सुना-पढ़ा है कि स्विट्जरलैंड में पेंशन बहुत अच्छी मिलती है, इसलिए वहां बुजुर्गों को आखिरी दम तक भोजन और निवास की चिंता नहीं सताती। फिर भी, वहां कई लोग परोपकार के काम में जुटे हैं – अस्सी की उम्र पार किसी वृद्ध की देखभाल करने जैसे। वहां ऐसे काम पैसा कमाने के लिए नहीं, बल्कि अपना आज का समय ‘टाइम बैंक’ में जमा करने के लिए किए जाते हैं, क्योंकि जब आज दूसरे की सेवा करने वाला बुजुर्ग होकर खुद असहाय होगा, चल-फिर नहीं सकेगा, तब वह अपने ‘टाइम बैंक’ में जमा सेवा के समय को निकालकर अपने लिए इस्तेमाल करवा सकता है।
‘टाइम बैंक’ की व्यवस्था स्विट्जरलैंड के सामाजिक सुरक्षा विभाग की योजना है। लोग अपनी युवावस्था में बुजुर्गों की सेवा करके अपना ‘समय’ जमा करते हैं और जब वे स्वयं बूढ़े, बीमार या असहाय हो जाते हैं, तब उस समय को अपने लिए निकलवा कर निशुल्क उपयोग करते हैं। इस योजना में शामिल होने के लिए व्यक्ति का सेहतमंद, मिलनसार और दयालु होना लाजिमी है। उनकी सेवा के घंटों को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के तहत व्यक्तिगत ‘टाइम अकाउंट’ में जमा किया जाता है।
इस प्रक्रिया में अपना पेशा और काम-धंधा छोड़कर, दफ्तर की ड्यूटी की तरह या नर्सिंग पेशे की तरह बुजुर्ग की सेवा नहीं करनी होती। हर हफ्ते केवल दो बार, दो-दो घंटे के लिए ही मदद की जाती है। बाजार ले जाकर खरीदारी करवाना, उनका कमरा साफ करना, बाग में टहलाना और समय बचे तो बातचीत करना। सेवा समझौते के मुताबिक, एक साल बाद ‘टाइम बैंक’ हर मददगार के कुल कार्य घंटों की गणना करता है। उसी के आधार पर उन्हें टाइम बैंक कार्ड जारी किया जाता है।
अगर किसी मजबूरी की स्थिति में कभी उसे अपनी देखभाल करवाने की जरूरत पड़े, तो वह अपने कार्ड के जरिए सेवा का समय और अर्जित ब्याज निकाल सकता है। खाते की जांच कर टाइम बैंक कार्यालय किसी स्वयंसेवक को सहायता के इच्छुक व्यक्ति के घर या अस्पताल भेज देता है।
बेशक यह नई सामाजिक व्यवस्था विकसित हो रही है, लेकिन सेवा की ऐसी परिकल्पना सभी देशों में लागू हो, तो कितना अच्छा हो। खासतौर पर भारत जैसे देशों में, जहां ज्यादातर युवा अपने बेहतर भविष्य की उम्मीद में दूसरे शहरों और देशों में हमेशा के लिए चले जाते हैं और उनके बुजुर्ग माता-पिता अकेला जीवन जीने को विवश हैं।
हालांकि यह अपने आप में एक त्रासद विडंबना है कि जो माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपना जीवन अर्पित कर देते हैं, अपना सुख, संतोष और खुशी बच्चों के हित के अनुकूल बनाकर इसी को अपना भाग्य मान लेते हैं, उन्हें जीवन की सांध्यवेला में अपने भरोसे छोड़ दिया जाता है।
इसके बावजूद यही माना जाता है कि भारतीय संस्कृति और संस्कारों में ‘सेवा का मेवा’ की कहानी सदियों से रची-बसी है। विचारक जैक कैनफील्ड का कथन इसी सेवा के काम को उजागर करता है कि आपकी मौजूदा आदतें ही आपका भविष्य तय करती हैं। अपने माता-पिता, गुरुजन और बुजुर्ग परिजनों की सेवा करना शुरू से परम धर्म माना जाता है। भारतीय सेना का आदर्श वाक्य ‘स्वयं से पहले सेवा’ भी मानव सेवा के भाव का संचार करता है।
कहते भी हैं कि किसी भी पेशे में जाने या अपनाने से पहले नेक इंसान बनना जरूरी है। मानव सेवा से बड़ा कोई कर्म और धर्म नहीं है। इसीलिए हमारे पौराणिक ग्रंथ भी ‘मानव धर्म सर्वोपरि’ के पाठ को जीवन में उतारने की सलाह देते हैं। मानव मात्र की सेवा करने से ही सच्चे सुख की प्राप्ति और अनुभूति होती है, असीम सुख और सुकून मिलता है। मनोविज्ञान भी मानता है कि अगर खुशी, समृद्धि और संतोष जैसे गुणों को जीवन में लाना है, तो सेवा को अपने जीवन में जोड़ना जरूरी है। यानी हरेक का पहला धर्म, पहली काबिलियत और पहली अहमियत मददगार इंसान बनना होनी चाहिए।
सबके प्रति सेवा भाव रखने वालों का सबसे अच्छा साथी उनका अंतर्मन होता है, जो खुद की अच्छी बातों पर शाबाशी देता है और बुरी बातों पर झकझोरता है। सवाल है कि इसके बावजूद ऐसा कैसे हो रहा है कि समाज में आपसी दूरियां बढ़ती जा रही हैं और इसे रोकने के लिए क्या किया जा सकता है।
इसका साधारण-सा जवाब हो सकता है कि हम अपने आसपास के संवेदनशील लोगों को गले लगाएं और अपना कदम आगे बढ़ाकर दूसरों के पास जाएं। उनकी दिक्कत जानने-समझने और फिर उसका समाधान ढूंढ़ने की कोशिश करें। सभी के प्रति सेवा भाव रखना होगा। हम जितना अपने-अपने दायरे में सिमटे रहेंगे, समाज में सेवा भाव घटता जाएगा, टूटता-बिखरता जाएगा।
सच यह है कि कुछ को छोड़कर आज का समाज सेवा भाव से जरा हटता जा रहा है। ज्यादातर लोग दूसरों की तकलीफ और परेशानी सुनना ही नहीं चाहते। बस मैं-मैं ही करते हैं। दूसरों की सुनने और उनके प्रति सेवा का भाव रखने की जरूरत है। यह जगजाहिर तथ्य है कि गुरुद्वारे सेवा भाव का सबसे बड़ा पावन स्थल बनकर उभरे हैं।
वास्तविक स्थितियों की समझ रखने वाले कहते हैं कि सेवा करने वाले न आस्तिक होते हैं और न ही नास्तिक, वे तो वास्तविक होते हैं। इंसान की मुख्य चिंता सुख पाना या दर्द से बचना नहीं, बल्कि जीवन में सेवा का भाव पैदा करना होना चाहिए। इसीलिए दूसरों के दर्द में उनकी सेवा कर हर कोई अपना दर्द सहने के लिए भी तैयार हो जाता है।
ओशो मानते हैं कि सेवा की कोई भाषा नहीं होती, सेवा का फूल मौन में खिलता है। सेवा प्रेम का संगीत है, सेवा अनहद नाद है। तय है कि बिना सेवा भाव का इंसान घमंड से फूल जाता है, कभी फल-फूल नहीं सकता।
