पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। पहली बार उसने सिर्फ सरकार नहीं बनाई, बल्कि बहुमत हासिल कर ममता बनर्जी की टीएमसी को करारी शिकस्त दी। चुनाव में बीजेपी 208 सीटें जीतने में सफल रही जबकि टीएमसी का आंकड़ा 80 सीटों पर सिमट गया। बाद में दो विधायकों को निष्कासित कर दिया गया। ऐसे में अब उनके पास विधानसभा में मात्र 78 सीटें हैं।
इस करारी शिकस्त के बाद मंथन करने के लिए टीएमसी ने तीन बार बैठक बुलाई। 6 मई को बैठक बुलाई गई तो 10 विधायक पहुंचे ही नहीं। फिर 19 मई को बैठक बुलाई गई तो 35 विधायक नदारद रहे। उसके बाद 31 मई को बुलाई गई बैठक में तो सबसे बड़ा खेल हुआ और 80 में से 60 विधायक मीटिंग में पहुंचे ही नहीं।
इसके ऊपर ममता की टीएमसी में इस्तीफों की झड़ी भी लग चुकी है। टीएमसी प्रवक्ता बिस्वजीत देब ने इस्तीफा दिया है। शांतनु सिंह, अभिजीत मजूमदार, काकोली घोष और अरुप चक्रवर्ती ने भी अपना पद छोड़ दिया है। इसके अलावा डायमंड हार्बर से 8 पार्षदों का इस्तीफा हुआ है। चंदननगर से 30 पार्षद, भाटपाड़ा से 30, गारुलिया से 18, हलिशहर से 16, उत्तर बैरकपुर से 15 और कांचरापाड़ा से 14 पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं।
इन इस्तीफों के अलावा ममता बनर्जी ने उलूबेरिया से विधायक ऋतब्रत बनर्जी और एंटाली से विधायक संदीपन साहा को निष्कासित कर दिया। आरोप लगा कि दोनों पार्टी विरोधी गतिविधियों में सक्रिय थे। लेकिन असल विवाद यह था कि इन दोनों ही विधायकों ने नेता प्रतिपक्ष से जुड़े प्रस्ताव और उस पर लिए गए हस्ताक्षरों की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। संदीपन साहा तो यहां तक कह चुके थे कि इसमें ऐसे विधायकों के हस्ताक्षर भी शामिल हैं जो असल में बैठक में शामिल तक नहीं हुए थे। इन आरोपों के बाद ही दोनों विधायकों को निष्कासित कर दिया गया।
विधायकों का नदारद होना, कुछ को निष्कासित कर देना और लगातार इस्तीफों का सिलसिला इस बात की ओर जरूर इशारा करता है कि टीएमसी में इस समय सब कुछ ‘ऑल इज वेल’ नहीं है।
न्यूज 18 इंडिया की एक रिपोर्ट दावा करती है कि कोलकाता के ‘विधायक हॉस्टल’ में टीएमसी नेताओं की एक सीक्रेट बैठक हो चुकी है। इस बैठक में निष्कासित विधायक के साथ-साथ कई असंतुष्ट नेता शामिल हुए और टीएमसी के भविष्य, संगठनात्मक बदलाव और नए राजनीतिक विकल्पों को लेकर चर्चा की गई।
बड़ी बात यह है कि ममता बनर्जी ने खुद पार्टी को कमजोर करने जैसी साजिशों के आरोप लगा दिए हैं। उनका कहना है कि पार्टी को कमजोर करने और तोड़ने की एक संगठित साजिश चलाई जा रही है। ममता का यह कहना ही बता रहा है कि जमीन पर असंतोष है और उन्हें भी इस बात की चिंता जरूर सता रही है कि क्या टीएमसी टूट जाएगी।
टीएमसी में जारी बवाल में इस समय कुछ अहम पहलू दिखाई दे रहे हैं। नाराज विधायक, ओल्ड बनाम यंग गार्ड की लड़ाई और इस्तीफों का सिलसिला। जानकार इस पैटर्न की तुलना महाराष्ट्र से करने लगे हैं जहां 2022 में एकनाथ शिंदे ने भी एक बड़ा उलटफेर किया था। उन्होंने शिवसेना में दो फाड़ कर दी थी और कई विधायकों को अपने साथ लेकर पूरी पार्टी पर कब्जा जमा लिया था।
असल में महाराष्ट्र में 2019 के विधानसभा चुनाव हुए थे जिसमें बीजेपी और शिवसेना ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और उस गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ था। लेकिन क्योंकि शिवसेना को मुख्यमंत्री पद नहीं मिला, नाराज होकर उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिला लिया और महाराष्ट्र की राजनीति में महाविकास अघाड़ी का जन्म हुआ। इस महाविकास अघाड़ी ने सरकार बनाई और बीजेपी को विपक्ष में बैठने पर मजबूर कर दिया।
लेकिन उस पूरे सियासी घटनाक्रम में एक और किरदार था। वह था एकनाथ शिंदे। बालासाहेब ठाकरे के सिद्धांतों पर चलने वाले एकनाथ शिंदे कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने को राजी नहीं थे।
इसके बाद 20 जून 2022 को महाराष्ट्र विधान परिषद के चुनाव हुए और पता चला कि एकनाथ शिंदे और कुछ दूसरे विधायक मुंबई से बाहर जा रहे हैं। फिर खबर आई कि वे गुजरात के सूरत पहुंच चुके हैं। अगले ही दिन कई विधायकों को लापता बताया गया। उद्धव ठाकरे ने खतरा देखते हुए आपात बैठक बुलाई, लेकिन कई विधायक पहुंचे ही नहीं। यहीं से संकेत मिल चुके थे कि शिवसेना में दो फाड़ हो चुकी है।
