आधुनिकता और तेज आर्थिक विकास के जिस दौर को हम प्रगति मानकर आगे बढ़ रहे हैं, उसके भीतर एक ऐसी सच्चाई लगातार गहराती जा रही है, जिसे अक्सर घरों की दीवारों के पीछे दबा दिया जाता है। यह सच्चाई है बुजुर्गों का बढ़ता अकेलापन, रिश्तों का टूटना और परिवारों के भीतर संवाद का खत्म होना।

आज स्थिति यह है कि घर तो भरे हुए हैं, लेकिन मन खाली हैं। लोग मौजूद हैं, लेकिन रिश्तों में उपस्थिति नहीं है। तकनीक ने हमें जोड़ने का दावा किया था, लेकिन कई मामलों में उसने भावनात्मक दूरी और बढ़ा दी है।

भारतीय समाज में संयुक्त परिवार लंबे समय तक सामाजिक सुरक्षा और भावनात्मक सहारा रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह संरचना तेजी से टूट रही है। शिक्षा, रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में युवा पीढ़ी का महानगरों और दूसरे देशों की ओर पलायन अब सामान्य प्रक्रिया बन चुका है। इसके साथ पीछे छूट रहे माता-पिता एक ऐसे जीवन में पहुंच रहे हैं, जहां दिन बिना संवाद के बीतता है और शाम उदासी में बदल जाती है।

खामोशी के कोने

पिछले साल की एक रिपोर्ट के अनुसार 54 प्रतिशत बुजुर्ग बढ़ती उम्र को नकारात्मक भावनाओं से जोड़ते हैं, जिनमें अकेलापन प्रमुख है। करीब 79 प्रतिशत बुजुर्गों ने माना कि परिवारजन उनके साथ पर्याप्त समय नहीं बिताते हैं। यह स्थिति हमारे बदलते सामाजिक व्यवहार का संकेत है।

दिन की रोशनी में तो जैसे-तैसे घर के छोटे-मोटे कामों या अतीत की खिड़कियों को ताकते हुए बुजुर्गों का वक्त कट जाता है, पर शाम ढलते ही उदासी गहराने लगती है। न कोई बात करने वाला होता है और न इन्हें पूछने वाला। इस अंतहीन खामोशी से घबराकर कई बुजुर्ग खुद को बहलाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेने लगे हैं।

डिजिटल मुस्कान के पीछे छिपा अकेलापन

आए दिन फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ऐसे वीडियो और रील दिख जाते हैं, जहां कोई बूढ़ी उंगलियां कैमरे के सामने बचपना कर रही हैं या कोई कांपती आवाज में पुराना गीत गा रही हैं। पहली नजर में दुनिया इसे उनका ‘डिजिटल शौक’ मानकर ‘लाइक’ कर देती है, लेकिन कोई नहीं देखता कि उन रीलों के पीछे छिपा चेहरा असल में इंसानी आवाज सुनने के लिए कितना छटपटा रहा है। वे तकनीक के जरिए अपना मन तो बहला रहे हैं, लेकिन ऊपरी तौर पर दिखने वाला यह मनोरंजन उनके अकेलेपन को रत्ती भर भी कम नहीं कर पाता।

अनजान अपने

महानगरों में एक ही इमारत में रहने वाले लोग भी अक्सर एक-दूसरे से अनजान रहते हैं। पड़ोस, जो कभी सुरक्षा और संवाद का आधार था, अब कमजोर होता जा रहा है। कई मामलों में बुजुर्गों की मौत की जानकारी काफी देर से सामने आई।

दिल्ली के द्वारका इलाके में 2024 में एक बुजुर्ग व्यक्ति का शव उनके फ्लैट से कई दिनों बाद मिला। उनका बेटा विदेश में रहता था और उनका किसी से कोई संपर्क नहीं था। मुंबई के अंधेरी में वर्ष 2023 में एक बुजुर्ग महिला का कंकाल लगभग एक सप्ताह बाद उनके फ्लैट में उनके ही सोफे पर मिला था। उदाहरण के तौर पर उल्लिखित ये घटनाएं पुरानी हैं, लेकिन इस समस्या के एक जटिल आयाम का रूपक हैं। ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ये सभी उच्च मध्यवर्गीय परिवारों से थे और अच्छी सोसाइटियों में रहते थे। यह हमारे समाज की स्याह तस्वीर है।

