कृत्रिम गर्भाधान ने आज जिस तरह व्यवसाय का रूप ले लिया है, वह चिंता का विषय है। मगर अब केंद्र सरकार ‘किराए की कोख’ के नाम पर चल रहे कारोबार पर अंकुश लगाने जा रही है। इसके बाद उम्मीद की जा सकती है कि किराए की कोख उपलब्ध कराने के नाम पर चल रही मनमानी पर लगाम लगेगी।
दरअसल, ‘सरोगेसी सेंटरों’ में काफी समय से चल रहे फर्जीवाड़े को रोकने के लिए सरकार ने इसमें पंजीयन और संचालन नियमों में बदलाव किया है। नए नियमों के तहत इन केंद्रों को नियंत्रित किया जाएगा। अब किराए की कोख के लिए केवल ऑनलाइन आवेदन ही स्वीकार होंगे। इनकी कड़ी निगरानी होगी। कागजी आवेदन करने की सुविधा प्रतिबंधित कर दी गई है। ‘सरोगेसी क्लीनिक’ जरूरतमंद लोगों को इतनी सहजता से यह सुविधा नहीं दे सकेंगे। केंद्र सरकार ने नए नियमों का सख्ती से पालन करने के लिए राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं।
किराए की कोख के कानून में परिवर्तन इसके बढ़ते व्यापार पर लगाम लगाने के लिए किया गया है। अब केवल निसंतान दंपति, जो बच्चे पैदा करने में शारीरिक रूप से अक्षम हैं, वे अपने किसी करीबी रिश्तेदार की मदद ले सकते हैं। इस सुविधा को कानूनी भाषा में ‘अल्ट्रुइस्टिक सरोगेसी’ कहा जाता है।
भारत दुनिया भर के दंपतियों के लिए किराए की कोख का एक बड़ा व्यावसायिक केंद्र बनता जा रहा है। दरअसल, जो सुविधा वास्तविक जरूरतमंदों के लिए शुरू की गई थी, वह अमीर दंपतियों के लिए शौक में बदलती जा रही है। सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के बाद भारत में प्रजनन का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। इसमें किराए पर कोख दिए जाने का व्यवसाय भी शामिल है। चिकित्सा पर्यटन के बहाने विदेशी पर्यटक प्रसूति पर्यटन के लिए भी आ रहे हैं।
यह तथ्य है कि पिछले कुछ बरसों में देश में कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों की संख्या 35 से 50 फीसदी बढ़ गई है। इसी अनुपात में कृत्रिम गर्भाधान के नाम पर जालसाजी बढ़ी है। हैदराबाद में ऐसा गिरोह पकड़ा गया, जो दो लाख से चार लाख रुपये में कोख किराए पर लेकर उसे 30 लाख रुपये तक में बेच देता था। यहां तक कि विदेश से भी शुक्राणु दानदाता लाए गए। यानी देश के बाहर भी बच्चे बेचे गए।
हालांकि, वर्ष 2025 में सरकार ने शुक्राणु दाता नियमों में बदलाव किया था, लेकिन कारोबारियों ने नियमों की अनदेखी की। नाबालिग और अविवाहित लड़कियों की कोख का भी अवैध इस्तेमाल किया गया। भारत में कोख किराए पर लेने का खर्च 10 से 25 लाख रुपये है, जबकि विदेश में 80 लाख से डेढ़ करोड़ रुपये तक है। इसलिए ‘सरोगेसी क्लीनिक’ में किराए की कोख अवैध कारोबार का बड़ा धंधा बनती जा रही है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और तमिलनाडु में अनेक मामले सामने आए, जिनमें ठगी की गई। लगातार मिल रही शिकायतों के बाद सरकार को नियमों में बदलाव करना पड़ा। इसके पहले 2025 में समलैंगिक युगलों को किराए की कोख के जरिए माता-पिता बनने का अधिकार देने से मना कर दिया गया था।
अब ऑनलाइन जानकारी होने से निगरानी तंत्र के पास कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों के संचालन और नवीनीकरण संबंधी जानकारी हर वक्त सामने होगी। इससे अनियमितता को आसानी से चिह्नित कर लिया जाएगा। क्लीनिक के पास वैध दस्तावेज हैं या नहीं, इसकी भी पुख्ता जानकारी मिलती रहेगी। कोई भी कमी पाए जाने पर संस्था को प्रतिबंधित किया जा सकेगा। इन केंद्रों में कर्मचारियों से लेकर बच्चों के जन्म तक की जानकारी मिलती रहेगी।
