धीरज धर्म मित्र अरु नारी
आपद काल परिखिअहिं चारी
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिवचंपत राय ने चढ़ावा चोरी मामले में अपना पक्ष तुलसीदास की इन पंक्तियों से रखा। हालांकि चंपत राय को अपने मित्रों से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। आस्था पर इतने बड़े प्रहार के बाद भी बहुत दबाव के बाद उनसे महज इस्तीफा भर लिया गया है। चारों तरफ से चंपत राय की सादगी और निष्कलंक होने के प्रमाणपत्र आ रहे हैं। जहां तक धर्म की बात है, उसे चंपत राय से कई शिकायतें होंगी। धर्म और आस्था की नगरी का तो दृश्य ऐसा होना चाहिए था कि आरोप लगते ही चंपत राय को अपना पद वैसे ही त्याग देना चाहिए था, जैसे श्रीराम ने अपनी प्रिया को त्यागा था। जिस अयोध्या नगरी के कोने-कोने में मानस की पंक्तियां लिखी हैं, वहां संघ का सौ साल का संघर्ष भी चढ़ावा चोरों को धर्म याद नहीं दिला पाया। शताब्दी वर्ष में अयोध्या से मिले संघ को संदेश पर बेबाक बोल।
संघ केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है जो रोज शाखा आते हैं, बल्कि इसका असली बल वह व्यापक समाज है जो संघ के विचारों से सहमत है और समाज में रहकर काम कर रहा है।
संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस ने संघ की शक्ति के आधार की व्याख्या कुछ इस तरह से की थी। संघ के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि संघ उन लोगों के दम से है जो संघ में नहीं हैं और संघ के हैं। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना के बाद पिछले दिनों संघ सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि इस घोर निंदनीय घटना को असाधारण मान कर गंभीरता से व्यवस्था और संचालन की सभी कमियों को दूर करने हेतु परिणामकारक कदम उठाए जाएं, ताकि अयोध्या-मंदिर पर करोड़ों रामभक्तों की आस्था-श्रद्धा अखंड और अटूट बनी रहे।
होसबाले की अपेक्षा उचित है। लेकिन बात अयोध्या-मंदिर पर आस्था की नहीं है। अयोध्या पर राम भक्तों की आस्था तब से है, जब इतिहास के दस्तावेजी पन्ने शुरू नहीं हुए थे। अयोध्या पर भक्तों की आस्था तब से है, जब से उन्होंने वाल्मीकि की रामायण औरतुलसी के मानस को मंदिर की तरह माना।अयोध्या पर आस्था तब भी थी, जब रामलला तंबू में विराजमान थे। अयोध्या पर राम भक्तों की आस्था तब से है, जब संघ ने रामजन्मभूमि मंदिर की लड़ाई की अगुआई अपने हाथ में नहीं ली थी। अयोध्या पर आस्था तब भी रही, जब मंदिर के उद्घाटन में सत्ता पक्ष की घोर राजनीति देखी गई और आस्था तब भी अक्षुण्ण है जब राम के धाम पर चढ़ावा चोरी का संकट आया।
आज सवाल अयोध्या पर आस्था का नहीं, संघ पर आस्था का है। देश के करोड़ों रामभक्त संघ की शाखा में गए बिना ही संघ के हो गए क्योंकि उसने राम-मंदिर के लिए संघर्ष की अगुआई की। संघ की अनगिनत शाखाएं हर उस घर में लगने लगी, जहां राम-मंदिर के निर्माण में योगदान देने के लिए बचत की जाने लगी। हर घर की नानी-दादी संघ की हो गई जिनकी गुल्लक में मंदिर के लिए चढ़ावा जमा होने लगा।
आस्था का नेतृत्व करना आसान नहीं होता है। इसमें आपको अयोध्या-नगरी जैसी होना होगा। अयोध्या का शाब्दिक अर्थ है, जिसे युद्ध के द्वारा न जीता जा सके, जो युद्ध के योग्य न हो। अयोध्या की भव्यता उससे जुड़ी आस्था ही है। राम वनवास गए तो अयोध्या की आस्था रही कि आराध्य यहीं लौटेंगे। अयोध्या पर आस्था तब भी रही, जब भरत ने वहां के सिंहासन पर श्रीराम की चरण-पादुका रख दी। अवध का वध नहीं हो सकता। अयोध्या अमर है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भव्यता उसकी सादगी थी।
संघ के स्वयंसेवकों का जुड़ाव जल-जंगल-जमीन वाले मुहावरे से था। स्वयंसेवकों को जहां आसरा मिलता था सो जाते थे, जो उपलब्ध होता था, खा लेते थे। जिन्हें कल के लिए संचय की चिंता नहीं हो वही उस मंदिर के लिए लड़ाई लड़ सकते थे, जिसके बनने की तारीख उसे पता नहीं थी। संघ आस्था के बल पर ही कहता था-मंदिर वहीं बनाएंगे, और उसके इस नारे पर राम-भक्तों की आस्था हुई। अब राम-मंदिर के निर्माण को एक तारीख मिल चुकी है।
