समाज में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई, स्वार्थवादी प्रवृत्ति और न्याय के अभाव में उपेक्षित वर्ग को कई तरह की विकट परिस्थितियों एवं त्रासदियों का सामना करना पड़ता है। देश की आजादी के इतने वर्षों बाद भी कुछ ऐसे कार्य हैं, जो आज भी एक खास वर्ग के जिम्मे हैं। हाथ से मैला साफ करने का कार्य भी इनमें से एक है। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक में गंदे नाले, सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान किसी श्रमिक की मौत हो जाने की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। मगर, ऐसे मामले विरले ही होते हैं, जिनमें संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों की भावना के अनुरूप किसी संस्था, ठेकेदार या संबंधित व्यक्ति को लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए न्याय के कठघरे में लाया गया हो और उसे दंडित किया गया हो। यह उस भारतीय समाज की सच्चाई है, जो स्वयं को शिक्षित, समझदार और प्रगतिशील मानता है।
देश में हर साल बड़ी संख्या में हाथ से मैला साफ करने वाले श्रमिकों की मौत जहरीली गैसों या आक्सीजन की कमी की वजह से हो जाती है। मगर ज्यादातर मामलों में इसे दुर्घटना कह कर हर स्तर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ये श्रमिक समाज के उस वर्ग से आते हैं, जो अब तक उपेक्षित हैं। ऐसा लगता है कि इनके प्रति समाज में सम्मान, संवेदना और सहानुभूति की कोई जगह नहीं है।
यही वजह है कि कानून की नजर में प्रतिबंधित एवं जोखिमपूर्ण कार्य में भी इन श्रमिकों को बिना सुरक्षा के झोंक दिया जाता है। केंद्र सरकार ने हाथ से मैला उठाने की प्रथा पर अंकुश लगाने और गंदे नालों एवं सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा के लिए वर्ष 1993 में कानून बनाया था। इसके बाद वर्ष 2013 में हाथ से मैला उठाने वाले व्यक्तियों के नियोजन का प्रतिशेध तथा पुनर्वास अधिनियम बनाया गया। इसके तहत हाथ से मैला उठाने, सीवर या सेप्टिक टैंक में असुरक्षित तरीके से सफाई कराने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। साथ ही ऐसे कार्य में लगे लोगों के पुनर्वास और उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का प्रावधान भी किया गया। मगर ये कानून आज भी जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो पाए हैं।
सवाल यह है कि आए दिन सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैस या आक्सीजन की कमी से होने वाली मौतों को आखिर कब तक नजरअंदाज किया जाता रहेगा? जब कानून में इस तरह के कार्यों के लिए मशीनी उपकरणों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है, तो फिर श्रमिकों को बिना सुरक्षा उपायों के इस कार्य में क्यों झोंक दिया जाता है? इस दौरान जब किसी श्रमिक की मौत हो जाती है, उसके लिए किसी की जिम्मेदारी या जवाबदेही क्यों तय नहीं हो पाती है! जाहिर है कि ये श्रमिक असंगठित क्षेत्र से आते हैं, इसलिए इनके हक की लड़ाई लड़ने के लिए कोई राजनीतिक दल, मजदूर संघ और यहां तक गैर सरकारी संगठन भी आगे नहीं आते। करीब एक दशक पहले सफाई कर्मचारियों की मौत के मामले में वर्ष 2014 में एक याचिका दायर की गई थी, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि सीवर, नाले या सेप्टिक टैंक की सफाई को पूरी तरह यांत्रिक किया जाए और सभी पीड़ित परिवारों को तत्काल उचित आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।
अदालत के इस आदेश का पालन कितनी गंभीरता से हो रहा है इसका अंदाजा आए दिन सफाई के दौरान श्रमिकों की मौत से जुड़ी घटनाओं से लगाया जा सकता है। यानी नाले, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई का कार्य आज भी मशीनी उपकरणों की जगह श्रमिकों से कराया जा रहा है, जिससे हर साल बड़ी संख्या में जहरीली गैसों या आक्सीजन की कमी की वजह से मौत हो जाती है। चिंता की बात यह है कि न तो केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए कानून का पूरी तरह से पालन हो पा रहा है और न ही सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का। ऐसे में इस तरह से होने वाली श्रमिकों की मौत को कैसे रोका जाए, यह एक बड़ा सवाल है।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2020 में श्रमिकों की सुरक्षा और उनके कार्य की परिस्थितियों को लेकर एक कानून बनाया था। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियां संहिता नामक इस कानून में काम के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा, खतरनाक गैसों से बचाव और उन मशीनी उपकरणों का इस्तेमाल अनिवार्य किया गया है, जिनके जरिए आसानी से नालों और सेप्टिक टैंकों की सफाई की जा सकती है। सवाल यह है कि कानून में सख्त प्रावधान होने के बावजूद सीवर की सफाई में आज भी मशीनी उपकरणों के इस्तेमाल के बजाय इस कार्य को बिना सुरक्षा के श्रमिकों से ही क्यों कराया जा रहा है? कानून का उल्लंघन किस तरह हो रहा है, इसका ताजा उदाहरण पिछले माह दिल्ली के मुंडका में सीवर की सफाई के दौरान जहरीली गैस से तीन श्रमिकों की मौत हो जाने की घटना है। इसे भी सामान्य घटना मानकर अनदेखा कर दिया गया।
दरअसल, सीवर, नाले और सेप्टिक टैंक की सफाई का कार्य अक्सर ठेकेदारों के जरिए कराया जाता है। वे मशीनी उपकरणों की जगह श्रमिकों से यह कार्य करवाते हैं, ताकि उन्हें ज्यादा पैसा खर्च न करना पड़े। वे नियम-कानून की भी कोई परवाह नहीं करते हैं। इस जोखिम भरे कार्य में जब किसी सफाईकर्मी की मौत हो जाती है, तो ज्यादातर मामलों में ठेकेदार अपनी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। अगर किसी ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई होती भी है, तो नाममात्र के लिए। ऐसे मामलों में दर्ज प्राथमिकी में इतनी कमजोर धाराएं लगाई जाती हैं कि दोषी मामूली दंड पाकर छूट जाता है और पीड़ित परिवार को उचित आर्थिक सहायता भी नहीं मिल पाती है।
विडंबना यह है कि ऐसे श्रमिकों की सफाई कार्य के दौरान मौत के आंकड़े भी वास्तविकता से बहुत कम दर्ज हो पाते हैं। दरअसल, नाले, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले श्रमिकों की मौत के जो आंकड़े सरकारें जारी करती हैं, ये वे मामले होते हैं, जो पुलिस प्राथमिकी के जरिए सरकार तक पहुंचते हैं। इसलिए वास्तविक आंकड़ों का सही पता नहीं चल पाता है। सफाई मजदूर संगठनों की मानें तो सरकारी आंकड़े की अपेक्षा वास्तविक आंकड़े में कई गुना का अंतर है। इससे साफ है कि इस तरह के हादसों में जान गंवाने वाले कई श्रमिकों के परिवारों को सरकार की ओर से आर्थिक मदद भी नहीं मिल पाती है।
ऐसे में अगर कमाई करने वाले इकलौते व्यक्ति की मौत हो जाती है, तो उसके परिवार के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जाता है। मगर इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों पर ऐसी कोई कार्रवाई नहीं होती है, जिससे दूसरे लोगों को सबक मिल सके। सवाल है कि मानवाधिकार आयोग, अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग या फिर मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ने वाले संगठन क्या कभी ऐसे श्रमिकों की मौत को लेकर मुखर होंगे? जब बात अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की आती है, तो समाज के हर वर्ग के उत्थान का दावा करने वाले राजनीतिक दलों की संवेदनाएं आखिर कहां गुम हो जाती हैं!