इसके बाद 22 जून को शिंदे गुट असम के गुवाहाटी पहुंच गया। विधायकों की संख्या वहां बढ़ती गई। दावा किया गया कि 40 शिवसेना विधायक एकनाथ शिंदे के साथ हैं। फिर 22 से 28 जून तक दावों का खेल चलता रहा। शिंदे गुट की तरफ से लगातार कहा गया कि उद्धव ठाकरे के पास बहुमत नहीं है और वह सरकार में नहीं बने रह सकते।
फिर 29 जून को फ्लोर टेस्ट की नौबत आई, लेकिन उसके ठीक पहले उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा दे दिया। फिर 30 जून को एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने बीजेपी से हाथ मिला लिया। तब देवेंद्र फड़नवीस को डिप्टी सीएम बना दिया गया।
सरकार बना ली गई थी, लेकिन असली शिवसेना पर कब्जा करना बाकी था। ऐसे में यह मामला चुनाव आयोग के पास चला गया, जिसने 8 अक्टूबर 2022 को शिवसेना के धनुष-बाण वाले चुनाव चिन्ह को ही फ्रीज कर दिया। तब दो शिवसेना अस्तित्व में आईं। एक का नाम शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) रखा गया और दूसरी का नाम बालासाहेबांची शिवसेना यानी शिंदे गुट।
फिर लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक गई। मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया कि उद्धव ठाकरे वापस मुख्यमंत्री नहीं बन सकते क्योंकि उन्होंने फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। वहीं असली शिवसेना को लेकर अदालत ने कोई फैसला नहीं दिया और मामला चुनाव आयोग के पास ही रहा।
फिर 17 फरवरी 2023 को चुनाव आयोग ने सबसे बड़ा फैसला सुनाते हुए एकनाथ शिंदे गुट को ही असली शिवसेना घोषित कर दिया। धनुष-बाण वाला चुनाव चिन्ह भी उनके खाते में गया। इस तरह एकनाथ शिंदे ने पूरी शिवसेना पर अपना कब्जा कर लिया और उद्धव ठाकरे अलग-थलग पड़ गए। जानकार इसी को महाराष्ट्र का ‘शिंदे फॉर्मूला’ बताते हैं जहां सबसे पहले बागी विधायकों की नाराजगी को हवा दी जाती है, फिर उन्हें पक्ष बदलने के लिए मनाया जाता है और आखिर में सबसे बड़ा खेल होता है-दो फाड़।
अब इस समय पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी के कई विधायक नाराज बताए जा रहे हैं। कुछ मीडिया के सामने आकर अभिषेक बनर्जी की नीतियों की खुले तौर पर आलोचना कर रहे हैं, तो कुछ दबी जुबान ममता बनर्जी की कार्यशैली पर भी सवाल उठा रहे हैं। कई विधायकों का बैठकों से नदारद होना भी एक संकेत दे रहा है। इसी वजह से ऐसी अटकलें चल पड़ी हैं कि क्या 80 में से नदारद रहे 60 विधायक पार्टी को तोड़ भी सकते हैं?
अभी इस सवाल का जवाब तो भविष्य की गर्भ में छिपा है, लेकिन ममता बनर्जी ने खतरे को भांपते हुए सड़क पर उतरने का फैसला किया है। उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों को लेकर उन्होंने आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। कोलकाता पुलिस ने उन्हें इजाजत नहीं दी है, लेकिन ममता ने भी तेवर दिखाते हुए दिल्ली कूच करने की चेतावनी दे दी है।
यहां समझने वाली बात यह है कि सड़क पर उतरी ममता बनर्जी की असल पहचान भी यही है। जानकार मानते हैं कि ममता बनर्जी की एक स्ट्रीट फाइटर की इमेज है। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों ने उनकी छवि को मजबूत भी किया था। उन आंदोलनों के दम पर 34 साल के वामपंथी राज को भी खत्म किया गया था।
लेकिन तब की स्थिति और आज की स्थिति में बड़ा फर्क है। जब लेफ्ट से लड़ाई चल रही थी तब ममता की टीएमसी एकजुट थी। शुभेंदू अधिकारी जैसे बड़े नेता भी ममता के साथ खड़े थे। लेकिन आज की चुनौतियां और आज का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। बंगाल में बीजेपी की सरकार है, टीएमसी के कई विधायक ममता और अभिषेक से नाराज बताए जा रहे हैं, पार्टी के अंदर ओल्ड बनाम यंग गार्ड की लड़ाई छिड़ चुकी है और लगातार हो रहे इस्तीफे सियासी तापमान बढ़ा रहे हैं।
ममता की सड़क पॉलिटिक्स क्या एक बार फिर टीएमसी को खड़ा कर पाएगी? इस सवाल का जवाब ही टीएमसी का भविष्य भी तय करेगा और ममता दीदी की आगे की रणनीति भी।
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