जब अपनों की राह देखते-देखते जिंदगी थम जाती है

आलीशान फ्लैटों के बंद कमरों में हफ्तों तक टेलीविजन चलता रहता है, स्क्रीन की चमक बिखरी रहती है, लेकिन उन कमरों से जिंदगी कब की जा चुकी होती है, इसका अंदाजा पड़ोसियों को तब होता है, जब वहां से दुर्गंध आने लगती है। जब पुलिस दरवाजा तोड़कर अंदर दाखिल होती है, तो अपनों की राह निहारती उन आंखों की जगह केवल एक कंकाल या सड़ चुका शव मिलता है। यह समाज में बढ़ते अकेलेपन की भयावह तस्वीर है, जो किसी को दिखाई नहीं दे रही है।

सुविधाओं का दंश

आज ऐसे कई बुजुर्ग हैं, जिनके बच्चे विदेश में बसे हैं। उनका संपर्क केवल फोन और वीडियो कॉल तक सीमित रह गया है। कई मामलों में माता-पिता के अंतिम संस्कार में भी बेटे नहीं आते हैं और जिम्मेदारी पड़ोसियों या प्रशासन पर आ जाती है। कई बार तो शव को बच्चों के होते हुए भी लावारिस मानकर अंतिम संस्कार करना पड़ता है।

जब युवा नौकरी करने बाहर जाते हैं, तो उनके मां-बाप अकेले रह जाते हैं। ये युवा अपने माता-पिता को ढेर सारी सुविधाएं तो दे देते हैं, लेकिन उनके अकेलेपन का उनके पास कोई इलाज नहीं होता है। बुजुर्ग घरेलू सहायकों पर निर्भर हो जाते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में यह निर्भरता असुरक्षा में बदल जाती है। देश में आए दिन बुजुर्गों के साथ लूटपाट, हिंसा और हत्या जैसी घटनाएं इस बात के संकेत हैं कि अकेलापन अब केवल भावनात्मक नहीं, सामाजिक सुरक्षा का भी सवाल बन चुका है।

बुजुर्गों में अकेलेपन की एक और बड़ी वजह है—माता-पिता द्वारा संपत्ति बच्चों के नाम करना। इसके बाद कई मामलों में उनकी स्थिति बदल जाती है। कुछ बुजुर्ग घर के भीतर उपेक्षा का सामना करते हैं, तो कुछ को वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ता है या बच्चे उन्हें जबरदस्ती वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं।

वहीं दूसरी ओर लंबे समय तक अकेलापन बुजुर्गों में अवसाद, अनिद्रा और स्मृति संबंधी समस्याओं को बढ़ाता है। इस अकेलेपन से जो बीमारियां सबसे तेजी से पैर पसार रही हैं, उनमें सबसे गंभीर है स्मृतिभ्रंश और अल्जाइमर। जब दिमाग को संवाद का सक्रिय वातावरण नहीं मिलता, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं मरने लगती हैं। बुजुर्ग धीरे-धीरे अपनी याददाश्त, अपनों के नाम और यहां तक कि अपनी बुनियादी पहचान भी भूलने लगते हैं। यह अलगाव दवाओं से ठीक होने वाली बीमारी नहीं है, यह एक ऐसी खामोश दिमागी विकृति है, जिसे सिर्फ आत्मीयता से ही रोका जा सकता है।

पहुंच से दूर

सरकार ने इससे निपटने के लिए योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन उनकी पहुंच और प्रभाव सीमित हैं। कई बुजुर्ग इन सेवाओं तक पहुंच ही नहीं पाते। कागजों पर सरकार ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के लिए भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम बना रखा है। इसके तहत बच्चे यदि मां-बाप को प्रताड़ित करें, तो उन्हें संपत्ति से बेदखल किया जा सकता है। मगर सच्चाई निराशाजनक है। कोई भी लाचार और बीमार पिता अपने ही बच्चों के खिलाफ कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

समाज के डर और ममता के कारण कानून सिर्फ फाइलों में दबा रह जाता है। रही बात राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन जैसी सरकारी योजनाओं की, तो कुछ सौ रुपयों की सरकारी मदद से आज के दौर में बुजुर्ग अपनी दवाइयों का खर्च भी नहीं उठा पाते। यह समस्या अब केवल शहरों तक सीमित नहीं है। गांवों में भी बुजुर्ग अकेले होते जा रहे हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। मगर इस बात की ओर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा है या यों कहें कि इस विकराल समस्या को देखकर भी सभी लोग इसे अनदेखा कर रहे हैं।

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हमारे देश में परिवार और समाज की जैसी परंपरा रही है, उसमें कई बार ऐसी बातों पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि कोई संतान ही अपने माता-पिता की न सिर्फ संवेदनात्मक जरूरतों, बल्कि अधिकारों तक से वंचित करने की कोशिश करने लगती है। ऐसे में सरकार और अन्य संबंधित महकमों का दखल जरूरी होता है, ताकि एक नागरिक के रूप में बुजुर्गों के अधिकारों का हनन रोका जा सके। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक