दुनिया भर के पर्यावरण वैज्ञानिकों के समक्ष इस समय एक बड़ी चुनौती है। यह चुनौती है धरती की कोख में कार्बन का भंडार कम होने की। यानी मिट्टी में कार्बन की मात्रा कम जमा हो रही है। सामान्यत: यह किसी को जानकर अटपटा लग सकता है, लेकिन सच यही है कि हमारी धरती वायुमंडल में कार्बन की मात्रा अत्यधिक होने के कारण जलवायु असंतुलन पैदा होने अथवा बढ़ने से बचाने के लिए अपनी कोख में जहरीले कार्बन जमा कर लेती है। ऐसा इसलिए कि जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से मनुष्यों और जीव-जंतुओं का बचाव हो सके।
गौरतलब है कि मिट्टी में जमा होने वाले कार्बन की मात्रा वायुमंडल द्वारा सोखे जाने वाले कार्बन की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक होती है। कार्बन सोखने के मामले में वायुमंडल की अपेक्षा धरती की क्षमता तीन गुना अधिक होती है।
इस प्रकार देखा जाए, तो मिट्टी द्वारा कार्बन सोखे जाने की यह प्रक्रिया जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खास बात यह भी है कि कार्बन अधिक से अधिक संग्रहीत करने में मिट्टी अकेले ही भूमिका नहीं निभाती, बल्कि इसमें अनेक सूक्ष्म जीवों की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है, जो मिट्टी में घुल-मिल कर रहते हैं। इसलिए हम सभी लोग धरती और सूक्ष्म जीवों के ऋणी हैं। हमें इनका आभार मानना चाहिए, क्योंकि ये रात-दिन परिश्रम कर वायुमंडल में कार्बन कम करने का कार्य करते हैं, ताकि हमारे फेफड़ों की सेहत अच्छी बनी रहे। भारतीय संस्कृति में तो सदा से ही सभी जीवों और तत्त्वों के प्रति कृतज्ञ बने रहने और उनके साथ सम्मान, सहयोग, सहभागिता और सहायता के माध्यम से आगे बढ़ने की बात कही जाती रही है।
हमारी संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत ‘जियो और जीने दो’ का तात्पर्य ही यही है कि हम एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए आपसी तालमेल के साथ जीवनयापन करें। उदाहरण के लिए मिट्टी के बिना उसमें घुल-मिल कर रहने वाले सूक्ष्म जीवों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। वहीं, मिट्टी और सूक्ष्म जीवों के बिना मनुष्य आदि प्राणियों के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। तात्पर्य यह कि सृष्टि के सभी प्राणी एक-दूसरे पर आश्रित हैं। पृथ्वी पर प्राय: सभी प्राणियों के लिए सुखमय जीवन जीने की अभिलाषा का मुख्य आधार ही परस्पर सभी जीवों और तत्त्वों के अस्तित्व को स्वीकार करना तथा उनके साथ पारस्परिकता के साथ जीना है। यही हमारे संस्कार हैं।
श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध में उल्लेखित ‘जीवो जीवस्य जीवनम्’ इसी बात का प्रमाण है। इसे ही आधुनिक समाज में ‘सहजीवन’ एवं ‘सह-अस्तित्व’ के रूप में जाना जाता है। सामान्यत: पारस्परिक निर्भरता वाले जीवों को एक-दूसरे के साथ होने से लाभ मिलता है। शैवाल और कवक पारस्परिक ‘सह-अस्तित्व’ के अच्छे उदाहरण हैं। ‘सहजीवन’ अन्य संस्कृतियों एवं विकसित समाजों के लिए भले ही एक नया शब्द और सिद्धांत प्रतीत होता हो, लेकिन हमारी वैदिक संस्कृति का प्रधान तत्त्व ही यही है, जो अनेक अवसरों पर विविध रूपों में पल्लवित-पुष्पित होता रहा है। ‘सहजीवन’ का परिपोषक ‘जियो और जीने दो’ केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन है।
पानी है, फिर भी प्यास क्यों? बढ़ता संकट और हमारी गलतियां खोल रही हैं भविष्य का खतरनाक सच | विचार
मनुष्य की जिजीविषा से जुड़ा भारतीय मनीषा का यह कल्याणकारी दर्शन अनेक प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में समाहित है। जिन संस्कृतियों एवं समाजों की इस दर्शन में आस्था नहीं, वे अक्सर युद्धरत रहते हैं। अजरबैजान और आर्मेनिया का युद्ध, सूडान और म्यांमार में गृहयुद्ध, चीन-ताइवान का संघर्ष, हैती में गिरोहों का आतंक, फिलीस्तीन-इजराइल और हमास युद्ध, रूस-यूक्रेन युद्ध तथा अमेरिका-इजराइल का ईरान से युद्ध इसके उदाहरण हैं। अब तक इन युद्धों और संघर्षों में बड़ी संख्या में निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं और घायल हुए। जो बचे भी हैं, उनका जीवन शायद अब पहले की तरह कभी नहीं हो पाएगा।
