जीवन में विकल्पों का मौजूद होना किसी वरदान से कम नहीं होता। विकल्प हमें मनपसंद रास्ते चुनने की अभूतपूर्व सुविधा देते हैं। मगर यहां दुविधा तब आने लगती है, जब हम किसी विशेष विकल्प को ही महत्त्वपूर्ण मानते हुए अन्य विकल्पों को खारिज करते चले जाते हैं।

आज का समय विज्ञान एवं तकनीक का है। इसलिए अक्सर पढ़ाई हो, रोजगार हो या फिर कोई और अवसर, हम विज्ञान और तकनीक को ही वरीयता देते हैं, लेकिन इस क्रम में कला पक्ष बिल्कुल पीछे छूटता चला जाता है। तो क्या कला की कोई उपादेयता नहीं होती?

मनुष्य जब एक केवल जीव के रूप में जन्म लेता है, तब संस्कृति, संवेदना और सृजनशीलता ही उसे मनुष्य बनाती है। इन्हीं में कला का स्थान सर्वोच्च है। कला वह शक्ति है, जो पत्थर में देवत्व, शब्दों में संवेदना, रंगों में भाव, सुरों में आत्मा और जीवन में सौंदर्य भर देती है। जिस समाज में कला जीवित रहती है, वहां मानवता भी जीवित रहती है।

प्रसिद्ध चित्रकार पाब्लो पिकासो ने कहा था, ‘कला आत्मा पर जमी हुई जीवन की धूल को प्रतिदिन साफ करती है।’

वास्तव में, कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आत्मा का परिष्कार है। यह मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाती है और उसे जीवन के गहरे अर्थों से परिचित कराती है। आज का युग कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी विकास और तीव्र प्रतिस्पर्धा का युग है। इससे मनुष्य के पास सुविधाएं तो बढ़ी हैं, पर मानसिक शांति कम हुई है।

तनाव, अकेलापन, अवसाद और असहिष्णुता जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं

तनाव, अकेलापन, अवसाद और असहिष्णुता जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे समय में कला मनुष्य के लिए आशा की किरण बनकर सामने आती है। संगीत मन को शांति देता है, साहित्य विचारों को दिशा देता है, चित्रकला भावनाओं को अभिव्यक्ति देती है और नृत्य शरीर तथा मन के बीच सामंजस्य स्थापित करता है।

अनेक अध्ययनों में ऐसे तथ्य उजागर हुए हैं कि कला-आधारित गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य सुधारने, तनाव कम करने तथा सामाजिक जुड़ाव बढ़ाने में प्रभावी भूमिका निभाती हैं। इसी प्रकार यूनेस्को का मानना है कि कला और संस्कृति शांति, सामाजिक समरसता तथा सतत विकास की आधारशिला हैं।

दरअसल, कला केवल व्यक्तिगत रुचि नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता भी है। भारतीय संस्कृति में कला को ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम माना गया है। मंदिरों के भित्तिचित्र एवं मूर्तियां हमारी आध्यात्मिक चेतना का परिचय देती हैं। ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ का भारतीय दर्शन बताता है कि सत्य, कल्याण और सौंदर्य- तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

कला का सबसे बड़ा नैतिक पक्ष यह है कि वह मनुष्य को संवेदनशील बनाती है। जो व्यक्ति कविता पढ़ता है, संगीत सुनता है या चित्रों में भावों को पहचानता है, उसके भीतर करुणा, सहानुभूति और प्रेम का विकास होता है। हिंसा, घृणा और कट्टरता का स्थान सहिष्णुता और मानवता ले लेती है।

यही कारण है कि महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के संदेश को केवल भाषणों से नहीं, बल्कि भजनों, लोकगीतों और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का कथन है कि ‘कल्पना ज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण है।’

कल्पना ही नए आविष्कारों को जन्म देती है

दरअसल, कल्पना ही नए आविष्कारों को जन्म देती है और कल्पना का सबसे बड़ा विद्यालय कला है। एक चित्रकार रंगों से सोचता है, एक कवि शब्दों से और एक वैज्ञानिक सूत्रों से, लेकिन तीनों का आधार सृजनात्मक कल्पना ही है।

भारत की कला-परंपरा विश्व में अद्वितीय है। भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कथकली, मधुबनी, वारली, पट्टचित्र, लोकगीत, लोकनाट्य, शास्त्रीय संगीत और लोकवाद्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। इन्हें संरक्षित रखना केवल परंपरा का सम्मान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी है।

आज कला रोजगार और आत्मनिर्भरता का भी सशक्त आधार बन चुकी है। केवल परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त कर लेना ही सफलता नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य संवेदनशील, जिम्मेदार और नैतिक नागरिक तैयार करना भी है। अगर विद्यालयों में संगीत, नाटक, चित्रकला और साहित्य को समान महत्त्व दिया जाए, तो विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, टीम भावना और समस्या-समाधान की योग्यता अपने आप विकसित होगी।

कला को केवल शौक न समझें, बल्कि जीवन का अनिवार्य अंग बनाएं

वास्तव में, कलाकार समाज का दर्पण भी होता है और उसका पथप्रदर्शक भी। इतिहास में अनेक सामाजिक आंदोलनों को साहित्य, रंगमंच और लोककलाओं ने नई दिशा दी है। कला अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का सबसे प्रभावी और शांतिपूर्ण माध्यम भी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम कला को केवल शौक न समझें, बल्कि जीवन का अनिवार्य अंग बनाएं। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी कला से जुड़कर अपने व्यक्तित्व को अधिक संतुलित और समृद्ध बना सकता है, फिर चाहे वह लेखन हो, संगीत हो, चित्रकला हो, नृत्य हो या हस्तशिल्प।

कला मनुष्य के अंदर छिपी शक्ति को पहचानने और अभिव्यक्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है। यह हमें सिखाती है कि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं, बल्कि संवेदनाओं, सौंदर्य, करुणा और सृजन का उत्सव भी है। यह मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, संस्कृति को संरक्षित रखती है और समाज को अधिक मानवीय बनाती है।

जब हम कला को जीवन की आवश्यकता के रूप में स्वीकार कर लेंगे, इसे लेकर सहज हो जाएंगे, तब हमारा समाज अधिक संवेदनशील, अधिक रचनात्मक और अधिक शांतिपूर्ण बन सकेगा। विज्ञान हमें जीवन जीने के साधन देता है, पर कला हमें जीवन जीने का कारण देती है।

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हर अनुभव के साथ हमारा व्यक्तित्व परिष्कृत, मजबूत और सुदृढ़ बनने लगता है। न्यायपूर्ण और स्पष्ट निर्णय लेना धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है। पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें