सद्गुरु: इस साल 1 मई को बुद्ध पूर्णिमा है। हालाँकि, “बुद्ध” शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर गौतम बुद्ध के लिए किया जाता है, लेकिन इस धरती पर हज़ारों बुद्ध हुए हैं और आज भी हैं।
“बुद्ध” का शाब्दिक अर्थ है, वह व्यक्ति जो बुद्धि से ऊपर उठ चुका हो। जब आप बुद्धि से ऊपर उठ जाते हैं, तो आप दुखों से भी परे हो जाते हैं। बुद्ध पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि हर इंसान के लिए पीड़ा से परे जाना संभव है। उस अवस्था में पहुँचने के लिए आपको न तो कोई धर्मग्रंथ जानने की जरुरत है और न ही हिमालय की चोटियों पर जाकर बैठने की। इसके लिए एकमात्र योग्यता है, ‘इच्छुक होना।’ जो आपके भीतर है, उससे आपको कभी वंचित नहीं किया जा सकता; अगर आप इच्छुक हैं, तो वह हमेशा उपलब्ध है।
इंसान का परम प्रकृति में खिलना
लगभग आठ साल के शरीर तोड़ने वाले प्रयास के बाद, गौतम बहुत कमज़ोर हो गए थे। चार साल तक, वे एक ‘शमन’ साधक के रूप में रहे थे। शमन के लिए मुख्य साधना थी – चलते रहना और कभी भी भोजन की तलाश न करना। बस चलते रहना और उपवास करना। इस प्रक्रिया ने उनके शरीर को लगभग मृत्यु की कगार तक पहुँचा दिया था।
इस समय, वे ‘निरंजन’ नाम की एक जलधारा के पास पहुँचे। उन्होंने नदी पार करने की कोशिश की, लेकिन बीच रास्ते में ही वे इतने कमज़ोर हो गए थे कि एक और कदम तक न ले सके। लेकिन वे हार मानने वालों में से नहीं थे; तो उन्होंने एक सूखी डाल को कसकर पकड़ लिया और बस वहीं खड़े रहे।
कहा जाता है कि वे इसी तरह कई घंटे खड़े रहे। हमें ठीक-ठीक नहीं पता कि वे सचमुच कई घंटे खड़े रहे थे, या फिर कुछ पल के लिए, जो कमज़ोरी की उस हालत में उन्हें घंटों जैसे प्रतीत हुए थे। लेकिन ठीक उसी क्षण, उन्हें एहसास हुआ कि जो वे तलाश रहे हैं, अगर वह आखिरकार उनके अंदर ही है, फिर यह सारा संघर्ष किसलिए?
जब उन्हें इसका एहसास हुआ, तो उन्हें अगला कदम उठाने, नदी पार करने और बोधि वृक्ष के नीचे बैठने के लिए, जो अब प्रसिद्ध बोधि वृक्ष है, थोड़ी और ऊर्जा मिल गई। वे इस दृढ़ संकल्प के साथ बैठे कि, “जब तक मुझे परम ज्ञान प्राप्त नहीं होता, मैं यहाँ से नहीं हिलूँगा। या तो मैं एक प्रबुद्ध प्राणी के रूप में उठूँगा, या इसी मुद्रा में अपने प्राण त्याग दूँगा।” और बस एक पल में, उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया, क्योंकि इसके लिए बस इतना ही चाहिए होता है।
उस पूर्णिमा के दिन को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि यदि हमारे जीवन में केवल यही एकमात्र प्राथमिकता होती है, तो आत्मज्ञान एक पल में हो सकता है।
बुद्ध के मार्ग का सार
मानवता के इतिहास में कई आध्यात्मिक गुरु हुए हैं, लेकिन गौतम उनमें से सबसे अधिक प्रचलित हैं। दुर्भाग्य से, गौतम ने जिस मार्ग की वकालत की थी, उसकी समय के साथ गलत व्याख्या कर दी गई है। आज, बहुत से लोग इसे इच्छा-रहित होने का मार्ग, साहस के बजाय संतोष का मार्ग मानते हैं। संतोष का अर्थ है स्वयं को सीमित करना। अपने जीवन को कोई क्यों सीमित करना चाहेगा? क्योंकि वे उससे डरते हैं। इच्छा-रहित होने और अनासक्ति की यह शिक्षा इसलिए लोकप्रिय हुई, क्योंकि लोग जीवन में अपने चुनाव से ही शामिल होना पसंद करते हैं। जब आप जीवन में चुनिंदा तरीके से शामिल होना चुनते हैं, तो स्वाभाविक रूप से आप उसमें उलझ जाते हैं; इसे ही आमतौर पर आसक्ति कहा जाता है।
जब लोग कहते हैं, “अनासक्त बनो,” तो इसका अर्थ है कि उनका जीवन के लिए समाधान है, “इससे बचो!” यदि आप जीवन से बचना चाहते हैं, तो इसका अर्थ है मृत्यु। जीवित रहते हुए भी मरने की चाह रखना, लेकिन न मरना, एक प्रकार की यातना है। यह आधा-जीवन है। लोगों का मानना है कि जीवन में शरीक होने का अर्थ है चोट खाना। ऐसा नहीं है। यह उलझना या चुनिंदा तरीके से शामिल होना ही है, जो पीड़ा और दुःख का कारण बनता है।
जब गौतम ने इच्छा-हीनता की बात की, तो उनका मतलब था कि इच्छा को एक साधन के तौर पर इस्तेमाल करके भौतिकता से परे, अपनी अनंत प्रकृति की ओर बढ़ा जाए। अगर आपकी इच्छा की असीमता कई चरणों में अभिव्यक्ति पाती है, तो यह एक खुद को हराने वाली प्रक्रिया है, क्योंकि आप अनंत तक गिन नहीं सकते। अगर आप असीमित विस्तार की तलाश में हैं, तो असल में आप आध्यात्मिकता तलाश रहे हैं। आप सृष्टि के किसी एक हिस्से से संतुष्ट होने को तैयार नहीं हैं; तो आप स्वयं सृष्टिकर्ता को ही पाना चाहते हैं। यही परम लालच है।
तो, इस बुद्ध पूर्णिमा पर, जीवन में बस सर्वोच्च की इच्छा करें। अपने सारे जूनून को उस सर्वोच्च संभावना की ओर मोड़ दें, जो आप सोच सकते हैं। अपनी इच्छा को आज़ाद कर दें; उसे सीमित में सीमित न करें। इच्छा की असीमता ही आपकी परम प्रकृति है।
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