समाज में न जाने कितने ऐसे लोग हैं, जो गहन अध्ययन करने के बाद अनेक मामलों में विशेषज्ञ की तरह हो जाते हैं, लेकिन ऐसे भी लोग हैं, जो ज्ञान का अतिरेक होने पर दंभ के शिकार भी हो जाते हैं। वे अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते। ऐसे लोग कुछ कम पढ़े-लिखे लोगों को हीन दृष्टि से देखने लगते हैं।

मगर यह भी सच है कि ऐसे लोग धीरे-धीरे समाज से कटते जाते हैं और अपने दंभ की दुनिया में लीन रहकर ही खुश रहते हैं। जबकि हमारे यहां कहा गया है कि फलदार वृक्ष झुक जाते हैं, उदार हो जाते हैं। किसी अज्ञानी माने जाने वाले व्यक्ति से भी वे बड़े प्रेम से मिलते हैं।

ठीक उसी तरह, जैसे किसी बच्चे से बड़े लोग प्रेम से बतियाते हैं और उसकी नादानी को अनदेखी करके उसके साथ खेलते हैं। इससे यह भी संभव है कि अज्ञानी व्यक्ति ज्ञान की राह पकड़ ले।

यों भी हर व्यक्ति ज्ञानी या महाज्ञानी नहीं हो सकता। इसी तरह हर कोई प्रखर अध्ययनशील नहीं हो सकता… हर कोई हर क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता। तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह उपेक्षा का पात्र है। वह भी इसी समाज का अंग है। उसने भी मेहनत की, मगर वांछित सफलता नहीं मिल सकी। इसलिए उसके साथ भी प्रेमपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए।

हालांकि ऐसा होता नहीं है। कुछ लोग ऐसे भी दिखाई देते हैं, जो अपनी धार्मिकता को लेकर बड़े ही आक्रामक होते हैं। वे हर जगह अपनी धार्मिकता का ढोल पीटते नजर आते हैं और कहते हैं कि मैं तो इतने उपवास करता हूं… इतने घंटे पूजा-अर्चना करता हूं।

धार्मिक व्यक्ति में होनी चाहिए सात्विकता

मगर सच यह है कि उनके आचरण में उनके पूजा-पाठ का कोई अंश नजर नहीं आता। वे हर घड़ी कटुता से भरे रहते हैं। उनके मुंह से प्रेम के बोल नहीं फूटते। कभी-कभी तो ऐसे लोग गालियां भी देते दिखते हैं। इस तरह के कुछ लोग भले ही खुद को सात्विक बताते हों, सादे वस्त्रों में रहते हों, लेकिन उनके आचरण में वह सात्विकता नजर नहीं आती, जो किसी धार्मिक व्यक्ति में सहज ही होनी चाहिए।

धार्मिकता अगर मनुष्य को बेहतर और ज्यादा मानवीय न बनाए, तो वह बेकार है। ज्ञान अगर मनुष्य को विनम्र न बनाए, सहिष्णु न बनाए, उदार न बनाए, तो ऐसा ज्ञान किस काम का? केवल किताबों में दर्ज बातों को याद कर लेना ज्ञान नहीं होता। ऐसा ज्ञान रटने वाले को तोता की तरह कहा जाएगा। तोता जो सुनता है, वही दोहराने लगता है। फिर चाहे भजन हो या अपशब्द, लेकिन जो व्यक्ति विवेकशील है, वह जो ग्रहण करता है, उसके अनुरूप आचरण भी करता है। इसीलिए वह तोते से अलग होता है।

जिसे आत्मज्ञान हो चुका है, वह विनम्र होगा

अगर कोई अध्ययनशील ज्ञानी व्यक्ति अपने व्यवहार में कटु है, अभद्र है, तो इसका मतलब यह हुआ कि वह सही मायने में सच्चा ज्ञानी नहीं है। उसके पास केवल किताबी ज्ञान है। उसे अभी आत्मज्ञान नहीं हुआ है। जिसे आत्मज्ञान हो चुका है, वह विनम्र होगा, उदार होगा। वह सबकी बातें ध्यान से सुनेगा। वह किसी को अपने से कमतर नहीं समझेगा।

समस्या यह है कि चाहे ज्ञान का मामला हो या धन-दौलत का, आमतौर पर जिसके पास अधिक मात्रा में होता है, वह अपने आप को विशिष्ट समझने लगता है। धनी व्यक्ति निर्धन व्यक्ति को देखकर दूरी बना लेता है। वह किसी की आर्थिक मदद नहीं करना चाहता, जबकि उसके पास जो धन आया है, वह इसी समाज से अर्जित है. लेकिन वह यह बात समझ नहीं पाता और कृपण बना रहता है।

समाज में हमेशा दानी या उदार व्यक्ति को महत्त्व मिलता है

मगर जो व्यक्ति उदार होकर अपने धन को सामाजिक कार्यों में खर्च करता है, तो उससे उसकी प्रतिष्ठा ही बढ़ती है. लोग उसे आदर के साथ देखते हैं। बुला कर उसका सम्मान भी करते हैं। मगर जो व्यक्ति विशुद्ध रूप से धनपशु बना रहता है, वह एक दिन खा-पीकर मर जाता है, तब भी सब उसकी निंदा ही करते हैं।

समाज में हमेशा दानी या उदार व्यक्ति को महत्त्व मिलता है। फिर चाहे वह ज्ञान दान करे,चाहे धन दान करे, चाहे श्रमदान करे। दशरथ मांझी जैसे लोग श्रमदान करके अमरता को प्राप्त कर जाते हैं। उदारता, विनम्रता, सहिष्णुता- ये तमाम गुण बेहतर मनुष्य के लक्षण होते हैं। जिनमें ऐसे लक्षण नहीं होते, उनकी राह अलग हो जाती है। कई बार वे अपराध के मार्ग भी पर चल पड़ते हैं।

अपराध सिर्फ हत्या, बलात्कार या चोरी-डकैती ही नहीं है, किसी का दिल दुखाना भी अपराध है। किसी को अपने से छोटा समझना अपराध है। किसी सज्जन का उपहास उड़ाना भी अपराध है। किसी अच्छे व्यक्ति की उपेक्षा करना अपराध है। किसी को कम ज्ञान है, यह समझ कर उसे हेय दृष्टि से देखना अपराध है।

अगर कोई ज्ञानी है, तो अपने ज्ञान को उदारता के साथ सबको बांटते रहना चाहिए। अधिक धन है, तो उसे भी उदारता के साथ बांटना चाहिए। अक्सर ऐसा होता नहीं है। जो लोग ऐसा नहीं करते, वे अपनी सीमित दुनिया में मगन रहते हैं, लेकिन जब कभी एकांत में आत्ममंथन करते हैं कि क्या खोया, क्या पाया की सूक्ति पर विचार करते हैं, तब पता चलता है कि उन्होंने पाया तो बहुत कुछ, लेकिन खोया उससे भी कहीं ज्यादा।

मगर जो ज्ञानीजन होते हैं, वे कुछ नहीं खोते, बल्कि निरंतर पाते ही रहते हैं। यह पाना ही उनकी वास्तविक कमाई है। असल पूंजी है। इसका सुख वही व्यक्ति उठा सकता है, जो निर्मल मन वाला है, उदार है और समरसताजीवी है।