इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि तकनीकी तरक्की और शिक्षित समाज के बढ़ते आंकड़ों के बीच देश के दूरदराज के क्षेत्रों से लेकर बड़े शहरों तक अंधविश्वास की जकड़बंदी खत्म नहीं हो रही है। एक ओर धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर महिलाओं का शोषण किया जाता है, तो दूसरी ओर मुसीबतों से छुटकारा पाने के लिए तांत्रिकों के इशारे पर मासूम बच्चों की हत्या कर दी जाती है। ऐसी घटनाओं में लालच और स्वार्थ का खेल स्पष्ट नजर आता है।

सब कुछ सही कर देने वाले वादों और दावों के जाल में लोग आसानी से फंस जाते हैं। खासकर महिलाएं अंधविश्वास के फेर में पड़कर अपनी सुरक्षा को जोखिम में डालने को तैयार हो जाती हैं। कुंठित और आपराधिक मानसिकता वाले स्वयंभू बाबाओं तथा तांत्रिकों से लंबे समय तक जुड़े रहना न केवल समग्र समाज को नकारात्मक संदेश देता है, बल्कि आज के शिक्षित वर्ग की सोच एवं समझ पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

हाल में झारखंड के हजारीबाग में एक स्तब्ध करने वाली घटना सामने आई। खबरों के मुताबिक, एक महिला ने अपने बेटे की शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं से निजात पाने के लिए तांत्रिक के कहने पर अपनी बेटी की हत्या कर दी। इसी तरह एक ढोंगी बाबा द्वारा महिलाओं की व्यक्तिगत एवं पारिवारिक समस्याएं सुलझाने के नाम पर यौन शोषण से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर प्रचारित हुए। यह मामला चर्चा और चिंता का गंभीर विषय है।

दरअसल, अंधी आस्था के साथ शुरू होने वाला यह जालसाजी का खेल भयादोहन तक जा पहुंचता है। कई महिलाएं अपने परिवार को बताए बिना ऐसे स्वयंभू बाबाओं से मिलती हैं और घर-आंगन, बच्चों या जीवनसाथी से जुड़ी परेशानियों का हल ढूंढ़ने के फेर में इस दलदल में धंसती चली जाती हैं। कई बार तो वे ढोंगी बाबा की सच्चाई जानने के बाद भी इस जाल से बाहर नहीं निकाल पातीं। ऐसे फर्जी जुड़ावों से पनपी जद्दोजहद आगे चलकर आपराधिक घटनाओं का भी कारण बनती है। बदनामी के भय के कारण कई महिलाएं तो आत्महत्या का रास्ता तक चुन लेती हैं।

हाल के वर्षों में शिक्षा, अनुसंधान और अन्य वैज्ञानिक उपलब्धियों के मोर्चे पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। बावजूद इसके कभी डायन बताकर तो कभी जादू-टोना करने के नाम पर महिलाओं की हत्या कर दी जाती है। ऐसी घटनाओं के पीछे स्पष्ट रूप से स्वार्थ साधने का व्यावहारिक खेल होता है। गौरतलब है कि इस तरह की अधिकतर घटनाओं की जांच में संपत्ति विवाद, मुखर विरोध के लिए किसी स्त्री को सबक सिखाना और शारीरिक शोषण के विरोध जैसे कारण ही सामने आते हैं। ऐसे कई मामलों की तो पुलिस में शिकायत तक नहीं की जाती। अगर शिकायत दर्ज करा भी दी जाए, तो उचित कानूनी कार्रवाई होने की संभावना बहुत कम होती है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2001 से 2023 के बीच झारखंड में डायन-बिसाही के अंधविश्वास के कारण सैकड़ों हत्याएं हुई हैं। वर्ष 2023 में देश में सबसे अधिक 22 ऐसी हत्याएं झारखंड में ही दर्ज कीं गईं। यह आंकड़ा वर्ष 2022 में 11 हत्याओं से सौ फीसद अधिक है। विभिन्न रपटों के मुताबिक, झारखंड में हर वर्ष औसतन 25-30 लोग अंधविश्वास के शिकार होते हैं। पिछले वर्ष झारखंड के धनबाद में अंधविश्वास के कारण पांच महिलाओं को डायन बताकर उनसे मारपीट की गई और उन्हें गांव से निकाल दिया गया। इसके अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, ओड़ीशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, असम, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में भी अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं।

एक ओर गांवों-कस्बों में महिलाएं अंधविश्वास की वजह से इस दलदल में उतर जाती हैं, तो दूसरी ओर शहरों-महानगरों में शिक्षित स्त्रियों का खुद इस जाल में फंसना भी एक दुखद सच है। व्यवस्थागत रूप से श्रद्धा के नाम पर फैलाए गए ऐसे ढोंग के चक्रव्यूह में महिलाओं को सोची-समझी रणनीति के तहत फंसाया जाता है, जिससे धीरे-धीरे पाखंड का एक पूरा साम्राज्य खड़ा हो जाता है। अफसोस की बात है कि पाखंडियों के षड्यंत्र में फंसी महिलाएं कई भ्रांतियों का शिकार होकर पूरी तरह अंधसमर्थन की राह पकड़ लेती हैं।

दरअसल, हमारा पूरा सामाजिक और पारिवारिक ढांचा बहुत सी समस्याओं से ग्रस्त है। इन परेशानियों को महिलाएं ही अधिक झेलती हैं और इसी कारण उन्हें भावनात्मक रूप से गुमराह करना आसान हो जाता है। अंधविश्वास की अवधारणाओं के कारण उन्हें तांत्रिकों और स्वयंभू बाबाओं के दावे हर बीमारी एवं परेशानी का हल लगते हैं। आडंबर की इस आड़ में वे आर्थिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक शोषण का शिकार हो जाती हैं।

यह बेहद चिंताजनक है कि कहीं स्त्रियां स्वयं अंधविश्वास के जाल में फंसकर अपने जीवन को मुश्किल में डाल रही हैं, तो कहीं परिवार-समाज का अंधविश्वास उनका जीवन छीन रहा है। अज्ञानता से पोषण पाती यह दिशाहीन और अतार्किक सोच आज भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई है। इतना ही नहीं, विज्ञान से मिली सहूलियत के बावजूद दिशाहीनता बढ़ रही है। तकनीक की बढ़ती पहुंच के दौर में आभासी दुनिया में परोसी जा रहीं श्रद्धा और विश्वास से जुड़ी भ्रामक जानकारियां भी अंधविश्वास बढ़ा रही हैं।

प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भ्रम फैलाने और कुप्रथाओं को बढ़ावा देने वाली सामग्री, वीडियो और ‘रील’ हर ओर छाए हुए हैं। इनमें भी बेबुनियाद बातों और चमत्कारों का दावा किया जाता है। ऐसे में वास्तविक संसार की दुखद घटनाओं से लेकर आभासी दुनिया की पूर्वाग्रही जानकारियों तक, हर मोर्चे पर सजगता आवश्यक है। महिलाओं के जीवन को मुश्किल में डालने वाली सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास के उन्मूलन को लेकर जागरूकता अभियानों को और व्यापक बनाने की दरकार है। साथ ही जाने-अनजाने छल-छद्म के जाल में फंसने वाली महिलाओं को भी सचेत रहने की आवश्यकता है।

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सबरीमला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण अवलोकन किया कि वह किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र रखता है। नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने परिवर्तनकारी संवैधानिकता और संवैधानिक नैतिकता जैसे सिद्धांतों के उपयोग पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि संवैधानिक नैतिकता को न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं बनाया जा सकता। यह अवधारणा स्पष्ट नहीं है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक