भारत ने वर्षों से अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों का व्यापक उत्सव मनाया है। फिर भी इन उपलब्धियों के पीछे की संस्थाएं, निवेश, असफलताएं और जवाबदेही अक्सर सार्थक सार्वजनिक जांच-पड़ताल से बाहर रही हैं। आज भारत में विज्ञान सार्वजनिक जीवन में पहले से कहीं अधिक दिखाई देता है। चंद्र अभियानों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर मौसम पूर्वानुमान और रोग प्रकोपों तक, वैज्ञानिक उपलब्धियां नियमित रूप से सुर्खियां बनती हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय वर्ष 2010-11 के 60,196.75 करोड़ से बढ़कर 2020-21 में 1,27,380.96 करोड़ हो गया। जबकि यह व्यय सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 0.6-0.7 फीसद के आसपास बना रहा। फिर भी इस प्रगति के पीछे एक कम चर्चित वास्तविकता मौजूद है। भारत में विज्ञान संबंधी अधिकांश सुर्खियां अब भी घोषणाओं, उपलब्धियों और आधिकारिक कथाओं पर केंद्रित रहती हैं। दूसरे शब्दों में, भारत विज्ञान को बढ़ावा देने में तो अधिक सफल रहा है, लेकिन उसकी आलोचनात्मक समीक्षा करने में नहीं। साक्ष्यों की पड़ताल करने वाली, दावों की जांच करने वाली, सार्वजनिक धन के उपयोग पर प्रश्न उठाने वाली और वैज्ञानिक सीमाओं को समझाने वाली स्वतंत्र सामग्री अपेक्षाकृत दुर्लभ है।

जैसे-जैसे विज्ञान सार्वजनिक नीतियों और दैनिक जीवन को अधिक प्रभावित कर रहा है, यह अंतर अनदेखा करना कठिन होता जा रहा है। भारत में विज्ञान लेखन और विज्ञान प्रसार की एक लंबी परंपरा रही है। स्वतंत्रता के बाद वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल रहा। मगर विज्ञान को लोकप्रिय बनाने और विज्ञान पत्रकारिता के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। विज्ञान प्रसार का उद्देश्य वैज्ञानिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना होता है, जबकि विज्ञान पत्रकारिता का दायित्व वैज्ञानिक दावों, नीतियों, संस्थानों और सार्वजनिक निवेश की स्वतंत्र जांच-पड़ताल करना भी है।

समस्या विज्ञान की कमी नहीं है। समस्या उन संस्थागत ढांचों के सीमित विकास की है, जो विज्ञान को समाज से जोड़ने का कार्य करते हैं। विज्ञान पर लेखन और विश्लेषण को अक्सर वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रचार तक सीमित कर दिया गया है, जबकि उसकी वास्तविक जिम्मेदारी इससे कहीं व्यापक है। उसका कार्य केवल यह बताना नहीं है कि कोई खोज हुई है, बल्कि यह भी समझाना है कि वह खोज क्यों महत्त्वपूर्ण है, उसकी सीमाएं क्या हैं, उसके सामाजिक प्रभाव क्या हो सकते हैं और उसके पीछे मौजूद वैज्ञानिक साक्ष्य कितने मजबूत हैं। भारत में विज्ञान लेखन को जगह मिलने का सवाल भी चिंता का विषय है। जब मुख्यधारा के सूचना माध्यमों में विज्ञान को प्राथमिकता नहीं मिलती है, तब विज्ञान पत्रकारिता स्वाभाविक रूप से हाशिये पर चली जाती है। अनेक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि विज्ञान लेखन और विश्लेषण को अक्सर महामारी, आपदा या किसी बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि के समय ही प्रमुखता मिलती है, जबकि सामान्य दिनों में राजनीति, अपराध और मनोरंजन जैसे विषय समाचार एजंडे पर हावी रहते हैं। परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, अनुसंधान नीति, वैज्ञानिक जवाबदेही और शोध की गुणवत्ता जैसे विषय मुख्यधारा की बहसों में अपेक्षित स्थान नहीं बना पाते।

