हाल ही में धनुष और कृति सेनन की फिल्म ‘तेरे इश्क में’ काफी चर्चा में रही। वैसे तो ये एक रोमांटिक ड्रामा जॉनर की फिल्म बताई गई, लेकिन जिसने भी इसे देखा वो इस उलझन में पड़ गया कि आखिर ये कैसा प्यार है? दर्शकों को ये समझ ही नहीं आया कि अगर लड़की, लड़के से प्यार करती थी तो उसे ये बात समय रहते क्यों नहीं पता चली? लड़का, उस लड़की के प्यार में इतना दीवाना हो गया कि उसने अपने पिता के जीते जी उसकी तकलीफ को नहीं समझा? लड़की प्यार में रहते हुए किसी और के साथ शादी करके अपने पति का बच्चा किस हक से लड़के को सौंपने आई? कुल मिलाकर इस फिल्म ने सबको कन्फ्यूज कर दिया और इसे लेकर तरह-तरह के मीम बनने लगे और लोग इस फिल्म पर सवाल उठाने लगे कि ‘ये कैसा इश्क’?

इस सिने गुफ्तगू में हम आपको दशकों से हिंदी सिनेमा में बदलते आए प्रेम कहानियों के चलन के बारे में बताने जा रहे हैं। जिससे आप अंदाजा लगा पाएंगे कि आखिर कैसे बॉलीवुड में लव स्टोरी की परिभाषा बदलती जा रही है। कभी बड़े पर्दे पर लैला-मजनू, हीर-रांझा, सलीम-अनार कली जैसी लव स्टोरी दिखाई जाती थीं, वहीं अब बदला, जुनून और दीवानगी की हदें पार करते हुए दिखाया जा रहा है।

दशकों से हिंदी सिनेमा ने प्यार को अलग-अलग तरीके से पेश किया गया है। कभी ये प्यार त्याग और बलिदान का प्रतीक रहा, कभी एक तरफा और मासूम रहा तो कभी जुनून भरा बन गया। समय के साथ समाज बदला, फैशन बदला, चलन बदला यहां तक की रिश्तों की समझ तक बदल गई और उसी के साथ बदलती गई फिल्मों में प्यार की कहानी। अगर आज हम पीछे मुड़कर देखें तो समझ आता है कि बॉलीवुड की लव स्टोरीज भारतीय समाज के इतिहास की दर्शाती रही हैं।

1950–60 के दशक में आदर्श और त्याग की परिभाषा था प्रेम

इस दौर की लव स्टोरी सामाजिक मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों के बारे में हुआ करती थीं। पुरानी फिल्मों में दिखाया जाता था कि प्यार अपनी भावनाओं से ज्यादा समाज औ समाज की जिम्मेदारियों के आगे झुक जाता था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुग़ल-ए-आज़म फिल्म थी, जिसमें सलीम और अनारकली का प्यार सत्ता से टकराता है और हमेशा के लिए अमर हो जाता है। इसके अलावा ‘देवदास’ भी इसका बड़ा उदाहरण है।

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1970–80 के दशक में शुरू हुआ बदलाव

इस समय तक समाज में बदलाव शुरू हो चुका था और सिनेमा भी वास्तविक्ता दिखाई जाने लगी। प्रेम अब सिर्फ सपनों की दुनिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसमें दर्द, अकेलापन और संघर्ष भी जुड़ने गया। इसका बड़ा उदाहरण कमल हासन और श्रीदेवी की फिल्म ‘सदमा‘ थी, जिसमें रोमांटिक रिश्ता नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और निस्वार्थ सेवा दिखाई गई है। ये वो दौर था जब प्यार हमेशा हासिल करना मुश्किल होने लगा।

1990 के दशक में शुरू हुआ रोमांस

ये वो दौर था, जिसे बॉलीवुड का सबसे रोमांटिक दौर माना जाता है। इस दशक में प्यार के साथ-साथ फिल्मों में रोमांस को भी जगह मिलने लगी और हर फिल्म का अंत खुशहाल होने लगा। उस दौर में आई ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ आज भी बेस्ट रोमांटिक फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म का रियल लाइफ कपल्स पर भी काफी गहरा असर पड़ा था और उन्होंने घरवालों के सामने अपने प्यार को स्वीकार करना शुरू कर दिया था। लेकिन ये ही वो दौर था जब ‘डर’ जैसी फिल्में भी आईं, जिसमें प्यार में दीवानापन भी दिखाया गया।

2000–2010 के दशक में दिखा मॉर्डर्न लव

2000 शुरू होते ही बॉलीवुड में एक और नया चलन शुरू हो गया। अब वो दौर था जब मॉर्डन लव दिखाया जाने लगा, इसमें रिश्तों में प्यार के अलावा करियर, आत्मनिर्भरता और असुरक्षा जैसे मुद्दे भी दिखाए जाने लगे। इसके उदाहरण में ‘लव आज कल’ जैसी फिल्में शामिल हो गईं। इस दौर में ब्रेकअप को भी उतनी ही गंभीरता से दिखाया गया जितना रोमांस को।

2010 के बाद फिल्मों में दिखी रियलिटी

2010 के बाद से बॉलीवुड में प्यार थोड़ा मुश्किल दिखाया जाने लगा। अब कहानियां परफेक्ट जोड़ों की नहीं, बल्कि अधूरे रिश्तों की दिखाई जाने लगीं। कई फिल्मों में प्यार ऐसा दिखाया गया, जिसमें प्यार में पड़ा एक पार्टनर खुद को समझने के चक्कर में रिश्ते को ही खराब कर देता है। इनमें ‘तमाशा’ फिल्म बड़ा उदाहरण है, जिसमें रणबीर सिंह और दीपिका पादुकोण खुद की पहचान छिपाकर मिलते हैं और प्यार में पड़ जाते हैं। मगर जब वो एक दूसरे की सच्चाई से वाखिफ होते हैं तो चीजें खराब होने लगती हैं। हालांकि इस फिल्म का अंत अच्छा है। इस दौर में दिखाया गया कि प्यार हमेशा सही नहीं होता, लेकिन सच्चा हो सकता है।

अब फिल्मों में दिख रहा जुनून

फिर आता है ये दौर जब ‘तेरे इश्क में’ जैसी फिल्में आ रही हैं। अब इसके बाद शाहिद कपूर की O’Romeo भी आने वाली है, जो बदले की भावना से प्रेरित एक प्रेम कहानी पर आधारित है। जिसमें एक गैंगस्टर एक महिला को उसके पति की हत्या के बाद दाऊद इब्राहिम को मारने की साजिश रचने में मदद करता है।