सुमित गुप्ता

कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने न सिर्फ देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करवाया बल्कि इस देश की राजनीति को एक नई दिशा देने का भी काम किया। दरअसल, CJP के आंदोलन से देश की सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों को Gen Z की ताकत का पता चला। इस आंदोलन के बाद लगभग सभी राजनीतिक दल Gen Z युवाओं से जुड़ाव के लिए सभी जरूरी कदम उठाने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं- CJP आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हर Instagram पोस्ट पर एवरेज एंगेजमेंट 20 जुलाई के बाद करीब 290 फीसदी बढ़ गई है।

यह बदलाव सिर्फ पीएम मोदी के मामले में ही देखने को नहीं मिला है। विपक्षी पार्टियों ने भी Gen Z युवाओं से जुड़ने की मशक्कत तेज कर दी है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी की भी इंस्टाग्राम पोस्ट पर भी एंगेजमेंट में करीब 181% की बढ़ोतरी हुई है।

CJP आंदोलन के बाद राजनीतिक दल अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि Gen Z तक कैसे पहुंचा जाए? प्रधानमंत्री इंस्टाग्राम पर Reels के माध्यम से युवाओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि राहुल गांधी ‘Ask Me Anything’ का इस्तेमाल कर रहे हैं।

CJP आंदोलन से पहले पीएम मोदी और राहुल गांधी इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट का इंगेजमेंट

नाम20 जुलाई से पहले20 जुलाई के बादबढ़ोतरी
नरेन्द्र मोदी11,87,05246,28,183289.89%
राहुल गांधी1,51,7414,26,005180.74%

लेकिन क्या ‘जेन ज़ी’ से सीधा संपर्क साधना 2029 के चुनावों में जीत के लिए काफी होगा? या फिर CJP विरोध प्रदर्शन की सफलता यह बताती है कि युवा अब राजनीति से अलग तरह से जुड़ रहे हैं?

CJP का विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से इंटरनेट पर शुरू हुआ था। उस समय कई लोगों को शक था कि क्या ऑनलाइन दिखा गुस्सा सच में लोगों को सड़कों पर ला पाएगा? आखिर आज के युवा डिजिटल दुनिया के आदी हैं। इंटरनेट पर किसी पोस्ट को लाइक या शेयर करना आसान है, लेकिन खुद बाहर निकलकर प्रदर्शन में शामिल होना कहीं ज़्यादा मुश्किल। लेकिन CJP ने इस धारणा को बदल दिया। इस अभियान के ज़रिए हज़ारों युवा दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटे और देखते ही देखते देश के अन्य हिस्सों में भी प्रदर्शन शुरू हो गए।

CJP प्रदर्शन की असली अहमियत सिर्फ यह नहीं थी कि इसे इंस्टाग्राम पर खूब पसंद किया गया, बल्कि यह थी कि इसने साबित कर दिया कि ऑनलाइन शुरू हुई चर्चा ज़मीनी स्तर के आंदोलन और राजनीतिक दबाव में बदल सकती है।

तो सवाल यह है कि CJP में ऐसा क्या खास था? क्या यह सिर्फ एक वायरल अभियान था, या सोशल मीडिया पर कुछ वाकई नया हुआ था?

इसका जवाब जानने के लिए ‘डेटाबीइंग्स’ ने इंस्टाग्राम पर CJP से जुड़ी चर्चाओं का विश्लेषण किया। इससे एक ऐसा ट्रेंड सामने आया जो इसे किसी भी आम राजनीतिक सोशल मीडिया अभियान से अलग बनाता है।

CJP की सफलता के क्या कारण थे?

