मौन निशब्द है, लेकिन यह भाषा है, भाव, शब्द, अर्थ, साधना, भक्ति, शक्ति, सामर्थ्य, ज्ञान, सुंदर और मुखर भी है। यह अमूल्य आभूषण भी है। मौन को जितनी भी उपाधि दी जाए, कम ही है। यह कमजोरी नहीं है, बल्कि यह शक्तिशाली है। कभी-कभी हम बोलकर शब्दों के जरिए जितना सटीक अपने आप को अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं, उससे ज्यादा चुप रहकर बोल लेते हैं।

कुछ भाव-भावनाओं के लिए तो शब्दकोश में शब्द खोजते रह जाते हैं, लेकिन नहीं मिलता। वहीं भाव भंगिमा की सहायता से मौन के सहारे एकदम सटीक, बेहतर तरीके से अपनी बात कह देते हैं।

कुछ लोग शब्दों की अनुपस्थिति को मौन मान लेते हैं। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। मौन का मतलब सिर्फ शब्दों का अभाव नहीं है, बल्कि आंतरिक शांति, स्पष्टता और समझ पाने की गहरी क्षमता है। इससे इंसान के भीतर आत्मचिंतन और एकाग्रता में इजाफा होता है। मौन उसे ही माना जा सकता है, जहां हमारा चित्त पूरी तरह से शांत हो।

वहीं बिना वजह का बोलना हमारी ऊर्जा का फिजूल खर्च है। ऐसी जगह पर शाब्दिक ‘मौन’ ऊर्जा की बचत ही करता है। साथ ही अत्यधिक वाचाल होना विभिन्न प्रकार के विवादों को न्योता देना होता है, जिससे हम अनावश्यक विवाद में उलझते हैं।

मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए मौन को वरदान के तौर पर देखा जाता है। इसके जरिए हम खुद के साथ ज्यादा गहराई से जुड़ते हैं। जब हम मौन में रहते हैं, तो अपने ऊपर चिंतन-मनन करते हैं। अपने जीवन के बारे में ठीक-ठाक विश्लेषण करते हैं, जो हमारे जीवन में सार्थक और चमत्कारिक बदलाव लाता है।

इससे हम दुनिया के बाहरी शोर को परे रखकर आंतरिक ज्ञान और स्थिरता पाते हैं। यह सब हमारे मन को शांत करता है और जीवन को सकारात्मक बनाता है। कहा जा सकता है कि मौन हमारा आध्यात्मिक और व्यक्तिगत विकास करता है।

मौन की एक शक्ति हमारे परिस्थितिजन्य तात्कालिक आवेग को रोक कर कुछ भी अनुचित कहने से रोकना है, जो रिश्तों को बचाने का काम करता है। अक्सर अत्यधिक बोलने वाले आवेग में ऐसी बातें बोल देते हैं, जो लोगों को अप्रिय लगती है और फिर रिश्तों में तनाव उत्पन्न हो जाता है।

पर जिन्हें मौन का अभ्यास होता है, वे अपने तात्कालिक आवेग पर नियंत्रण रख लेते हैं। बाहर से देखने पर मौन में भले खामोशी दिखती है, लेकिन यह एक सक्रिय अवस्था है जो जीवन में आंतरिक शक्ति, शांति जीवन में लाने का कार्य करती है।

जानकार लोग भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि हम केवल न बोलने को मौन समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में मौन तब होता है, जब मन की खटपट मिट जाए, मन पूरी तरह शांत हो जाए। हमारे होंठ भी इसी कारण चलते हैं, क्योंकि जब मन अशांत होता है, तब हम मौन होकर भी मौन नहीं होते हैं। शब्दहीनता को मौन समझ लेना इसका सस्ता अर्थ लगाना है।

श्रीमद्भागवत गीता में मौन को मानसिक ‘तप’ के साथ-साथ आत्मसंयम का साधन और ईश्वर की वाणी सुनने का मार्ग बताया गया है। मौन का अर्थ केवल वाणी से नहीं, बल्कि मन की चंचलता को रोकने से है। और मन की चंचलता को रोकना अपने आप में दुसाध्य कार्य है। मौन का अर्थ कमजोरी नहीं है, बल्कि यह आत्म साक्षात्कार, मानसिक शांति, आध्यात्मिक प्रगति के लिए एक आवश्यक साधन है।

किसी भी चीज के दो पहलू होते हैं- सकारात्मक और नकारात्मक। मौन का नकारात्मक पहलू यह है कि यह कई बार अर्थ का अनर्थ भी कर देता है। भले ही इसके बहुत सारे लाभ हों, लेकिन अक्सर यह संशय और भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर देता है।

इसे एक दुधारी तलवार की तरह देखा जा सकता है, जो अपने नकारात्मक पक्ष में भी ज्यादा धारदार या नुकसानदेह नहीं है। फिर भी इसमें थोड़ी धार तो होती ही है। इसलिए मौन का भी उपयोग करते हुए सचेत रहने की जरूरत होती है। अगर सही समय पर सही बात को नहीं बोला जाए तो गलतफहमी भी उत्पन्न करता है। अक्सर हमारे मौन को हमारी असहमति या कमजोरी मान लिया जाता है, जिससे स्थिति सुधरने के बजाय और भी बिगड़ जाती है।

जब संवाद रुक जाता है, तब मौन से भावनाएं मर जाती हैं और रिश्तों में विश्वास और असुरक्षा की भावना पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है। मौन वही सही है, जो मन को शांति दे। जब किसी विषय वस्तु पर कोई व्यक्ति चुप रहता है, तो अन्य लोग उसकी चुप्पी को बहुत ही आसानी से सहमति या असहमति मान लेते हैं। जबकि हर बार ऐसा नहीं होता है।

हो सकता है कि वह व्यक्ति किसी अन्य परेशानी में उलझा हुआ हो या उस स्थिति के लिए कुछ सही शब्द नहीं मिल रहे हों, जिसके कारण वह फिलहाल चुप है। हालांकि बहुत बार ऐसा भी होता है कि किसी गंभीर मुद्दे पर चुप्पी कोई हल निकालने के बजाय समस्या को दोगुना बढ़ा देती है।

समाधान के लिए बात करना जरूरी होता है और वह भी समय पर। अगर समय पर बात नहीं की जाए, तो कई बार स्थिति हाथ से निकल जाती है। कहा जा सकता है कि समय के मुताबिक मौन अपनी जगह पर सही है और संवाद भी अपनी जगह पर सही है। बस इनमें से किसी का चुनाव समय और जरूरत के मुताबिक और सतर्कता से हो।