विज्ञान पत्रकारिता के लिए समय, विशेषज्ञता और संसाधनों की आवश्यकता होती है। टीवी की दुनिया में ‘ब्रेकिंग न्यूज’ के विपरीत, इसमें पत्रकारों को वैज्ञानिक निष्कर्षों का मूल्यांकन कर उन्हें व्यापक सामाजिक संदर्भ में दुनिया के सामने रखना पड़ता है। अधिकतर समाचार संस्थानों में राजनीति, चुनाव, अपराध और मनोरंजन को अधिक स्थान मिलता है, जबकि विज्ञान को अक्सर एक विशेषीकृत विषय मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप जटिल वैज्ञानिक विषयों पर निरंतर और सुगठित लेखन विकसित नहीं हो पाता। हालांकि सोशल मीडिया ने वैज्ञानिक जानकारी तक पहुंच का विस्तार किया है, लेकिन उसने भ्रामक सूचनाओं के प्रसार को भी बढ़ाया है।

अधिकांश विज्ञान लेखन उपलब्धियों और सफलता की कहानियों पर केंद्रित रहते है। जहां वैज्ञानिक उपलब्धियों को व्यापक ध्यान मिलता है, वहीं अनुसंधान की गुणवत्ता, वैज्ञानिक कदाचार, सार्वजनिक धन के उपयोग और संस्थागत जवाबदेही जैसे विषयों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। यह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत की वैज्ञानिक व्यवस्था का बड़ा हिस्सा करदाताओं के धन से संचालित होता है। फिर भी, अनुसंधान की प्राथमिकताएं कैसे तय होती हैं, परिणामों का मूल्यांकन कैसे किया जाता है और संस्थानों को किस प्रकार जवाबदेह बनाया जाता है? यह सब सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा होना चाहिए।

शोध-पत्रों की वापसी, वैज्ञानिक कदाचार और भारत की ‘प्रकाशित करो या समाप्त हो जाओ’ संस्कृति पर हाल के विवादों ने अनुसंधान की गुणवत्ता, प्रकाशन दबाव और संस्थागत जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। ये ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा संबंध वैज्ञानिक विश्वसनीयता से है, लेकिन वे आमतौर पर उतनी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा नहीं बनते, जितना महत्त्व किसी नई वैज्ञानिक उपलब्धि या तकनीकी सफलता को मिलता है। फिर भी जवाबदेही और विश्वास को परस्पर विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित एक टिप्पणी में तर्क दिया गया है कि वैज्ञानिकों और पत्रकारों को मिलकर अनुसंधान की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि भ्रामक सूचनाएं और राजनीतिक दबाव विज्ञान में सार्वजनिक विश्वास के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। अक्सर विज्ञान लेखन किसी नई खोज की घोषणा पर समाप्त हो जाता है, लेकिन पाठकों को यह भी जानना चाहिए कि साक्ष्य कितने विश्वसनीय हैं, कौन-से प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं और क्या खोज से जुड़े दावे वास्तव में उचित हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और जैव-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में लिए जाने वाले वैज्ञानिक निर्णय सीधे नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं। विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित विषय नहीं है। जब वैज्ञानिक ज्ञान सार्वजनिक नीतियों, स्वास्थ्य, पर्यावरण और प्रौद्योगिकी संबंधी निर्णयों को प्रभावित करता है, तब नागरिकों का यह अधिकार भी बनता है कि वे उन निर्णयों के पीछे मौजूद साक्ष्यों, सीमाओं और अनिश्चितताओं को समझ सकें। विज्ञान पत्रकारिता लोगों को इन मुद्दों को समझने और उनसे जुड़ी नीतिगत बहसों में सार्थक भागीदारी करने में मदद करती है।

साथ ही, भारत में विज्ञान पत्रकारिता के लिए अवसर पहले से कहीं अधिक हैं। जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जैव-विविधता का क्षरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, खाद्य सुरक्षा और जल संकट जैसे मुद्दे सीधे नागरिकों के जीवन से जुड़े हैं। इन सभी के केंद्र में विज्ञान मौजूद है। भविष्य की सबसे सफल विज्ञान पत्रकारिता वही होगी, जो प्रयोगशाला और समाज के बीच की दूरी को कम कर सके। भारत को अब केवल अधिक विज्ञान नहीं, बल्कि विज्ञान पर अधिक सार्वजनिक निगरानी की भी जरूरत है। वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। आखिरकार विज्ञान में सार्वजनिक विश्वास केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि इस बात पर भी कि वैज्ञानिक संस्थाएं प्रश्नों और आलोचनात्मक समीक्षा के लिए कितनी खुली हैं।