पिछले सप्ताह जिस दिन संसद में एक नया तमाशा हो रहा था, मैं एक सहेली के घर खाने पर गई थी। उसे राजनीति में कोई रुचि नहीं है, लेकिन उस दिन वह परेशान दिखी राजनीति को लेकर। ‘ऐसा नहीं उनको करना चाहिए संसद में,’ उसने कहा ‘दुनिया क्या सोचेगी हमारे देश के बारे में जब लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में इस तरह के तमाशे होते रहेंगे’। मैंने जब उससे पूछा कि दोष किसको देती हो, प्रधानमंत्री को या नेता प्रतिपक्ष को, तो उसने कहा कि वह दोष किसी को नहीं देना चाहती है, लेकिन किसी न किसी तरह ऐसे तमाशे रोके जाने चाहिए।

यह वह दिन था जब हम सब इंतजार कर रहे थे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री के जवाब का। तमाशों के कारण वे लोकसभा में जवाब दे नहीं सके। अजीब दिन था वह। राहुल गांधी अपने सांसदों के साथ सदन के बाहर सीढ़ियों पर बैठे हुए थे पूर्व सेनाध्यक्ष की विवादित किताब को हाथों में लिए हुए। प्रियंका गांधी आसपास कहीं घूम रही थीं और जब उनसे पत्रकारों ने पूछा कि प्रधानमंत्री का भाषण होने देगा विपक्ष, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक राहुल गांधी को सदन के अंदर बोलने नहीं दिया जाएगा, तब तक प्रधानमंत्री को वे बोलने नहीं देंगे।

फिर एक तमाशा और हुआ। राहुल गांधी के पास से जब उनके पूर्व साथी और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह ‘बिट्टू’ गुजरे, तो उन्होंने मजाक में ‘…गद्दार दोस्त’ कहा।

उनकी इस बात को लेकर अगला तमाशा यह हुआ कि हरदीप सिंह पुरी, जो सरकार में वरिष्ठ मंत्री है, ने प्रेस कांफ्रेंस बुला कर राहुल गांधी के बारे में कहा कि उन्होंने सिख कौम का अपमान किया है। मैं खुद एक सिख हूं और मुझे यह आरोप बिल्कुल बेबुनियाद लगा। एक व्यक्ति को उसके मुंह पर मजाकिए ढंग में गद्दार कहने से अगर पूरी सिख कौम का अपमान होता है, तो उसको क्या कहेंगे जो भारतीय जनता पार्टी के आला मंत्रियों ने पंजाब के किसानों पर आरोप लगाए थे खालिस्तानी और आतंकवादी होने के सिर्फ इसलिए कि उन्होंने कृषि कानूनों का विरोध किया?

तमाशा यहां समाप्त हो जाता, तो शायद संसद की कुछ गरिमा सुरक्षित रहती, लेकिन अगले दिन फिर नेता प्रतिपक्ष और उनके साथियों ने हल्ला मचा कर उस किताब पर बहस की मांग रखी, जिससे सारी बात शुरू हुई थी। लोकसभा फिर स्थगित हुई और लोकसभा अध्यक्ष ने बात आगे बढ़ा दी, यह कह कर कि उनको खबर दी गई थी कि कांग्रेस के कुछ सांसद प्रधानमंत्री के साथ कुछ अप्रत्याशित कर सकते थे संसद के अंदर, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री को लोकसभा में आने से रोक दिया।

तमाशे पर परदा इस सनसनीखेज जानकारी के बाद गिर गया होता, तो अच्छा होता। मगर विपक्ष से जवाब प्रियंका गांधी ने यह कह कर दिया कि प्रधानमंत्री डर गए हैं इसलिए सदन को चलने नहीं दे रहे हैं।

तो गलती किसकी थी? दोष किसको दें एक और संसद सत्र के बेकार होने के लिए? मुझे किसी ने पूछा होता, तो मैं सरकार को सुझाव यही देती कि राहुल गांधी को सेनाध्यक्ष की किताब पर बोलने की इजाजत दे देना बेहतर होता। माना कि राष्ट्रपति के भाषण से उसका कोई मतलब नहीं था, लेकिन इतना हंगामा तो कम से कम न होता।

अब सारे देश को मालूम पड़ चुका है कि जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी किताब में लिखा है कि जब 2020 में लद्दाख की सीमा पर चीनी सेना और हमारी सेना के बीच तनाव इतना बढ़ गया था कि जंग तक बात पहुंच चुकी थी, तो प्रधानमंत्री ने युद्ध का एलान करने की जिम्मेदारी न लेकर सेनाध्यक्ष को कहा था कि जो उचित समझते हैं, वही करें।

तमाशा शुरू होने के अगले दिन मुझे किताब के वे पन्ने भेज दिए गए, जिसमें जनरल साहब कहते हैं कि पहली बार युद्ध की जिम्मेदारी सेना पर छोड़ी गई थी, जबकि भारतीय संविधान स्पष्ट शब्दों में कहता है कि युद्ध घोषित करने की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की होती है।

इसलिए इस तमाशे में जीता कौन, हारा कौन? सच पूछिए तो इस बार बाजी विपक्ष ने मारी है। जहां अमेरिका के साथ सुलह होने का श्रेय प्रधानमंत्री ले सकते थे सदन के अंदर और वास्तव में उनको श्रेय लेने का अधिकार है, वहां बातें हुईं सिर्फ उस किताब की जो प्रकाशित नहीं हुई रक्षामंत्री के मुताबिक, लेकिन जिसकी प्रति राहुल गांधी के हाथों में थी और अमेजन पर खरीदी जा सकती है।

नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है। दुनिया की ऊंची सभाओं में उन्होंने देश की इज्जत बढ़ाई है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी अगर है, तो यही कि वे अभी तक अपने बारे में कोई भी आलोचना सुनने को तैयार नहीं हैं।

इस कमजोरी के कारण कई विदेशी पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक भारत आ नहीं पाते हैं जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। नतीजा यह कि उनकी आलोचना इस बात को लेकर बार-बार होती है विदेशी मीडिया में। इस बार उनकी इस कमजोरी का लाभ उठाया है नेता प्रतिपक्ष ने। उनको बोलने दिया जाता, तो इस कमजोरी को प्रधानमंत्री अपनी शक्ति में बदल सकते थे यह कह कर कि वे अपनी किसी भी जिम्मेदारी से भाग नहीं रहे थे, उनकी इच्छा केवल सेना को पूरी छूट देने की थी।

न बात आगे बढ़ती, न तमाशा होता, न सारी दुनिया के सामने हम एक बार फिर साबित करते कि हमारे जन प्रतिनिधियों को थोड़ी-सी भी हिचक नहीं होती, जब लोकतंत्र के बड़े मंदिर में वे बहस के बदले तमाशे करते फिरते हैं। मामला यहां तक पहुंच गया है कि जब भी संसद का नया सत्र शुरू होता है, तमाशे ही तमाशे होते हैं और कानून पारित होते हैं बिना गंभीर बहस के।