आमतौर पर सोशल मीडिया पर राजनीतिक बातचीत पर नेताओं, राजनीतिक दलों, न्यूज़ चैनलों और बड़े इन्फ्लुएंसर्स का दबदबा रहता है। लेकिन CJP के मामले में ऐसा नहीं था। यहाँ बड़ी संख्या में छोटे इंस्टाग्राम क्रिएटर्स खुद इस चर्चा से जुड़े और इस मुद्दे पर कंटेंट बनाने लगे।

अगर किसी पोस्ट पर 10,000 लाइक या कमेंट को एक पैमाना मानें, तो डेटा दिखाता है कि इसमें छोटे अकाउंट्स की भूमिका कितनी अहम थी-

36% क्रिएटर्स ऐसे थे जिनके 1,000 से भी कम फॉलोअर्स थे।

9.7% क्रिएटर्स ऐसे थे जिनके फॉलोअर्स 1,000 से 10,000 के बीच थे।

एक हजार से कम फॉलोअर्स वाले क्रिएटर्स
36.02%
एक हजार से 10 हजार फॉलोअर्स वाले 9.72%
10 हजार से एक लाख तक 18.24%
एक लाख से दस लाख तक
24.22%
दस लाख से अधिक 11.81%

इस डेटा का महत्व सिर्फ यह नहीं है कि छोटे क्रिएटर्स ने एंगेजमेंट पैदा किया। बल्कि यह है कि उन्होंने खुद पॉलिटिकल बातचीत में हिस्सा लेने का फैसला किया। इस मुद्दे पर अब सिर्फ राजनीति से जुड़े हुए लोग या राजनीतिक पहचान रखने वाले लोग ही बात नहीं कर रहे थे।

युवाओं ने बड़े स्तर पर इसमें भागीदारी की

आंकड़ें बताते हैं कि इस बहस में युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। खासकर 18 से 24 वर्ष के युवाओं ने।

उम्र हिस्सेदारी
18 वर्ष से कम 7.63%
18 से 24 वर्ष83.97%
25 से 34 वर्ष5.34%
35 से 44 वर्ष2.29%
45 से 54 वर्ष0.76%

एक चौथाई से अधिक महिलाओं की हिस्सेदारी

लिंग हिस्सेदारी
महिला 27.99%
पुरुष72.01%

यही बात CJP विरोध प्रदर्शन को किसी आम राजनीतिक अभियान से अलग बनाती है। इसमें लोगों की सीधी हिस्सेदारी थी। इस बार सिर्फ किसी पार्टी ने एक तरफा संवाद नहीं किया था। हाजारों लोगों ने इसमें सीधी भागीदारी की थी।

दिल्ली से बाहर पूरे देश में फैला इसका दायरा

CJP आंदोलन केवल दिल्ली या किसी एक विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। देश के कोने-कोने से युवाओं ने इसमें हिस्सा लिया था। इस आंदोलन में देशभर के कंटेंट क्रिएटर्स ने भी हिस्सा लिया था।

किस राज्य से कितने प्रतिशत कंटेंट क्रिएटर्स आए?

राज्यप्रतिशत हिस्सेदारी
महाराष्ट्र15.34%
उत्तर प्रदेश10.05%
तमिलनाडु8.47%
राजस्थान7.41%
दिल्ली6.61%
तेलंगाना6.35%
कर्नाटक5.29%
केरल5.29%
झारखंड4.76%
आंध्र प्रदेश4.50%
गुजरात4.50%
बिहार3.97%
मध्य प्रदेश3.97%
ओडिशा3.44%
पश्चिम बंगाल3.44%
पंजाब2.12%
हरियाणा1.59%
उत्तराखंड1.06%
असम0.79%
जम्मू और कश्मीर0.53%
हिमाचल प्रदेश0.26%

15.3% क्रिएटर्स महाराष्ट्र से थे, इसके बाद उत्तर प्रदेश से 10.1%, तमिलनाडु से 8.5%, राजस्थान से 7.4% और दिल्ली से 6.6% थे। तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, झारखंड, आंध्र प्रदेश, गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, पंजाब और कई अन्य राज्यों के क्रिएटर्स ने भी इसमें हिस्सा लिया।

