अक्सर हम समाज सेवा, देश की उन्नति और दूसरों के दुख में हाथ बंटाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ये बातें सुनने और कहने में बहुत गर्व का अनुभव कराती हैं, लेकिन क्या यह सब तब भी उतना ही सच्चा और प्रभावी रहता है, जब हम अपने ही परिवार के किसी सदस्य की सिसकियों को अनसुना कर देते हैं? क्या यह संभव है कि हम समाज के लिए ईमानदारी से कार्य करें, जबकि अपने ही घर के लोगों की तकलीफों को समझने और उनके सुख-दुख में सहभागी बनने का समय हमारे पास नहीं हो? सच यह है कि अगर हम अपने परिवार के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े नहीं हैं, उनके सुख-दुख को महसूस नहीं कर पाते, तो हमारी समाज सेवा और दूसरों के प्रति दया-भाव महज एक दिखावा है। यह असल में उस वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा है, जिसे हम स्वयं समझना और स्वीकार करना ही नहीं चाहते। सवाल है कि परिवार और संवेदना के साथ गहरे जुड़े होने की अपेक्षा पालने वाले समाज में एक दूसरे के बीच इस अदृश्य दूरी की संस्कृति कैसे और क्यों विकसित हुई?

आज का दौर सोशल मीडिया का है, जहां हर कोई दूसरों के लिए अच्छा दिखने की होड़ में लगा हुआ है। लोग समाज सेवा, इंसानियत और बड़े-बड़े बलिदानों की बातें करते हैं। यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे दूसरों के लिए सब कुछ कर सकते हैं। कभी-कभी वे मदद भी करते हैं, लेकिन क्या यह मदद वास्तव में सच्चे दिल से होती है? या यह केवल अपनी छवि बनाने के लिए की जाती है? यह देखकर दुख होता है कि जो लोग दूसरों के लिए स्वयं को त्यागने की बातें करते हैं, वे अपने ही घर के उन लोगों को अनदेखा कर देते हैं, जो उनके सबसे करीबी होते हैं।

समाज के लिए सब कुछ, परिवार के लिए कुछ भी नहीं? क्या हमारी संवेदना सिमट गई है?

मां-बाप, भाई-बहन, जीवन-साथी- इनके दुख, पीड़ा और संघर्ष को वे नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जैसे ही कोई बाहरी व्यक्ति मदद की गुहार लगाता है, वे तुरंत उसे अपना समय, पैसा और ऊर्जा देने को तैयार हो जाते हैं। किसी के लिए कुछ किए जाने या किसी की मदद करने के बदले कुछ अपेक्षा करना या फिर इस शर्त पर किसी की मदद करना क्या मदद की गरिमा को कम नहीं करता? सहायता के बदले में कोई लाभ मिलने की अपेक्षा मानवीय संवेदना की ईमानदारी को कठघरे में खड़ा करता है। इस तरह की सहायता को दरअसल सौदा कहना ज्यादा बेहतर होगा।

प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों होता है? क्या हमारी प्राथमिकताएं गलत हो चुकी हैं? क्या हमारी सोच इस हद तक बदल गई है कि हमें अपने अपनों का दर्द महसूस ही नहीं होता? जो लोग दिन-रात हमारे लिए काम करते हैं, हमारे हर सुख-दुख में साथ रहते हैं, उनकी अहमियत हमें क्यों नहीं समझ में आती? मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और बाहरी दुनिया में व्यस्तता ने हमारे रिश्तों को गहराई से प्रभावित किया है। दिन भर स्क्रीन पर उलझे रहना, आनलाइन अपनी ‘परफेक्ट इमेज’ यानी मुकम्मल छवि बनाने की कोशिश और दूसरों से तारीफें पाना हमारी प्राथमिकता बन गई है। परिवार, जो हमारी सबसे बड़ी ताकत और हमारे जीवन की नींव है, कहीं पीछे छूटता जा रहा है। एक पल के लिए भी याद रखना जरूरी क्यों नहीं समझते कि हम अपनी जीवन-यात्रा में आज जहां तक का भी सफर पूरा कर सके हैं, उसमें परिवार और माता-पिता की सबसे अहम भूमिका रही है?

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हम अपने घर के उन रिश्तों को क्यों नहीं गले लगाते, जिन्होंने हमें हमेशा सहारा दिया है? क्यों हम उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के बजाय उन्हें अकेला महसूस करने देते हैं? क्या यह स्वार्थ है, या समाज में अपनी छवि चमकाने की झूठी होड़? यह कहना गलत नहीं होगा कि समाज सेवा और दूसरों की मदद करना जरूरी है। यह हमारी इंसानियत का प्रतीक है, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि हम अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाएं। वे लोग, जो बिना किसी स्वार्थ के हमारे साथ खड़े रहते हैं, जो हमें निस्वार्थ प्रेम करते हैं, उनके दर्द को समझना और उनके सुख-दुख में सहभागी बनना हमारी पहली जिम्मेदारी है।

हमें अपने परिवार के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करना चाहिए। यह दिखाना चाहिए कि हम हर परिस्थिति में उनके साथ खड़े हैं। उनके दुख के समय उन्हें गले लगाना, उनके संघर्ष में साथ देना और उन्हें यह विश्वास दिलाना कि वे हमारे लिए कितने खास हैं, यह सब हमारी प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं है। यह वह आधार है, जो हमें मजबूत बनाता है। यह वह जड़ है, जिससे हमारा जीवन पनपता है। अगर हम इस जड़ को ही भूल जाएंगे, तो हमारी बाकी सभी उपलब्धियां खोखली और अस्थायी सिद्ध होंगी।

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समाज सेवा और परोपकार महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन वे तब तक अधूरे हैं, जब तक हम अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से नहीं निभाते। परिवार का अर्थ बहुत व्यापक है, लेकिन इसके बिना जीवन अधूरा है। अगर हम अपने सबसे करीबी रिश्तों में प्रेम, विश्वास और समर्पण नहीं दिखा सकते, तो बाहरी दुनिया के लिए किया गया हर प्रयास केवल एक छलावा बनकर रह जाता है। सच्चा इंसान वही है, जो अपने परिवार और समाज- दोनों के प्रति संतुलन बनाए रखता है तथा जो अपने परिवार को यह एहसास दिला सके कि वे उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हैं और समाज के प्रति भी अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करे। यही वास्तविकता है और यही जीवन की सच्ची उपलब्धि।