संघ अपनी स्थापना के सौवें वर्ष में प्रवेश के पहले ही अपने संघर्ष पर विजय प्राप्त कर चुका था। मंदिर-निर्माण को एक तारीख मिलते ही उसके पास संघर्ष का मीठा फल आने लगा। अब संघ स्वभावत: सादगी से संपन्नता की ओर बढ़ने लगा।
संघ के नेतृत्व से जुड़े लोगों की महंगी गाड़ियों के कारवां को देख कर भी भक्तों ने कहा, इन्हें हक है। दिल्ली में आपकी कर्मभूमि झंडेवालान में भव्यता का झंडा गड़ने लगा, अन्य जगहों पर बन रहे दफ्तरों को भी आपका जायज हक माना गया। मंदिर तो राम-भक्तों के धन से बना, लेकिन अब आपको जनता के आयकर से मिली सरकारी सुरक्षा पर भी रामभक्तों ने सवाल नहीं उठाए। आस्था के अगुआ को सरकारी सुरक्षा की जरूरत क्यों आन पड़ी यह सवाल बेमानी था। आपके संघर्ष के बीज से खड़ी हुई सत्ता के पेड़ का फल भला आपके लिए निषिद्ध क्यों रहता?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सादगी से संपन्नता की ओर जो गति थी, उसमें राम मंदिर का चढ़ावा चोरी का मामला अब सबसे बड़ा बाधक बन गया है। इसके कारण साफ हैं। इतने बड़े मसले पर सत्ता का शीर्ष नेतृत्व चुप्पी क्यों साधे हुए है? आखिर संघ के नेतृत्व कोबोलने की जरूरत क्यों पड़ी, जबकि संगठन का मूलभूत सिद्धांत है कि महज मांग के आधार पर बयान की आपूर्ति नहीं करनी है।
अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ सिर्फ अपने मंच से बोलना है। पहले संघ के नेता साक्षात्कार भी नहीं दिया करते थे। इसलिए लोगों को इंतजार रहता था, संघ-सरसंघचालक के विजयादशमी-संदेश का। अब विजयादशमी-संदेश की उत्सुकता भी खत्म होती जा रही है क्योंकि सत्ता का पितृ-पक्ष होने के कारण आपको किसी भी सप्तमी, अष्टमी या नवमी पर बोलने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
राम-मंदिर के चढ़ावा चोरी को केंद्र सरकार से जोड़ कर नहीं देखा जा रहा है। राम मंदिर न्यास को बनाया तो सरकार ने था, लेकिन उसमें ज्यादातर पदाधिकारी संघ से जुड़े थे। इसलिए सबसे ज्यादा सवाल संघ पर ही उठे। चढ़ावा चोरी के बाद न्यास में जो परिवर्तन हुआ है, उसमें भी संघ से ही जुड़े लोग हैं। राम-मंदिर के इतिहास के पांच सदी के पन्नों पर संघ ने अपना दावा किया तो संघ के इतिहास के सौवें साल में चढ़ावा चोरी के आरोप से उसकी विजय-पताका पर सवालों के दाग तो लग गए हैं।
ऊपर उद्धृत किया गया है कि किस तरह से संघ विचारकों का मानना था कि संघ उनसे है, जो संघ में नहीं होकर भी संघ के हैं। अब कैलाश विजयवर्गीय सत्ता पक्ष के विजय भरे गर्व से कहते हैं-राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद हर सरकारी अधिकारी खुद को आरएसएस का बताने लगा है। अफसर अपनी कमर दिखा कर बताते हैं कि वे भी संघ की शाखा में जाते थे, उन्होंने चड्डी पहनी है और बेल्ट लगाई है। सरकार आने के बाद सभी संघ के हो गए। अब एक तरीके से बहुत भीड़ हो गई है। भीड़ में अच्छे इंसान की कमी हो गई है। संगठन बढ़ रहा है, कहने के लिए विचारधारा भी बढ़ रही है। मगर अच्छे इंसान नहीं होंगे…।
संघ के साथ कौन हैं? बालासाहेब देवरस से लेकर विजयवर्गीय के कथन का अंतर आपके शताब्दी-संघर्ष को गहरा संदेश भी दे रहा है। संघर्ष को सफल होने में सौ साल तक का समय लग सकता है। लेकिन संघर्ष की सफलता को निष्कलंक रखना सबसे बड़ी चुनौती है, तब तो और भी ज्यादा जब आपके संघर्ष के आंगन में सत्ता की कामधेनु खड़ी हो। चढ़ावा चोरी मामले में न्यास के लोगों ने जब बोलना शुरू किया तो समझ में आया कि संघर्ष की राह में कम बोलना क्यों जरूरी होता है? संघ ने सौ साल में जो राजनीतिक सफलता पाई है वह उस संगठन के लिए अभूतपूर्व है जो खुद को राजनीतिक नहीं मानता है। संघर्ष का सफर अनाथ के रूप में शुरू होता है, लेकिन सफलता के सभी सगे हो जाते हैं। सौवें वर्ष पर सगों की भीड़ में अयोध्या-संदेश को जरूर सुनें।