यह बताता है कि इस मुद्दे को केवल दिल्ली के एक विरोध प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जा रहा था। इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भों में क्रिएटर्स द्वारा समझा और व्यक्त किया जा रहा था। इस राष्ट्रव्यापी भागीदारी ने एक स्थानीय जमीनी आयोजन को एक व्यापक विमर्श में बदलने में मदद की।

यह केवल वायरल कंटेंट भर नहीं था

CJP प्रदर्शन इस मामले में भी अलग था कि यह केवल वायरल होकर शांत नहीं हो गया। जंतर-मंतर पर मौजूद युवा स्मार्टफोन हाथ में लिए पारंपरिक राजनीतिक प्रदर्शनकारियों की तरह व्यवहार नहीं कर रहे थे। वे इंस्टाग्राम यूज़र्स की तरह व्यवहार कर रहे थे।

इन क्रिएटर्स के लिए इंस्टाग्राम कंटेंट उनकी पहचान का ही एक हिस्सा है। वे शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं को अपने ही अनोखे अंदाज़ में अपने फॉलोअर्स तक पहुँचाया। वे अपने फॉलोअर्स को कोई राजनीतिक भाषण नहीं दे रहे थे। वे उनका मनोरंजन कर रहे थे, अपने आसपास जो हो रहा था उसे दिखा रहे थे, मज़ाक बना रहे थे, रील्स बना रहे थे और प्रदर्शन को अपने तरीके से समझा रहे थे।

मनोरंजन और राजनीति के बीच का फर्क बहुत कम हो गया। यह राजनीतिक मुद्दा इंस्टाग्राम की रोज़मर्रा की भाषा का हिस्सा बन गया।

इंस्टाग्राम और प्रदर्शन के बीच का रिश्ता एक ‘फीडबैक लूप’ बन गया। कंटेंट ने ध्यान खींचा। इससे भागीदारी को बढ़ावा दिया। भागीदारी के कारण और कंटेंट बने। उस नए कंटेंट ने और ज़्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

इसलिए, यह प्रदर्शन लगातार डिजिटल कंटेंट बना रहा और अन्य लोगों को भी सड़कों पर प्रदर्शन से जुड़ने के लिए प्रेरित करता रहा। इसने प्रदर्शन में शामिल होने की वजह को भी बदल दिया।

कुछ युवाओं के लिए यह अब सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया था। यह खुद में एक सांस्कृतिक पल बन चुका था, जिसने ऑनलाइन इसे देख रहे लोगों के मन में पीछे छूट जाने का डर (FOMO) पैदा कर दिया।

हर चुनाव को मिला एक नया डिजिटल प्लेटफॉर्म

भारत डिजिटल राजनीतिक अभियानों के कई चरणों से गुज़र चुका है। 2014 के चुनाव में, फ़ेसबुक राजनीतिक दलों के लिए पारंपरिक मीडिया को दरकिनार कर सीधे मतदाताओं से जुड़ने के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरा। इसने दलों को अपने नेताओं के इर्द-गिर्द एक भव्य छवि बनाने की सुविधा दी।

2019 तक, स्मार्टफोन और सस्ते मोबाइल डेटा ने वॉट्सऐप को एक शक्तिशाली नेटवर्क बना दिया। राजनीतिक दल, विशेष रूप से भाजपा, अपने सांगठनिक नेटवर्क और बूथ-स्तरीय कार्यकर्ताओं का उपयोग करके वॉट्सऐप ग्रुपों के माध्यम से प्रचार सामग्री वितरित करने में सक्षम थे।

2024 तक, वीडियो राजनीतिक अभियानों के केंद्र में आ गया। यूट्यूब ने राजनीतिक दलों को टेलीविज़न नेटवर्क जैसा मंच दिया। पार्टियाँ भाषण, चुनावी फ़िल्में, इंटरव्यू और छोटे वीडियो पोस्ट कर सकती थीं और अपनी बात को बढ़ाने के लिए इन्फ्लुएंसर्स के साथ काम कर सकती थीं। इस प्रकार हर चुनाव में प्लेटफॉर्म्स की भूमिका बदलती गई।

