प्रकृति प्रदत्त नेमतों की कोई कीमत नहीं। वे अनमोल होती हैं। अब नींद को ही देखा जाए। हमारे आसपास ऐसे लोग आम हैं, जिनकी नजर में सोना वक्त गंवाना है। ‘जो लोग सोते हैं, वे खोते हैं’, इस आशय से कई कहावतें और उक्तियां भी हैं। अगर कोई व्यक्ति सोता हुआ दिख जाता है, तो उसे उसके बिगड़े हुए काम का कारण बताया जाता है। कुछ स्थितियों में यह सच भी हो सकता है।
मगर क्या हम हर वक्त नींद लेने को नकारात्मक ही मान कर कुछ गंवा तो नहीं रहे हैं? खासतौर पर ऐसे दौर में जब स्मार्टफोन में गुम रहने से लेकर कई बेमानी व्यस्तताओं की वजह से आंखों की नींद उड़ रही है, लोगों को नींद न आने की बीमारी जकड़ रही है। सवाल है कि क्या अच्छी नींद की कीमत रूपए पैसे, सोना चांदी या किसी अन्य बेशकीमती उपहार से आंकी जा सकती है? नहीं। नींद तो नींद होती है। इसकी भरपाई किसी दूसरी चीज से करना संभव नहीं।
एक गरीब आदमी को नींद की जितनी जरूरत होती है, उतनी ही उन्हें भी, जिनके घरों में रुपए बोरियों में भरे हुए हैं। भोजन पानी की तरह नींद भी दुनिया में रहने वाले हर शख्स की जरूरत है। नवजात बच्चे जितना ज्यादा सोते हैं, उतनी ही तेजी से बढ़ते हैं। बच्चे ही क्यों, बड़ों को भी नींद की उतनी ही जरूरत होती है। अब सवाल यह उठता है कि हमें नींद की जरूरत पड़ती क्यों है।
सोना जितना दिमाग के लिए जरूरी होता है, उतना शरीर के लिए भी। आमतौर पर हमें लगता है कि जब हम सो जाते हैं, तो हमारा दिमाग भी थककर सो जाता होगा। मगर ऐसा नहीं है। सोते समय हमारा दिमाग जीने के लिए जरूरी कई क्रियाकलापों में लग जाता है। एक तरह से कह सकते हैं कि हमारे जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने के काम में सीधे तौर पर जुट जाता है, जो हमारे जागते हुए दिमाग के लिए करना संभव नहीं होता है।
इसे इस उदाहरण से समझ सकते हैं। अगर हमने कभी रात को अपनी नींद खराब की होगी, यानी किसी वजह से हम रात को सो नहीं पाए होगे, तो अगले दिन अजीब-सी थकान या तनाव का अहसास होता है। काम करने में भी दिमाग का भरपूर इस्तेमाल नहीं हो पाता।
इसकी वजह यह है कि नींद का हमारे दिमाग की कार्यक्षमता से संबंध होता है। नींद दिमाग के काम करने के तरीके पर असर डालती है। दिमाग को लचीलेपन यानी संकेतों के हिसाब से ढलने की क्षमता के लिए अच्छी नींद बहुत जरूरी है। अगर हम बहुत कम सोते हैं, तो दिन में सीखी हुई चीजों को अपने भीतर स्थिर नहीं कर पाते और भविष्य में उन्हें याद रखने में ज्यादा दिक्कत होती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि नींद दिमाग की कोशिकाओं से बेकार चीजों को हटाने में मदद करती है। जब दिमाग क्रियाशील होता है, यानी हम जाग रहे होते हैं, तो यह काम उतनी कुशलता से नहीं हो पाता है, लेकिन सोने के बाद दिमाग पर से अतिरिक्त भार खत्म हो जाता है और वह खुद को व्यवस्थित करने की क्रिया में जुट जाता है।
दिमाग के अलावा नींद बाकी शरीर के लिए भी बहुत जरूरी है। जब लोगों को पर्याप्त नींद नहीं मिलती, तो तरह-तरह की बीमारियां पकड़ने के खतरे बढ़ जाते हैं। अवसाद, दौरे, उच्च रक्तचाप और सिरदर्द के लक्षण और बढ़ने लगते हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे बीमारी और संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।
नींद चयापचय में भी भूमिका निभाती है। यह जानकर हैरानी होगी कि एक रात की नींद छूटने से भी एक स्वस्थ व्यक्ति में मधुमेह-पूर्व की स्थिति बन सकती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जब हम सोते हैं, तब हमारा दिमाग दो अलग-अलग तरह की नींद लेता है। आरइएम (रैपिड-आइ मूवमेंट) नींद और गैर-आरईएम नींद। नींद की प्रक्रिया का पहला हिस्सा नान-आरईएम नींद है, जिसके चार स्तर होते हैं। पहला स्तर जागने और सोने के बीच का होता है।
दूसरा हल्की नींद होती है, जब दिल की धड़कन और सांस लेने की गति नियमित हो जाती है और शरीर का तापमान कम हो जाता है। तीसरे और चौथे स्तर में गहरी नींद होती है। पहले यह माना जाता था कि आरईएम नींद सीखने और याददाश्त के लिए सबसे जरूरी नींद का चरण है, लेकिन नए आंकड़ों से पता चला है कि गैर-आरईएम नींद इन कामों के लिए ज्यादा जरूरी है। यह नींद शरीर को अधिक आराम पहुंचाने वाली होती है।
जैसे ही हम आरईएम नींद में जाते हैं, बंद पलकों के पीछे आंखें तेजी से हिलती हैं और दिमाग की तरंगें जागृत अवस्था जैसी ही होती हैं। सांस की दर बढ़ जाती है। सपने देखते वक्त हमारा शरीर कुछ समय के लिए सुन्न की अवस्था में पहुंच जाता है।
यह चक्र चलता रहता है, लेकिन हर चक्र के साथ हम नींद के गहरे स्तर तीन और चार में कम समय और आरईएम नींद में ज्यादा समय बिताते हैं। एक रात में हम चार या पांच बार इस चक्र से गुजरते हैं। नींद का विज्ञान कुछ भी कहे। लेकिन हमारा अनुभव यह कहता है कि अच्छी नींद हमारे स्वस्थ रहने की कुंजी है।
इसलिए कुछ भी हो जाए, नींद से समझौता नहीं होना चाहिए। नींद का चक्र अगर बाधित होता है, तो यह हमारी सेहत और व्यक्तित्व को बाधित कर दे सकता है।
