मनुष्य के जीवन में सफलता जितनी आवश्यक है, उतना ही जरूरी है उस सफलता के साथ विनम्र बने रहना। इतिहास हमें यह सिखाता है कि प्रतिभा, परिश्रम और साहस मनुष्य को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन उनके साथ विनम्रता न हो, तो वही ऊंचाइयां पतन का कारण भी बन जाती हैं।
संसार में अधिकांश संघर्ष, विवाद और अहंकार का मूल कारण यही है कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को परिस्थितियों का नियंत्रक, घटनाओं का निर्माता और दूसरों के जीवन का सूत्रधार समझने लगता है। जबकि इस विराट सृष्टि का संचालन किसी एक मनुष्य की इच्छा से नहीं, बल्कि कर्म, समय और प्रकृति की व्यवस्था से होता है।
इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण मिलते हैं, जहां अपार शक्ति रखने वाले शासकों को भी समय के सामने झुकना पड़ा। नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा के बल पर यूरोप के बड़े भाग पर अधिकार स्थापित कर लिया था। उसके निर्णय देशों की सीमाएं बदल देते थे और उसकी सेना के कदमों से साम्राज्य कांप उठते थे। धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि इतिहास उसी की इच्छा से लिखा जाएगा। मगर इतिहास कभी किसी एक व्यक्ति का नहीं होता।
कहा जाता है कि एक दिन एक वृद्ध सैनिक ने नेपोलियन से पूछा कि ‘महाराज, क्या आपने पूरी दुनिया जीत ली?’ नेपोलियन ने गर्व से उत्तर दिया, ‘लगभग।’ सैनिक ने फिर पूछा, ‘तो क्या समय भी आपके आदेश से चलता है? क्या मृत्यु आपकी अनुमति लेकर आती है? क्या कल का सूरज आपके संकेत पर उगेगा?’ इस प्रश्न का उत्तर नेपोलियन के पास नहीं था। उसने स्वीकार किया कि यह किसी मनुष्य के वश में नहीं। सैनिक ने केवल इतना कहा, ‘जो समय को नहीं जीत सकता, वह संसार का सूत्रधार कैसे हो सकता है?’
कुछ वर्षों बाद वाटरलू के युद्ध ने उसकी अजेय छवि को तोड़ दिया। विश्व-विजेता कहलाने वाला सम्राट पराजित हुआ, सत्ता छिन गई और उसे सेंट हेलेना के एक छोटे-से द्वीप पर निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। विजय का शोर समाप्त हो चुका था। अब उसके पास केवल आत्मचिंतन का समय था।
समय की सीख: कोई भी पद, धन या शक्ति मृत्यु और नियति को नहीं रोक सकता
यही समय मनुष्य को वह सिखा देता है, जो हजारों प्रशंसा नहीं सिखा पाती। यह कथा हर उस व्यक्ति की है जो किसी पद, अधिकार, धन या सफलता के कारण स्वयं को सबसे बड़ा मान बैठता है। आज किसी के पास ऊंचा पद है, किसी के पास अथाह धन है, किसी के पास राजनीतिक शक्ति है, किसी के पास प्रसिद्धि है। पर क्या इनमें से कोई भी समय को रोक सकता है? क्या कोई मृत्यु को टाल सकता है? क्या कोई अपने जीवन की हर घटना को नियंत्रित कर सकता है? उत्तर है- नहीं। यही सत्य हमें विनम्र बनाता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हमें बड़े सपने नहीं देखने चाहिए या सफलता प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ यह है कि सफलता को अपना स्वामी नहीं बनने देना चाहिए। जो व्यक्ति सफलता के साथ विनम्र रहता है, वही लंबे समय तक लोगों के हृदय में स्थान बनाता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अहंकार में डूब जाता है, वह धीरे-धीरे लोगों का विश्वास खो देता है। इतिहास बताता है कि साम्राज्य बाहरी शत्रुओं से कम और भीतर के अहंकार से अधिक टूटते हैं।
डर से नहीं, अपने ही संदेह से हारता है इंसान; सपनों की सबसे बड़ी बाधा है अपना भय | दुनिया मेरे आगे
आज के जीवन में भी यह शिक्षा उतनी ही प्रासंगिक है। कार्यालय में पद मिलने पर, व्यवसाय में लाभ होने पर, समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होने पर या परिवार में अधिकार मिलने पर अगर हम स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं, तो हम उसी भूल की ओर बढ़ रहे होते हैं, जिसने इतिहास के अनेक महान लोगों को गिराया। नेतृत्व का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व निभाना है।
शक्ति का अर्थ दूसरों को झुकाना नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर चलना है। सफलता का अर्थ केवल ऊंचाई पर पहुंचना नहीं, बल्कि वहां पहुंचकर भी इंसान बने रहना है। मनुष्य प्रयास कर सकता है, पर अंतिम परिणाम अनेक परिस्थितियों और उस व्यापक व्यवस्था पर निर्भर करता है, जिसे हम ईश्वर, समय, प्रकृति या नियति कहते हैं। इसलिए सफलता मिलने पर कृतज्ञ रहना और असफलता मिलने पर धैर्य रखना ही जीवन की सच्ची बुद्धिमानी है।
असली विजय: स्वयं के अहंकार और क्रोध पर जीत ही सबसे बड़ी जीत है
सबसे बड़ी विजय किसी दूसरे व्यक्ति, किसी राज्य या किसी प्रतियोगिता पर नहीं होती। सबसे कठिन और सबसे मूल्यवान विजय अपने भीतर छिपे अहंकार, लालच और क्रोध पर होती है। जिसने स्वयं को जीत लिया, उसे बाहरी विजय की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा व्यक्ति पद मिलने पर भी विनम्र रहता है और पद छिन जाने पर भी शांत रहता है। उसकी पहचान उसके चरित्र से होती है, न कि उसके सिंहासन से। हम सफलता का स्वागत करें, पर उसे अपने सिर पर न चढ़ने दें।
अधिकार मिले तो उसे सेवा का माध्यम बनाएं, शक्ति मिले तो उसका उपयोग संरक्षण के लिए करें, क्योंकि समय का चक्र किसी के लिए नहीं रुकता। आज जो शिखर पर है, वह कल इतिहास का एक अध्याय भर हो सकता है। सूत्रधार बनने की नहीं, श्रेष्ठ पात्र बनने की इच्छा रखनी चाहिए। अपनी भूमिका ईमानदारी, परिश्रम, करुणा और विनम्रता के साथ निभाना चाहिए। सिंहासन क्षणिक हैं, चरित्र शाश्वत है। सत्ता बदलती रहती है, समय चलता रहता है, लेकिन विनम्रता से जीया गया जीवन कभी पराजित नहीं होता।
इसलिए जीवन का उद्देश्य संसार की प्रत्येक डोर अपने हाथ में लेने का नहीं, बल्कि अपने हिस्से की डोर को ईमानदारी, निष्ठा और विनम्रता से संभालने का होना चाहिए। इतिहास की सबसे बड़ी सीख यही है कि सत्ता, संपत्ति और प्रसिद्धि क्षणभंगुर हैं, किंतु विनम्रता, सद्कर्म और चरित्र अमर हैं। इसलिए दूसरों पर नहीं, स्वयं पर विजय प्राप्त करना चाहिए, क्योंकि संसार को जीतने वाले अनेक हुए हैं, पर स्वयं को जीतने वाले ही वास्तव में महान कहलाए।