सरकार इन नियमों को एक साथ लागू करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से अमल में लाएगी। वर्तमान कानून के अनुसार किसी अन्य महिला की कोख के लिए अनुमति तब मिलती है, जब कानून के अनुसार विवाहित जोड़ा शारीरिक रूप से अक्षम हो या फिर गर्भधारण करने में पत्नी की जान को खतरा हो। यानी इस स्थिति में वैवाहिक जोड़ा किराए की कोख की मदद ले सकता है।
कानून के अनुसार यह भी बाध्यकारी शर्त है कि किराए की कोख देने वाली महिला एक तो विवाहित होनी चाहिए और दूसरे, कम से कम उसका एक बच्चा भी हो। पति की आयु 26 से 55 वर्ष और पत्नी की आयु 23 से 50 वर्ष के बीच होना जरूरी है।
भारत में किराए की कोख का कारोबार अरबों डॉलर का हो गया है, लेकिन यह धंधा अंततः स्त्री की कोख पर टिका है। ठीक उसी तरह, जिस तरह उदारवादी अर्थव्यवस्था प्रकृति के गर्भ में समाई खनिज संपदाओं के दोहन पर टिकी है। इस व्यवसाय की कीमत उन महिलाओं को चुकानी पड़ी है, जिन्हें अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए हर हाल में धन की जरूरत रहती है।
इसलिए वर्ष 2016 में प्रजनन सहायक तकनीक विधेयक लाकर केंद्र सरकार ने इस गोरखधंधे पर लगाम लगाने की पहल कर दी थी। मगर इस कानून से उन्हें परेशानी है, जिन्होंने स्त्री की आर्थिक कमजोरी का फायदा उठाकर उसकी कोख को बाजार के हवाले कर दिया है। वे यह भी दलील दे रहे हैं कि कठोर कानून से विदेशी मुद्रा का आगमन रुक जाएगा।
गौरतलब है कि जैविक माता-पिता के शुक्राणु और अंडाणु को परखनली में निषेचित करने के बाद जब भ्रूण पनप जाता है, तब उसे अन्य स्त्री की कोख में प्रत्यारोपित किया जाता है। गर्भाधान का यही तरीका अपनाया जाता है। मगर इसका शरीर पर विपरीत असर पड़ता है। इसके गर्भपात होने की 80 फीसदी आशंका रहती है। ऐसी 90 फीसदी प्रसूतियां शल्य क्रिया के जरिए होती हैं। ऐसे में महिला की जान का जोखिम भी बना रहता है।
कोख किराए पर देने वाली महिला का न तो कोई बीमा होता था, न ही उसके बच्चों की कोई गारंटी लेता था। इस संदर्भ में यह भी बड़ा सवाल था कि जैविक अभिभावक यदि जन्मे बच्चे को छोड़कर भाग जाते हैं, तो उसके पालन-पोषण की जवाबदेही किसकी होगी? यदि नवजात शिशु विकलांग या ऐसी लाइलाज बीमारी के साथ पैदा होता है और जैविक माता-पिता उसे लेने से इनकार कर देते हैं, तो उस बच्चे की जिम्मेदारी कौन लेगा?
इस बाबत एक स्वयंसेवी संगठन के अध्ययन ने कुछ चौंकाने वाले सवाल भी उठाए थे। खासतौर से विदेशी धनवान जब किराए की कोख से संतान पाने के इच्छुक होते हैं, तो वे भारत आकर एक साथ कई महिलाओं को गर्भधारण करा देते हैं। इनमें से कुछ महिलाओं में यह प्रयोग सफल हो जाता है, तो वे किसी एक महिला को छोड़कर बाकी का गर्भपात करा देते हैं। गर्भपात कराई गई महिलाओं को कोई धन भी नहीं दिया जाता था।
अप्रवासी भारतीयों में किराए की कोख की मांग बहुत ज्यादा रही है। इससे भारत में किराए की कोख की मांग बढ़ रही थी। इस लिहाज से देखें, तो किराए की कोख का सख्ती से नियमन जरूरी था। देर से ही सही, लेकिन सही दिशा में कदम उठाया गया है।