इसी प्रकार, धरती की कोख में कार्बन का भंडार कम होने का प्रमुख कारण भी यही है कि मनुष्य ने ‘जियो और जीने दो’ वाले प्राचीन भारतीय जीवन दर्शन को नकार दिया। कल्पना की जा सकती है कि यदि हम मिट्टी और इसमें पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों के प्रति संवेदनशील होते और अन्न की पैदावार बढ़ाने के लिए उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग न कर मिट्टी एवं सूक्ष्म जीवों की सुरक्षा के लिए समुचित कदम उठाए होते, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती।
इसी प्रकार, हम जल और जलीय जीव-जंतुओं के अस्तित्व की परवाह नहीं करते। नदियों-तालाबों में कूड़ा-कचरा और गंदगी डालकर उसे प्रदूषित करते रहते हैं। इसी संवेदनहीन व्यवहार का नतीजा है कि आज देश में कई जलाशय अपना अस्तित्व खो चुके हैं। आसमान में उड़ने वाले परिंदों के लिए भी हमारी संवेदना नहीं जागती।
अब जबकि मिट्टी में कार्बन की घटती मात्रा के कारण दुनिया भर में जलवायु संतुलन बिगड़ने लगा है, तब वैज्ञानिकों का ध्यान इस ओर गया और उन्होंने इस पर गहन शोध किया। अब उनका मानना है कि जलवायु में मिट्टी तथा सूक्ष्मजीवों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दरअसल, हम जिस धरती पर चलते हैं, वह केवल धूल से बनी मिट्टी भर नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड का एक बहुत बड़ा ‘कार्बन बैंक’ है। पर्यावरण वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि मिट्टी में हवा (वायुमंडल) की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक कार्बन का संरक्षण होता है।
यह कार्बन यदि मिट्टी में ही सुरक्षित रहे, तो इससे हमारा जलवायु-तंत्र संतुलित रहता है। वहीं, यदि मिट्टी में संरक्षित कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड बनकर हवा में घुल-मिल जाए, तो पृथ्वी के तापमान में तेजी से वृद्धि होगी। विज्ञान पत्रिका Nature Climate Change में प्रकाशित शोध का प्रमुख निष्कर्ष यह है कि मिट्टी में कार्बन को संरक्षित रखने में पानी की बहुत बड़ी भूमिका होती है।
इस अध्ययन के अनुसार, जब मिट्टी गर्म होकर सूख गई, तब उसमें संचित कुल कार्बन का लगभग 12.2 फीसद हिस्सा मिट्टी से गायब हो गया। अमेरिका में जमीन के 48 अलग-अलग टुकड़ों को वैज्ञानिकों ने अपनी प्रयोगशाला बनाकर 12 वर्षों तक शोध करने के बाद पाया कि जब मिट्टी गीली थी, तब उसमें मौजूद कार्बन की मात्रा में लगभग 6.7 फीसद की वृद्धि हुई। तात्पर्य यह कि मिट्टी में जल की मात्रा जितनी अधिक होती है, उसमें कार्बन को सोखकर अपने भीतर संरक्षित करने की क्षमता उतनी ही बढ़ जाती है।
हालांकि, यह बदलाव पौधों के कारण नहीं, बल्कि मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों के कारण आया। वैज्ञानिकों ने शोध के बाद माना कि गर्म और सूखे मौसम में सूक्ष्मजीव तनावग्रस्त रहते हैं। ऐसे में, जीवित रहने के लिए वे कार्बन का अधिक उपयोग करते हैं और फिर उसे कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में हवा में छोड़ देते हैं। वहीं, जब मिट्टी गीली होती है, तो सूक्ष्मजीव कार्बन का कम से कम उपयोग करते हैं, जो उनके विकास के लिए आवश्यक होता है। इससे वायुमंडल में कार्बन कम हो जाता है और उसकी अधिक मात्रा मिट्टी में ही संरक्षित रहती है। साथ ही, सूक्ष्मजीवों का पोषण भी बेहतर होता है। कार्बन का मिट्टी में सुरक्षित रहना सचमुच बेहद जरूरी है।
यह भी पढ़ें: पश्चिम एशिया का तनाव बना वैश्विक संकट: तेल, महंगाई और बाजारों पर बढ़ता दबाव | संपादकीय
पश्चिम एशिया में युद्ध और उससे उपजे तनाव के कारण न केवल इसमें शामिल पक्षों के रणनीतिक मोर्चे पर, बल्कि इसके असर की वजह से दुनिया भर में आर्थिक मोर्चे पर उथल-पुथल मची हुई है। तेल और गैस की कीमतों में उछाल से ज्यादातर देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। ईंधन के लिए मध्यपूर्व के देशों पर निर्भरता के कारण आयात पर बढ़ रहे खर्च को संभालना इस समय कई देशों के लिए बड़ी चुनौती है। सबसे बड़ा संकट यह है कि ईरान और अमेरिका के बीच गतिरोध के कारण वैश्विक अस्थिरता और इससे उपजी समस्या जटिल होती जा रही है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
