अजित पवार का अंतिम संस्कार जिस दिन किया जा रहा था, मैं एक मराठी दोस्त के साथ उनकी अंतिम विदाई को टीवी पर देख रही थी। उनको विदा करने बड़ी संख्या में आए लोगों को जब देखा, तो आश्चर्य हुआ मुझे और अपने दोस्त से पूछा कि उनकी लोकप्रियता कैसे कायम रही, बावजूद इसके कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। मेरे दोस्त ने कहा ‘भ्रष्टाचार इतना है अब महाराष्ट्र में, बल्कि सारे देश में कि आम लोग मान गए हैं कि हमारे शासक भ्रष्ट हैं इसलिए उनके काम पर ज्यादा ध्यान देते हैं न कि उनके भ्रष्टाचार पर’। दुख हुआ इस बात को सुन कर।

याद आया कि जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने कहा था ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ और उनकी इस बात को लेकर हम सब खुश हुए थे। तो भ्रष्टाचार की इस मुसीबत को वे क्यों नहीं अभी तक समाप्त कर पाए हैं? सच बोला जाए, तो पिछले दशक में मैंने अपनी आंखों से देखा है किस तरह भ्रष्टाचार बढ़ता गया है हर साल और हर तरह से। महाराष्ट्र में इन दिनों चर्चा खूब हो रही है बड़े उद्योगपतियों के गलियारों में कि सरकारी ठेका हासिल करना हो किसी सड़क या पुल के निर्माण के लिए, तो पहले पैसा निकालना पड़ता है। फिर मिलता है ठेका।

ऐसा कभी हुआ करता था सिर्फ बिहार जैसे पिछड़े राज्य में जहां से आए दिन खबर मिलती है किसी पुल के गिर जाने की, किसी नई सड़क के बरसात के कारण टूट जाने की। यकीन था मुझे कि महाराष्ट्र जैसे संपन्न, विकसित राज्य में महत्त्वपूर्ण सरकारी ठेकों में भ्रष्टाचार न के बराबर है।

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आज हाल यह है कि गांव के सरपंच से लेकर इस राज्य के बड़े नेताओं तक भ्रष्टाचार इतनी बड़ी समस्या बन गया है कि हर दूसरे दिन कोई नया किस्सा सुनने को मिलता है। मेरा एक दोस्त है जो कोशिश कर रहा है मुंबई से कोई सौ किलोमीटर दूर एक छोटे गांव में कोठी बनाने के लिए। सेहत की समस्याएं हैं उसको और उसके पोते को भी दमा है, तो जब मुंबई की हवा बहुत प्रदूषित हो जाती है, तब उसके परिवारवालों को काफी तकलीफ होती है।

हुआ यह कि जमीन खरीद कर उसने जब घर बनाना शुरू किया, तो गांव की पंचायत के कुछ लोग पहुंच गए घर का निर्माण रोकने। काफी पैसे देकर सुलह हुई, लेकिन कुछ दिन बाद फिर आ गए वही लोग पैसा मांगने। जब उसने इनकार किया, तो धमकाने लगे कि उसके परिवार को गांव में नहीं रहने देंगे।

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मैं खुद महाराष्ट्र में समंदर किनारे गांव में काफी समय बिताती हूं और देखते-देखते एक स्थानीय नेता को राजा बनते देखा है। जहां पहले उसका एक छोटा होटल था और कुछ थोड़ी बहुत जमीन। अब उसके पास करोड़ों की जमीन है और रहता है ऐसी शान से कि जैसे देश के सबसे धनवान उद्योगपति रहते हैं। चर्चा खूब होती है गांव के लोगों में उसके अचानक धनवान हो जाने की, लेकिन सब स्वीकार करते हैं कि आज के सब राजनीतिक ऐसे ही हैं। यहां तक कि सरपंच भी हर छोटे काम के लिए गलत तरीकों से पैसा कमाते हैं।

जब हाल यह है हर जगह, तो लोग ऐसे नेताओं का सम्मान करते हैं जो उनके लिए काम कर सकें। चाहे उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हों या न हों। अजित पवार पर लगे हर आरोप को उनके समर्थकों ने अनदेखा किया, इसलिए कि सुबह से देर शाम तक वह लगे रहते थे जनता की सेवा में।

निजी तौर पर मैं सिर्फ एक बार मिली थी उनसे और राजनीति की कोई बात नहीं हुई, लेकिन जो उनको जानते थे अच्छी तरह, उनका कहना है कि वे अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों से मिलने से कभी नहीं भागते थे और उनके पास जब भी कोई समस्या लेकर आता था, तो दिल लगा कर उसका समाधान ढूंढ़ने में लग जाते थे।

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उनकी लोकप्रियता तब से इसी तरह बढ़ती रही, जब से उन्होंने राजनीति में कदम रखा था। लोकप्रिय थे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री। उनको आखिरी बार विदा करने इतने लोग आए कि जैसे बारामती का हर नागरिक पहुंच गया हो। उस हुजूम को देख कर मैं इस बात को स्वीकार करने पर मजबूर हुई कि इस ‘नए भारत’ में लोग भ्रष्टाचार और परिवारवाद को अनदेखा करते हैं उन राजनीतिकों में जो उनके लिए काम करके दिखाते हैं।

नुकसान होता है, तो सिर्फ देश का इसलिए कि जो पैसा हमारे राजनीतिक कमाते हैं गलत तरीकों से, वह पैसा भी तो जनता का ही है जो लग सकता था देश के विकास में न कि राजनीतिकों के परिवार के विकास में।

जिन देशों में भ्रष्टाचार कम होता है, उन देशों में लोगों के लिए वे सारी चीजें बन जाती हैं जिनकी सख्त जरूरत है किसी देश के विकसित होने के लिए। अच्छे स्कूल, अच्छे अस्पताल, अच्छी सड़कें, साफ पीने का पानी घर के नल से और भरोसेमंद बिजली। इस दौर में कुछ भी नहीं हो सकता है बिजली के बिना।

न हमारे फोन चल सकते हैं, न कंप्यूटर और न ही एआइ सेवाएं उपलब्ध हो सकती हैं। एआइ के लिए बिजली और भी ज्यादा लगती है। यानी नुकसान होता है भ्रष्टाचार के कारण, लेकिन अपने देश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी मजबूत और गहरी हो गई हैं कि शायद ही कोई राजनेता इस भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकेगा निकट भविष्य में। चाहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने का उसका पक्का इरादा क्यों न हो। वह जमाना गया जब भारतीय जनता पार्टी अपने आपको ‘अलग किस्म’ की राजनीतिक पार्टी कहलाया करती थी। अब कड़वा सच यह है कि राजनीति के हमाम में सब एक जैसे ही हैं।