भारत ने ग्रेटर निकोबार विकास परियोजना शुरू की है। इस पर लगभग एक लाख करोड़ रुपए की राशि खर्च होने का अनुमान है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम की देखरेख में शुरू की गई इस परियोजना के तहत एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ‘ट्रांस-शिपमेंट टर्मिनल’, नागरिक एवं सैन्य हवाई अड्डा, गैस संचालित विद्युत संयंत्र और एक हरित शहर (ग्रीनफील्ड टाउनशिप) का निर्माण किया जाएगा।
मलक्का जलडमरूमध्य के करीब होने के कारण भारत की यह पहल हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की व्यापारिक और रणनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए कई मायनों में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकती है। चीन के कुल तेल आयात का लगभग अस्सी फीसद इसी मार्ग से होकर गुजरता है। भारत के इस फैसले को हिंद महासागर में शक्ति संतुलन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
परियोजना को तीन चरणों में 2047 तक पूरा किया जाएगा
अंडमान सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप को आर्थिक और रणनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनाने के लिए देश के नीति आयोग ने वर्ष 2021 में ग्रेटर निकोबार विकास परियोजना की संकल्पना की थी। इसका मुख्य लक्ष्य हिंद महासागर में भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाना और विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करना है। इस वृहद परियोजना को तीन चरणों में वर्ष 2047 तक पूरा किया जाना है।
हालांकि परियोजना को शुरू करने के साथ ही विपक्षी दलों, पर्यावरणविदों और यहां के मूल निवासियों के अधिकारों का समर्थन करने वाले सामाजिक संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया भी सामने आ रही है। उनका आरोप है कि इस परियोजना से वन क्षेत्र को नुकसान होगा और पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा जाएगा। यह आशंका जताई जा रही है कि द्वीप को विकसित करने के नाम पर लगभग दस लाख पेड़ों को काटा जा सकता है, जिससे तकरीबन 130 वर्ग किलोमीटर का प्राचीन वन क्षेत्र नष्ट हो सकता है।
दीर्घकालिक लाभ तात्कालिक नुकसान से अधिक महत्त्वपूर्ण: NGT
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने बीते फरवरी में राष्ट्र की सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए इस परियोजना को जरूरी बताकर पर्यावरणीय एवं तटीय स्वीकृतियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था। पीठ का कहना था कि परियोजना के दीर्घकालिक लाभ (समुद्री सुरक्षा में वृद्वि, विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता में कमी और मजबूत प्रतिरक्षा क्षमता) तात्कालिक नुकसान से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
एनजीटी ने अपने फैसले में पर्यावरण सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन करने की आवश्यकता पर भी बल दिया था। इसके बाद सरकार ने स्पष्ट किया कि 97.30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण की योजना बनाई गई है और इस क्षेत्र में आदिवासी समुदायों के हितों का पूरा खयाल रखा जाएगा।
क्रा नहर हकीकत बनी तो बड़ा चैलेंज होगी
दरअसल, कुछ दिनों पहले देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और समुद्री हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली दो बड़ी घटनाएं हुईं। पहली, इंडोनेशिया सरकार द्वारा मलक्का जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की कोशिश और दूसरी चीन द्वारा थाइलैंड पर ‘क्रा नहर’ (थाई नहर) के निर्माण के लिए दबाव डालना।
खबरों के मुताबिक, होर्मुज जलमार्ग में ईरान की ओर से जहाजों से शुल्क वसूलने के प्रयासों से प्रेरित होकर इंडोनेशिया ने हाल में सुझाव दिया था कि मलेशिया और सिंगापुर को उसके साथ मिलकर संयुक्त रूप से मलक्का जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाना चाहिए और राजस्व को तीनों देशों के बीच बराबर-बराबर बांट लिया जाना चाहिए।
