काकरोच जनता पार्टी ठीक क्या कर रही है और इंडिया गठबंधन गलत क्या कर रहा है? इस सवाल से शुरू कर रही हूं इस सप्ताह इसलिए कि दो आंदोलन शुरू हुए गांधी जयंती के दिन जिनका मकसद एक था- ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा लेना। दोनों में जमीन आसमान का अंतर था।

एक तरफ बंद कमरों में बैठकर सलाह-मशविरा करते दिखे विपक्ष के सबसे बड़े नेता और दूसरी तरफ काकरोच जनता पार्टी के नेता दिखे मुंबई की सड़कों में आम लोगों से सीधा संपर्क करते हुए। कमरे में बैठे नेताओं के चेहरों पर थकावट और मायूसी दिखी और सड़क पर जुटे नेताओं के चेहरों पर ऊर्जा और उम्मीद। अभिजीत दिपके और उनके साथी आम लोगों में आम लोग बने।

विपक्ष में भी विरासत की राजनीति?

नेता प्रतिपक्ष के साथ दिखे राजनीतिक वारिस। उमर अब्दुल्ला, सुप्रिया सुले, महबूबा मुफ्ती। कहने को तो ये विपक्ष के सबसे बड़े राजनेता हैं, लेकिन वास्तव में राजघरानों के वारिस हैं, जिनको राजनीति और राजनीतिक दल विरासत में मिली है। इसलिए इनकी मर्जी से चलते हैं उनके राजनीतिक दल। यानी कहने को तो मल्लिकार्जुन खरगे चुनाव जीत कर कांग्रेस अध्यक्ष बने थे, लेकिन इस चुनाव के बारे में जिनको जानकारी है, उनका कहना है कि शशि थरूर को हराने का आदेश ‘ऊपर’ से जारी हुआ था। इसलिए उनका खरगे को हराना ‘मुश्किल नहीं, नामुमकिन’ था।

इंडिया गठबंधन औपचारिक तौर पर भाजपा का मुख्य प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन पिछले बारह सालों में इतने कम चुनाव जीत पाए हैं इस गठबंधन के राजनेता कि लोग शायद ठीक कहते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की जिद इसलिए कर रहे हैं कि इनको अभी तक चुनाव जीतने के तरीके ही नहीं मालूम।

इस सोच में डूबी हुई थी जब मुंबई के एक अखबार में अभिजीत दिपके का साक्षात्कार नजर आया। इसमें एक सवाल यह था कि विपक्ष क्यों असफल होता रहा है। उनका जवाब था कि इस नाकामी के पीछे एक बड़ा कारण है कि विपक्ष के राजनेताओं में साहस कम दिखता है। दिपके ने कहा कि जंतर मंतर पर जो बच्चे और युवा आए थे काकरोच जनता पार्टी के लिए समर्थन जताने, उनके पास न पैसा था और न राजनीतिक अनुभव, लेकिन उनके पास सिर्फ ‘साहस’ था, जिसकी वजह से आंदोलन करते रहे, बावजूद इसके कि इन पर पुलिस ने पैलेट बंदूकों से गोलियां चलाई थीं। इस तरह के साहस की सख्त जरूरत है।

मन्नत के सामने रुकी गाड़ी, दिपके से कही दिल की बात

दिपके और उनके साथी मुंबई में थे पिछले सप्ताह गांधी जयंती के दिन एक आम सभा में हिस्सा लेने। इस आमसभा के लिए समर्थन जुटाने सड़कों पर पैदल घूमकर लोगों से कहते दिखे कि गांधी जयंती के दिन उनको शिवाजी पार्क जरूर आना चाहिए। बांद्रा में शाहरुख खान के घर ‘मन्नत’ के सामने जब पहुंचे तो एक अध्यापिका ने दिपके को पहचान कर अपनी गाड़ी रोकी और कहा, ‘थैंक यू आपको कहना चाहती हूं इसलिए कि आप जो कर रहे हैं, उससे मैं बहुत प्रभावित हुई हूं।’ इसकी रील काकरोच जनता पार्टी ने सोशल मीडिया पर डाली अपना संदेश आगे बढ़ाने के लिए।

अभी तक दिपके कहते आए हैं कि उनका राजनीतिक पार्टी बनाने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन अपनी तरफ से उम्मीद करती हूं कि वे अपना इरादा बदलकर 2029 के आम चुनाव में हिस्सा लें। वह इसलिए कि काजपा ने जो मुद्दे उठाए हैं, उनका मैं भी समर्थन करती हूं और देश के लिए भी यह महत्त्वपूर्ण है। शुरू किया इन्होंने शिक्षा को लेकर अपना सबसे पहला आंदोलन करना। जंतर मंतर वाले प्रदर्शन के बाद जब शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो गया तो उन्होंने गांव-गांव घूमकर ‘स्कूल ठीक करो’ वाला आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन में उन्होंने सोशल मीडिया पर डालीं टूटे, पुराने स्कूलों की इतनी सारी तस्वीरें कि उत्तर प्रदेश में इनके स्कूलों में जाने पर पाबंदी लगा दी योगी सरकार ने।

मुद्दे वही, लेकिन जनता क्यों नहीं सुन रही?

शिक्षा के बाद काजपा ने सुशासन को मुद्दा बनाया और दिखाया किस गंदगी में देश के आम लोग रह रहे हैं और फिर जब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने चुनाव आयोग में अंदरूनी मतभेद पर रिपोर्ट छापी तो इन्होंने ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगना सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। मजे की बात यह है कि ये सारे मुद्दे वही हैं जो राहुल गांधी उठाते आए हैं काफी दिनों से, लेकिन उनकी आवाज अगर जनता सुन नहीं रही है, तो शायद इसलिए कि लोग परिवारवाद से पनपे इन तमाम विपक्षी नेताओं से तंग आ गई है। मेरी अपनी राय में चुनावों में धांधली से जितना नुकसान हुआ है, उससे ज्यादा नुकसान हुआ है परिवारवाद से इसलिए कि जब पूरे के पूरे राजनीतिक दल किसी परिवार की निजी जायदाद बन जाते हैं, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। ऐसा तो राजा-महाराजाओं के समय में होता था जब सामंतवाद ही था देश के उन हिस्सों में, जिन पर अंग्रेजों का राज नहीं था।

जब से भारत एक स्वतंत्र देश बना है, शासन चलता है संविधान के तहत जिसके पहले पन्ने पर लिखा है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हर भारतीय को अधिकार है अपने राजनेता खुद वोट डालकर चुनने का। इस विचार को कमजोर किया है परिवारवाद ने। ऊपर से पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिश रही है मोदी सरकार की। इन संस्थाओं में से अगर एक है जिसका वास्ता हम सबसे है वह है चुनाव आयोग। अगर इस संस्था के कहने पर करोड़ों लोगों के वोट छीन लिए जाते हैं किसी न किसी बहाने, तो इसका बहुत बड़ा मुद्दा बनना स्वाभाविक है।

लेकिन राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान के बावजूद लोगों तक यह बात नहीं पहुंची है। उनको एकांत में किसी दिन बैठकर चिंतन करनी चाहिए कि क्यों नहीं लोगों तक उनकी बात पहुंच पाई। क्यों अपनी बात पहुंचाने में ज्यादा सफल हुए हैं काजपा के लोग..! दिलचस्प है यह, आगे देखते हैं होता है क्या।