एक दिन ‘यूजीसी नियम, 2026’ सामने आया और इसके बाद ‘सवर्ण वर्ग’ कई शहरों में आक्रोशित दिखा। ये लोग सत्ता की नई ‘रीति नीति’ से नाराज दिखे। सोशल मीडिया में आग लगी रही। कई दिन बाद कुछ चैनलों ने यूजीसी द्वारा लाए गए ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ पर चर्चा कराई, लेकिन नाराज ‘सवर्ण वर्ग’ का इतना दबाव रहा कि सत्ता का एक प्रवक्ता तक किसी चैनल पर न दिखा। कुछ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सारे नए नियम एक तरफ झुके हुए हैं, ऐसे में सवर्ण शिक्षार्थी कैसे पढ़ेंगे?

वे तो किसी भी बात के लिए दंडनीय हो सकते हैं… उनको झूठा फंसाया जा सकता है… उनका भविष्य खत्म हो सकता है। ऐसे नियमों से समाज में जातिगत विभाजन, तनाव और संघर्ष ज्यादा बढ़ सकते हैं। एक चर्चक ने यह तक कहा कि जो कल तक ‘बंटोगे तो कटोगे’ कहा करते थे, अब वही कर रहे हैं ‘बंटो और कटो..!’ सुप्रीम कोर्ट ने भी इन नियमों को ‘भेदवादी’ पाया और उनको लागू करने पर रोक लगा दी कि ये नियम ‘अस्पष्ट’ हैं… हम समानता की दिशा में जा रहे हैं या उल्टी दिशा में? कुछ चर्चकों ने इन नियमों को सत्ता द्वारा की जाती रही ‘नए वोट बैंक’ की राजनीति बताया। कुछ ने इसे सत्ता दल की ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ की नीति कहा। फिर खबर आई कि एक राज्य ने तो इसे लागू भी कर दिया, जबकि इसी राज्य में ‘सवर्ण’ सर्वाधिक भड़के दिखे। मुद्दा अब मार्च में सुना जाना है।

तभी एक विपक्षी दल के बड़े नेता ने एक और मुद्दा सुलगाए रखा और एक विपक्षी मुख्यमंत्री अपने राज्य के हित में चुनाव आयोग और एसआइआर के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गईं और वहां अपने मुकदमे की जमकर पैरवी भी की। एक बड़े विपक्षी दल को बोलना था राष्ट्रपति के अभिभाषण पर, मगर बोलने लगे पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे की ‘अप्रकाशित किताब’ की कुछ पंक्तियों का हवाला देकर।

इधर संसद में वे ‘अप्रकाशित’ किताब के अंश खोलकर पढ़ने लगते कि चीन के चार टैंक आ रहे थे… उधर लोकसभाध्यक्ष टोकने लगते… कि आप राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलिए। कुछ देर चुप रहकर विपक्ष के नेता किताब दिखाकर वही दुहराने लगते कि चीन के चार टैंक आ रहे थे… लोकसभाध्यक्ष फिर टोकते कि विषय पर बोलिए… ‘अप्रकाशित किताब’ का उल्लेख करना ‘नियम विरुद्ध’ है।

देर तक यही होता रहा। फिर कुछ नरवणे के इस कथन को भी उद्धृत करते रहते कि चीन एक इंच जमीन तक न ले सका। न उनको ‘विषय’ पर बोलना था, न लोकसभाध्यक्ष को ‘विषय-बाहर’ बोलने देना था। देर तक यह चलता रहा। इधर वे बोलते, तो उधर सदन के अध्यक्ष तुरंत टोक देते। विपक्षी नेता अपनी बात पर अड़े रहे, लोकसभाध्यक्ष अपने नियमों पर अड़े रहे। शोर होता रहा। संसद अखाड़ा बनी रही। कुछ विपक्षी सांसद लोकसभाध्यक्ष के आसन तक पहुंच गए। कुछ ने कागज फाड़ कर सदन के अध्यक्ष की ओर उछाले। संसद की सांस उखड़ी रही… आठ सांसद निलंबित हुए। कुछ विपक्षी सांसदों ने एक नया इतिहास भी बनाया।

खबर दी गई कि शाम पांच बजे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के भाषण पर ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ देंगे। तभी एक नाटकीय घटना घटी। प्रधानमंत्री के आने से कुछ मिनट पहले कुछ विपक्षी महिला सांसद प्रधानमंत्री के पास आकर उनकी सीट का घेराव-सा करतीं और नारे लगाती दिखीं। स्थिति की नजाकत को भांप कर लोकसभाध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को आने से रोक दिया। वे नहीं आए। विपक्षी महिला सांसदों द्वारा किए गए ‘असंसदीय व्यवहार’ को लेकर कई चैनल लगे रहे। एक पक्ष कहता कि ‘प्रधान आत्मा डर गए…’ , तो दूसरा कहता कि सांसदों का ऐसा ‘आचरण’ कभी नहीं देखा। एक एंकर ने तो इस घटना में ‘प्रधानमंत्री पर हमला करने के इरादे’ तक को पढ़ लिया और बहस को इसी दिशा में चलाया। बहस विभाजित रही।

एक विपक्षी प्रवक्ता ने पहले इस हरकत की आलोचना की, लेकिन दूसरी ही सांस में कहते दिखे कि ये नौबत आई क्यों! सत्ता, विपक्ष के नेता को बोलने क्यों नहीं देती! एक एंकर ने चिंता जताई कि अगर प्रधानमंत्री आए होते, तो उनके साथ कुछ भी हो सकता था। इसकी कल्पना सहज की जा सकती है। फिर संसद के द्वार पर धरना हुआ कि इस बीच एक केंद्रीय मंत्री उधर से गुजरे, तो विपक्ष के नेता ने उनको ‘यार गद्दार’ जैसे शब्दों से नवाजा, तो जवाब में उन्होंने भी ‘नेता’ को ‘दुश्मन’ कहा।

बाद में कई चैनलों में कई वक्ता, प्रवक्ताओं ने विपक्ष के नेता के ऐसे आचरण की निंदा की और मंत्री के कई पक्षधरों ने इसे सिख समुदाय के प्रति विपक्षी दल की ‘पुरानी नफरत’ कहा और कइयों ने इसे ‘सिख विरोधी’ आचरण कहकर इसकी निंदा की। अंत में, प्रधानमंत्री राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर कोई सत्तानबे मिनट बोले। उन्होंने कहा कि उनका रक्षा कवच 140 करोड़ जनता है।