Dunia Mere Aage: किसी भी समाज को गहराई से समझना हो, तो सबसे गहरी पहचान का माध्यम भाषा होती है। मर्यादा को तार-तार करती भाषा व्यक्ति या समूह की कुंठाओं की सबसे बड़ी परिचायक है। यहां गालियों की बात नहीं हो रही है। उनका एक अपना समाजशास्त्र है और समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी।
यहां बात है आपसी संवाद के दौरान प्रयुक्त होने वाली भाषा की। बल्कि आपसी संवाद के लिए सोशल मीडिया मंचों पर उपयोग में लाई जाने वाली भाषा की। ये सामान्यत: दो बड़े समूहों में विभाजित किए जा सकते हैं। पहला वह, जो बड़े समूहों को समाहित कर सकते हैं- जैसे ‘फेसबुक’ या ‘एक्स’। ऐसे समूहों में आवश्यक नहीं कि जुड़ने वाले लोग हमें व्यक्तिगत रूप से जानते हों।
यह वास्तविक आभासी दुनिया है, जिसमें हम लोगों के लाइक और कमेंट्स से अपनी छवि का निर्माण करते हैं। यह आभासी दुनिया एक ऐसी खतरनाक खाई है, जिसमें हम गिरें तो गिरते ही जाते हैं। इस आभासी दुनिया में भाषा का उपयोग एक मारक हथियार के तौर पर होता है और भाषा का स्तर कभी-कभी इतना गिर जाता है कि पता ही नहीं चलता कि संवाद चल रहा है या गाली-गलौज। चूंकि लिखने वाला आवश्यक नहीं कि हमें व्यक्तिगत रूप से जानता हो, इसलिए लिखते समय वह हमें संबोधित नहीं कर रहा होता है, उस विचार से संबोधित कर रहा होता है, जिस पर वह प्रतिक्रिया दे रहा है।
आभासी दुनिया का यह खतरा एक मायने में सुविधाजनक है कि हम ऐसी टिप्पणी डालने वालों को अपनी दोस्त सूची से बाहर कर सकते हैं या ब्लाक कर सकते हैं। दूसरा यह कि संवाद के ये माध्यम अब सार्वजनिक मंच के रूप में सर्वमान्य हैं, इसलिए ऐसे मंच के ऊपर की गई टिप्पणियां कानूनी कार्रवाई के लिए भी खुली हैं। यानी अगर हम किसी आभासी मंच के आभासी व्यक्ति नहीं हैं- जिसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, तो हम अपनी टिप्पणियों के लिए जेल की हवा भी खा सकते हैं। ऐसे मंच की भाषा का अपना एक अलग संसार है और इसे अलग खांचे में रखे जाने की आवश्यकता है।
आभासी दुनिया के संवाद का दूसरा माध्यम वाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल जैसे एप हैं। आमतौर पर उन एप पर व्यक्तिगत संवाद के अतिरिक्त सामूहिक संवाद के भी रास्ते खुले हैं। ऐसे समूह फेसबुक आदि से इस मायने में भिन्न हैं कि ये किसी एडमिन द्वारा संचालित होते हैं और प्राय: समूह के सदस्य एक दूसरे से परिचित होते हैं। व्यक्ति के रूप में नहीं भी हो, तो समूह के रूप में। जैसे कालेज के विद्यार्थियों अथवा शिक्षकों का समूह।
कोशिश होनी चाहिए कि ऐसे वाट्सएप समूहों की भाषा के कुछ पहलुओं की थोड़ी पड़ताल हो सके।
वाट्सएप समूह या समूह में भाषा के तौर-तरीके को देखते हुए कई बार महसूस किया जा सकता है कि भाषा किस प्रकार एक वर्चस्ववादी समूह की मनोवृत्ति को उजागर करती है। किस प्रकार कोई एक समूह अपने निहित स्वार्थों के लिए भाषा को एक सशक्त हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। लच्छेदार हिंदी या अंग्रेजी द्वारा किस प्रकार अपनी विद्वता का आतंक फैलाकर औरों को नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है।
किस प्रकार उकसाने के लिए अपने ही सहयोगियों का- बिना नाम लिए भी- कुत्ते की उपमा दी जाती है। किस प्रकार औरों को स्वार्थी या कायर और भयभीत बताकर खुद को अथवा अपने समूह को स्वार्थरहित- निडर-निर्भीक बताया जाता है। भाषा का यह मायाजाल ऐसे बुना जाता है कि अगर हम एक बार उसके दलदल में धंसे तो हमारी मुश्किल ज्यादा जटिल हो जाती है।
भाषा के इस दलदल से निकलने का कोई रास्ता भी नहीं है। कई बार हम समूह छोड़ भी नहीं सकते। हमारे पास एक विकल्प होता है कि इन्हें ‘आर्काइव’ या संरक्षित कर दें, पर उसमें समस्या है कि हम आवश्यक मैसेज से भी वंचित हो जाते हैं। ऐसे में इस प्रकार के दलदल से बचने का एकमात्र उपाय है मन को शांत रखना। यह जानना कि गाली स्वीकार नहीं करने पर गाली उसी आदमी के पास चली जाती है, जो गाली दे रहा है।
ऐसे समूहों की एक बड़ी जमात खड़ी हो गई है, जिनके सदस्य बहुभाषी और बहुजातीय हैं। हालांकि वे किसी सामान्य तंतु से जुड़े हुए होते हैं, जैसे शिक्षकों या विद्यार्थियों के समूह, लेकिन उनके सदस्य अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए होते हैं। आवश्यक नहीं कि सभी मुद्दों पर इनके विचार आपस में मिलते हों, पर भाषा के स्तर पर असहमति को विरोध का पर्याय मान लिया जाता है।
ऐसे में यदि समूह वैचारिक रूप से दो या अधिक दलों में बंटा हो तो अगर किसी ने एक टिप्पणी डाली जो अन्य समूह के विचारों से मेल नहीं खाती है, तो दूसरे समूह के लोग उस व्यक्ति पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे बर्र के छत्ते को हाथ लगा दिया हो। बात किसी एक बात को लेकर प्रारंभ होती है और समाप्त होते-होते उस व्यक्ति के चरित्र हनन तक पहुंच जाती है। होता यह है कि विचारों की लड़ाई बढ़ते-बढ़ते व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल जाती है।
हाल के दिनों में ऐसे समाचार आम हो गए हैं कि वाट्सएप समूह के संवाद ने संबंध ऐसे खराब कर दिए कि एक दूसरे पर घातक हथियारों से हमले हुए।
भाषा का स्तर इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है। दुर्भाग्यवश ऐसे समूहों का रूप इतना अनौपचारिक है कि कानून बनाकर उसका नियमन संभव नहीं लगता। इस संदर्भ में ‘वाट्सएप एडमिन’ यानी समूह संचालक पर नियमन की जिम्मेदारी के समाचार भी आए, पर आजकल प्रत्येक समूह के एकाधिक संचालक हैं, तो वह जिम्मेदारी भी नाम भर की ही है। सामाजिक समरसता को देखते हुए भाषा के इस नए प्रारूप को अधिक गहराई और संवेदनशीलता से देखने की जरूरत है।