इंस्टाग्राम कोई दूसरा यूट्यूब नहीं है

इंस्टाग्राम दूसरा यूट्यूब नहीं है। इसे ध्यान में रखकर राजनीतिक दलों को अपनी मौजूदा डिजिटल रणनीति पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है।

टेलीविज़न वाले विज्ञापन को इंस्टाग्राम पर अपलोड कर देने से वह अपने आप इंस्टाग्राम के लायक नहीं बन जाता। किसी 3-मिनट के राजनीतिक भाषण को काटकर 30-सैकेंड की रील बना देने से भी बात नहीं बनती। न ही किसी चुनावी पोस्टर को कैराउजल में बदलने से काम चलता है।

इंस्टाग्राम की अपनी एक भाषा है, जो क्रिएटर्स, हास्य, विजुअल कल्चर, ट्रेंड्स और भागीदारी पर बनी है। यह एक पारंपरिक मीडिया चैनल की तरह कम और एक सांस्कृतिक नेटवर्क की तरह ज़्यादा काम करता है।

इसलिए कोई राजनीतिक दल किसी इंस्टाग्राम यूज़र को केवल एक राजनीतिक संदेश पाने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं देख सकता। सबसे बड़ी सफलता तब होगी जब कोई व्यक्ति बिना कहे उस मुद्दे पर खुद एक नई रील बनाए।

नई रणनीति: विकेंद्रीकृत अभिव्यक्ति

इसलिए राजनीतिक दलों को उस मॉडल से आगे बढ़ने की ज़रूरत हो सकती है जहाँ सारा कंटेंट उनकी टीम बनाती है। उन्हें उस मॉडल को अपनाना होगा जहाँ पार्टी केवल कच्ची सामग्री उपलब्ध कराती है और क्रिएटर्स का एक बड़ा नेटवर्क उसकी अंतिम प्रस्तुति तैयार करता है। क्रिएटर्स उन मुद्दों को हास्य, व्यंग्य, क्षेत्रीय संस्कृति और अपने अनोखे अंदाज़ के ज़रिए पेश कर सकते हैं।

एक ही राजनीतिक मुद्दा एक क्रिएटर के लिए गंभीर व्याख्या वाला वीडियो बन सकता है, दूसरे के लिए एक मीम, तीसरे के लिए एक स्ट्रीट इंटरव्यू और चौथे के लिए एक कॉमेडी रील।

संक्षेप में कहें तो, मुख्य विचार केंद्रीय रह सकता है जबकि उसकी अभिव्यक्ति विकेंद्रीकृत हो सकती है। इंस्टाग्राम ठीक इसी तरह काम करता है।

अकाउंट के आकार से ज़्यादा अहम है इंस्टाग्राम का पूरा नेटवर्क

इसका मतलब यह भी है कि राजनीतिक दलों को इंस्टाग्राम पर अपनी सफलता मापने के तरीकों पर फिर से सोचना पड़ सकता है। फॉलोअर्स और व्यूज मायने रखते रहेंगे। लेकिन वे पूरी कहानी का केवल एक हिस्सा हैं।

किसी पार्टी को यह भी मापने की ज़रूरत हो सकती है कि कितने स्वतंत्र क्रिएटर्स उसके मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं, उसके आधिकारिक अकाउंट्स के बाहर कितना कंटेंट बन रहा है, वे क्रिएटर्स देश भर में कितने फैले हुए हैं और आम लोगों द्वारा बनाए कंटेंट से कितनी पहुँच मिल रही है।

इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं हो सकता की पार्टी का इंस्टाग्राम अकाउंट कितना बड़ा है? यह हो सकता है कि पार्टी का इंस्टाग्राम इकोसिस्टम (तंत्र) कितना बड़ा है?

सुमित गुप्ता Databeings के फाउंडर हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं।