कभी सोचा है हमने कि दुनिया की पहली सुबह कैसी रही होगी? जब पहली बार अंधेरे की काई फटी होगी और उजाले ने धरती को छुआ होगा, तब क्या चिड़ियों ने कोई ‘कोड’ यानी संकेत-भाषा या ‘पासवर्ड’ का इस्तेमाल किया होगा? शायद नहीं। वह एक आदिम कौतुक रहा होगा। जैसे किसी बच्चे ने पहली बार अपनी आंखें खोली हों और उसे लगा हो कि यह दुनिया कोई ठोस चीज नहीं, बल्कि रोशनी का एक तरल विस्तार है। विनोद कुमार शुक्ल के शिल्प में देखना चाहें, तो सुबह वह खिड़की रही होगी है, जो बिना दीवार के भी खुलती है। वह ऐसा शब्द है, जिसे बोलने के लिए जीभ की नहीं, बस पलकें झपकाने की जरूरत होती है।
सुबह कोई घटना नहीं है। यह तो रात भर की थकान के बाद भाषा का संपादन है। सुबह भाषा का सबसे बड़ा शब्द है। यह रात की उस भारी भरकम शब्दावली को छांटकर उसे संक्षिप्त और सुबोध बना देती है। रात जहां विशेषणों का बोझ है, सुबह वहां एक स्पष्ट क्रिया है। जैसे कोई कुम्हार चाक घुमाने से पहले मिट्टी को सहलाता है, सुबह हमारे अस्तित्व को वैसे ही सहलाती है। वह हमें बताती है कि हाथ केवल वजन उठाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया को एक नया आकार देने के लिए बने हैं। विचारों की ओस जब संकल्प की धूप से मिलती है, तभी कर्म का फल पकता है।
सूफी संत और दार्शनिक रूमी सुबह की हवा को आध्यात्मिक संवाद मानते थे। वे कह गए हैं- ‘सुबह की ठंडी हवा के पास तुम्हें बताने के लिए कुछ रहस्य हैं। वापस सोने मत जाओ। तुम्हें वह द्वार खटखटाना ही होगा, जहां रूह और दुनिया मिलते हैं।’ जिब्रान ने तो सुबह को प्रकृति के संगीत के रूप में देखा- ‘ओस की बूंदों में सुबह का दिल धड़कता है। यदि आप सुबह के सौंदर्य को नहीं देख पा रहे, तो समझें कि आपने जीवन के व्याकरण का सबसे कोमल शब्द खो दिया है।’ दुनिया भर के सभी दार्शनिकों के मूल में एक बात साझा है- सुबह होती नहीं है, सुबह बनानी पड़ती है। यह रात की हार नहीं, बल्कि प्रकाश की वह जिद है, जो हर रोज शून्य से शुरू होती है। यह श्रम के सौंदर्य का प्रवेश द्वार है, जहां हाथ और विचार एक लय में मिलते हैं।
उदासी का वह पथराया हुआ नाला, जो रात भर अपने वेग में पत्थर ढो रहा था, सुबह होते ही नदी के आंचल में विसर्जित हो जाता है। यहां ‘विसर्जन’ का अर्थ ‘खत्म होना’ नहीं, बल्कि ‘समाहित होना’ है। उत्तर-आधुनिक समय में, जहां हम सब अपनी-अपनी व्यक्तिगत उदासी के ‘सेल्फ-आइसोलेशन’ यानी स्वनिर्मित एकाकीपन में बंद हैं, सुबह हमें यह याद दिलाती है कि हम पानी हैं। और पानी का स्वभाव है बहना, प्यास की तरह एक जगह ठिठकना नहीं।
आज के समय में सुबह का अर्थ बदल गया है। अब सुबह सूरज के उगने से नहीं, बल्कि स्मार्टफोन के ‘नोटिफिकेशन’ से शुरू होती है। हमारी खिड़कियां अब कांच की नहीं, पिक्सेल की हैं, लेकिन क्या इस शोर में सुबह की वह ‘अथाह शांति’ मर गई है? शायद नहीं। सुबह आज भी एक प्रतिरोध है। वह उस ‘यांत्रिक’ दुनिया के खिलाफ एक जैविक विद्रोह है। जब पूरी दुनिया डेटा और एल्गोरिद्म में बदल रही होती है, तब सुबह की पहली ओस एक ऐसा ‘प्रतीक’ है, जिसे कोई साफ्टवेयर दोबारा नहीं उतार सकता।
सांस्कृतिक दृष्टि से सुबह का बड़ा महत्त्व है। यह प्रतीक्षा का अंत है। सुबह यह सिखाती है कि इंतजार व्यर्थ नहीं जाता। सुबह साझा अस्मिता भी है। यह किसी एक की नहीं होती। यह धूप का एक ऐसा कंबल है, जिसे पूरी सृष्टि एक साथ ओढ़ती है। सुबह श्रम का न्योता है, वह अदृश्य चिट्ठी है, जिसे सूरज हर घर की चौखट पर छोड़ जाता है, जिस पर लिखा होता है कि दुनिया अभी खत्म नहीं हुई है, उसे आज फिर से थोड़ा-सा बनाना है।
कल्पना कर सकते हैं कि एक बूढ़ा आदमी बरामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा है, लेकिन उसकी नजर अखबार के अक्षरों पर नहीं, बल्कि उस गौरैया पर है, जो जमीन पर गिरे हुए बिस्कुट के चूरे को देख रही है। यह दृश्य ही असल में ‘सुबह’ है। सुबह का अर्थ है पुनरागमन। हर चीज वापस आती है- आवाजें, रंग, गंध और वह भरोसा कि हम अभी जीवित हैं।
उदासी आखिरी पहर का आचरण है, ठीक वैसे ही जैसे दीये की लौ बुझने से पहले थोड़ा फड़फड़ाती है। जो लोग रात भर उदास रहे, उन्होंने असल में सुबह की जमीन तैयार की। बिना काली स्याही के कागज पर सफेद अक्षर कैसे उभरेंगे? इसलिए सुबह केवल उजाला नहीं है, वह रात के संघर्ष का ‘प्रमाणपत्र’ है।
कुछ सुनना चाहें तो हमें प्यास नहीं बनना है, क्योंकि प्यास में एक तरह का खालीपन और अभाव है। हमें पानी बनना है, जो लचीला है, जो रास्ता बनाना जानता है और जो विसर्जन में विश्वास रखता है। सुबह हमें वह जगह देती है, जहां हम अपने कठोर अस्तित्व को त्यागकर सहज मनुष्य बन सकें। सुबह व्याकरण का सबसे गहन अर्थ है, क्योंकि वह ‘पूर्णविराम’ नहीं, ‘अल्पविराम’ है। एक ऐसी सांस, जो हमें अगले कदम के लिए तैयार करती है।
