत्र तीनों तत्त्वों के संतुलन में है। धन हो, क्योंकि वह जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करता है। प्रसिद्धि हो, अगर वह परिश्रम और प्रतिभा का परिणाम हो, लेकिन इन दोनों के केंद्र में चरित्र अवश्य हो। वही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखता है। धन बिना चरित्र के अहंकार बन सकता है, प्रसिद्धि बिना चरित्र के भ्रम बन सकती है, पर चरित्र ऐसा धन है, जो विपत्ति में भी साथ नहीं छोड़ता।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि हम धन या प्रसिद्धि का विरोध करें, बल्कि यह सुनिश्चित करें कि वे चरित्र के अधीन रहें, उसके ऊपर नहीं। जिस दिन समाज सफलता का मूल्यांकन बैंक खाते से पहले व्यवहार और लोकप्रियता से पहले ईमानदारी तथा उपलब्धियों से पहले मानवीय संवेदनाओं के आधार पर करने लगेगा, उसी दिन सफलता का यह नया गणित बदल जाएगा।

याद रखना चाहिए कि इस जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि दुनिया हमें कितनी देर तक याद रखती है, बल्कि यह है कि जिन लोगों के जीवन से हम गुजरे, उनके मन में हमने कैसी स्मृति छोड़ी। धन विरासत बन सकता है, प्रसिद्धि इतिहास का एक पृष्ठ बन सकती है, लेकिन चरित्र ही वह प्रकाश है, जो मनुष्य के जाने के बाद भी समाज के पथ को आलोकित करता रहता है।