हालांकि, वैश्विक स्तर पर कड़ी प्रतिक्रिया के बाद इंडोनेशिया ने अपने कदम पीछे खींच लिए थे, क्योंकि वह संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि से बंधा हुआ है, जो अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही सुनिश्चित करती है। मगर इंडोनेशिया के इस सुझाव ने भविष्य में संभावित संकट की आशंका पैदा हर दी है।
‘ट्रांसशिपमेंट पोर्ट’ बनाकर हितों को सुरक्षित करना चाहता है भारत
ऐसे में अगर यह जलमार्ग बाधित होता है, तो भारत के सामने ऊर्जा और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। यही वजह है कि भारत निकोबार द्वीप पर ‘ट्रांसशिपमेंट पोर्ट’ बनाकर अपने हितों को सुरक्षित करना चाहता है।
चीन की नहर निर्माण योजना भी भारत के लिए सामरिक चुनौती पैदा कर सकती है। हालांकि, थाईलैंड ने अभी चीन के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में भी थाईलैंड अपने इसी रुख पर कायम रहेगा।
देरे-सवेर अगर चीन यहां नहर बनाने में कामयाब होता है, तो यह भारत की भू-रणनीतिक स्थिरता के लिए बड़ी चुनौती होगा। नहर निर्माण के बाद दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर के बीच 1,200 किमी की दूरी कम हो जाएगी। नतीजतन, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और बंगाल की खाड़ी के तटीय क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा चीन की पहुंच में जाएगा।
यही वजह है कि भारत, इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप से करीब 150 किलोमीटर दूर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप को विकसित कर अपनी सामरिक स्थिति मजबूत करना चाहता है, ताकि देश की नौसेना हिंद महासागर से गुजरने वाले चीनी जहाजों पर नजर रख सके।
मलक्का जलमार्ग से होता है चीन का 80% आयात
चीन अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग अस्सी फीसद और व्यापार का एक बड़ा हिस्सा मलक्का जलमार्ग के रास्ते आयात करता है। ग्रेट निकोबार में भारत के इस नए सैन्य एवं वाणिज्यिक केंद्र के निर्माण से मलक्का जलमार्ग पर देश की स्थिति रणनीतिक रूप से काफी मजबूत हो जाएगी। विषम परिस्थितियों में जरूरत पड़ने पर भारत इस जलमार्ग के जरिए चीन की ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर सकता है और नाकाबंदी के जरिए स्थिति को नियंत्रित कर सकता है।
इसके अलावा, भारत दक्षिण चीन सागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए वियतनाम, फिलिपींस और इंडोनेशिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ रक्षा और रणनीतिक संबंधों को गहरा करने की रणनीति पर भी काम कर रहा है। अभी तक मालवाहक जहाजों के परिवहन के लिए भारत सिंगापुर और कोलंबो जैसी विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर है।
‘अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल’ से भारत का बड़ा फायदा
निकोबार द्वीप के विकास के बाद भारत के पास खुद का ‘अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल’ होगा, जिससे मुख्य मार्गों से गुजरने वाले बड़े जहाजों के लिए निकोबार में रुकना और माल की अदला-बदली का काम आसान हो जाएगा।
वर्तमान में भारत के लगभग पच्चीस फीसद माल की विदेशी बंदरगाहों पर अदला-बदली होती है। मगर निकोबार में यह सुविधा उपलब्ध हो जाने से समय और परिवहन खर्च दोनों की बचत होगी। परिणामस्वरूप भारत को हर साल लगभग 1500 से 1800 करोड़ रुपए का फायदा होने का अनुमान है। साथ ही हिंद महासागर में चीन की आक्रामकता को रोकने और भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी।
दरअसल, पिछले कुछ दशकों से भारत की घेराबंदी के लिए चीन हिंद महासागर में पाकिस्तान के ग्वादर से लेकर श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमा के क्योकप्यू और जिबूती में बंदरगाहों का बड़ा नेटवर्क तैयार कर चुका है। चीन के इस आक्रामक रवैये और विस्तारवादी नीतियों के प्रभाव को कम करने के लिए भारत जिस बहुआयामी रणनीति को धार देने की कोशिश कर रहा है, ग्रेटर निकोबार विकास परियोजना उसी रणनीति का हिस्सा है।
(नंदकिशोर सोमानी का लेख)
