हम सब उस शहर के किराएदार हैं, जहां मकान-मालिक का नाम ‘लोग क्या कहेंगे’ है। सुबह आंख खुलते ही अलार्म से पहले जो चीज हम देखते हैं, वह हमारा अपना चेहरा नहीं, बल्कि उस शीशे पर जमी धूल है, जो दुनिया ने हमें थमा दी है। इंस्टाग्राम की स्क्रीन पर अंगुलियां घिसते-घिसते हमने अपनी जिंदगी को कॉफी की एक ऐसी दुकान बना दिया है, जहां कॉफी ठंडी हो चुकी होती है, मगर उसका कोण सही होना चाहिए।

अक्सर हम उस अजीब-सी उदासी का जिक्र करते हैं, जो रात को दो बजे, पंखे की चरमराहट सुनते हुए सीने पर बैठ जाती है। हम सब उसी उदासी के मारे हुए लोग हैं। हमने जिंदगी को ‘जीने’ के बजाय ‘दिखाने’ की एक ऐसी होड़ में झोंक दिया है, जहां जीतने वाले को सिर्फ तालियों का शोर मिलता है, किसी अपने की गर्माहट नहीं। बशीर बद्र साहब ने कभी इसी खोखलेपन पर लिखा था- ‘दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’

दिल्ली में कनाट प्लेस के किसी महंगे रेस्तरां में, जहां एक कप कॉफी के पैसे में घर का हफ्ते भर का राशन आ सकता है, दो लोग आमने-सामने बैठे होते हैं। उनके सामने दो खामोशियां बैठी होती हैं और होते हैं चमकदार मोबाइल फोन। बैरा जब कुछ खाने की थाली सामने रखता है, तो पहले उनके मुंह में लार नहीं आती, फोन का कैमरा खुलता है। खाने का स्वाद जीभ से होकर रूह तक जाने से पहले इंटरनेट के सर्वरों तक पहुंचता है।

हम अपनी सबसे सच्ची कहानियां कब बयां करते हैं? जब कोई देखने वाला नहीं होता। यानी तब, जब किसी छोटी-सी बालकनी में आधी बुझी उम्मीदें कांपती हैं, या जब रसोई के सिंक में जूठे बर्तन धोते हुए नल की धार के साथ आंख से एक कतरा गाल पर फिसल जाता है। वह रोना सच्चा होता है, लेकिन उसकी कोई कहानी नहीं बनती। दिखावे के इस बाजार में हर आंसू की कीमत तभी है, जब उसके पीछे कोई पार्श्व संगीत चल रहा हो। हम किस्तों पर लिए गए सोफे पर बैठकर उन दोस्तों के ‘स्टेटस’ देखते हैं, जिन्हें हम मन ही मन नापसंद करते हैं, फिर भी एक लाल दिल वाली प्रतिक्रिया छोड़ देते हैं, ताकि हमारा दायरा ‘सभ्य’ दिखे।

यह दिखावा सिर्फ गैजेट, कपड़ों और घूमने-फिरने तक महदूद नहीं रहा। इसने हमारी पीड़ा और रिश्तों को भी अपनी मंडी में सजा दिया है। एक तस्वीर है कि गांव से मां का फोन आया। आवाज में वही पुरानी खांसी और वही ठहरा हुआ सवाल, कि लल्ला, घर कब आएगा? हमने स्क्रीन देखते हुए कह दिया कि मां, इस हफ्ते बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है, इस बार वक्त नहीं है। मगर उसी रात हम किसी महंगे रेस्तरां या बार में तीस हजार का बिल चुका रहे होते हैं और उसे दुनिया को दिखाते हुए सोशल मीडिया पर टिप्पणी लिख रहे होते हैं।

मां के वे हाथ, जो जाड़े में फटी बिवाइयों पर सरसों का तेल लगाकर हमारे लिए पराठे सेंकते थे, आज उस चमकते हुए स्क्रीन के आगे हार गए। हमने मां की बेबसी को ‘निजता’ का नाम दे दिया और अजनबियों की वाहवाही को ‘कामयाबी’। किसी शायर ने कितनी बेदर्दी से यह सच बयां किया था- ‘बनाकर फकीरों का हम भेस गालिब, तमाशा-ए-अहले-करम देखते हैं।’ फर्क सिर्फ इतना है कि गालिब तमाशा देखने के लिए फकीर बने थे, और हम तमाशा बनने के लिए अमीरी का लिबास ओढ़े फिरते हैं, जबकि भीतर से उस बूढ़ी मां के आशीर्वाद के लिए भी कंगाल हो चुके हैं।

आत्मा का यह खोखलापन उस खंडहर जैसी आवाज करता है, जिसमें कोई परिंदा भी फड़फड़ाए तो दिल दहल जाता है। सच यह है कि हम सच की खुरदुरी जमीन छोड़कर झूठ के मखमली गद्दे पर सो रहे हैं, जहां नींद नहीं आती, सिर्फ एक नशा होता है। हम हर उस चीज के गुलाम हैं, जिसकी हमें जरूरत नहीं है। सिर्फ इसलिए कि उस इंसान को नीचा दिखा सकें, जिसे हम पसंद नहीं करते।

हमने वे घर खरीदे जहां धूप नहीं आती, मगर बालकनी से शहर का ‘स्काईलाइन’ दिखता है। हमने वे गाड़ियां लीं, जिनकी किस्तों ने हमारे सीने का चैन छीन लिया, ताकि जब हम किसी चौराहे की लालबत्ती पर रुकें, तो बगल में खड़ा तिपहिया वाला हमारी तरफ हसरत से देखे। उस तिपहिया वाले को क्या पता कि उस शीशे के भीतर एसी की ठंडक में बैठा इंसान अवसाद की गोलियां पानी के बिना गटक रहा है, ताकि उसका दम न घुट जाए। हम जिंदा लाशों का वह काफिला हैं, जो सिर्फ इसलिए तेज चल रहा है, ताकि पीछे वालों को लगे कि हम मंजिल के करीब हैं।

रात जब गहराती है और स्मार्टफोन शांत हो जाते हैं, तब जो खामोशी कमरे में उतरती है, वही हमारा असली वजूद है। उस सन्नाटे में अपना हाथ अपने सीने पर रखने और धड़कन को महसूस करने की जरूरत है। वह धड़कन हमसे पूछती है कि इस पूरी अंधी दौड़ में तुम किसे हराने निकले थे और किसे गंवा बैठे!

जब मौत का फरिश्ता या जिंदगी का आखिरी पहर आएगा, तो दुनिया के किसी फॉलोअर की संख्या काम नहीं आएगी, न ही वह महंगे ब्रांड की घड़ी उस वक्त के एक सेकंड को बढ़ा पाएगी। उस वक्त सिर्फ यह याद आएगा कि जब हंसना था, तब हम कैमरे के लिए मुस्कुरा रहे थे, जब गले लगना था, तब हम हवाईअड्डा जा रहे थे और जब जीना था, तब हम सिर्फ सबूत जुटा रहे थे कि हम जी रहे हैं।

उस आखिरी हिचकी से पहले अगर आंखों से वह पानी न गिरे, जो इस सारे ढोंग को धो दे, तो समझ लेना चाहिए कि हम बिना मरे ही कब्र में उतर गए थे। उस खालीपन को भर लेने की जरूरत है, इससे पहले कि किसी शाम बहुत देर हो जाए और दीवार पर टंगी हमारी तस्वीर के नीचे कोई अजनबी ‘रेस्ट इन पीस’ लिखकर अपनी जिंदगी की अगली झूठी रील बनाने निकल जाए।