जल का कोई अपना रंग नहीं होता। उसे जिस पात्र में डाला जाए, वह उसी का रूप धर लेता है, लेकिन इंसानी सभ्यता का चरित्र यह रहा है कि उसने नदी को पात्र में कम, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के सांचे में ज्यादा ढाला है। नदी जब पहाड़ों की गोद में एक अल्हड़, निश्छल और बेपरवाह बच्चे की तरह किलकारियां मारती हुई नीचे की तरफ भागती थी, तब इंसानों ने श्रद्धावश उसकी लहरों को देखकर तालियां बजाईं और उसे ‘शानदार नदी’ का पावन खिताब दिया। वैदिक ऋचाओं के उस कालखंड को याद करें, तो ऋग्वेद के नदी सूक्त का वह मंत्र कानों में गूंज उठता है, जहां नदियों की स्तुति करते हुए उन्हें ‘अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति’ कहा गया था, यानी जो माताओं में सर्वश्रेष्ठ है, नदियों में उत्तम है और देवियों में प्रधान है।

समय बदला और जब नदी ने थोड़ा ठहरना, थोड़ा संभलना और थोड़ा गंभीर होना सीखा, तो मैदानी इलाकों में आकर इन्हीं इंसानों ने उसके ऊपर ‘गंभीर दरिया’ की नई तख्ती लटका दी। मुसाफिरों और शायरों ने उसकी लहरों के इस ठहराव को देखकर शेर-ओ-शायरी की महफिलें सजानी शुरू कर दीं। किसी ने इब्न-ए-इंशार की तरह गुनगुनाया कि ‘इस नदी पर कोई घाट नहीं, इस दरिया का कोई साहिल नहीं’, तो किसी ने उसकी गहराई को इंसानी इश्क की इंतिहा बता दिया। मगर यह नामों का खेल दरअसल नदी के वजूद का सम्मान नहीं, बल्कि इंसान की अपनी सहूलियत का एक तराशा हुआ बहाना भर है।

जब वह मीलों का सफर तय करके थककर चूर हो गई और आखिर समंदर की अनंत गोद में जाकर चुपचाप गुम हो गई, तो लोगों ने उसके ऊपर ‘विशाल समंदर’ का एक बड़ा-सा बोर्ड टांग दिया और उसे एक नई पहचान दे दी। जीवनदायिनी नदियों को सिर्फ निरंतर बहते रहना था।

सभ्यता में जिस पानी को हमारे प्राचीन पुराणों और शास्त्रों में साक्षात ‘जीवन’ का पर्यायवाची माना गया है, उसी के पवित्र गले में इंसानों ने अपनी चमचमाती फैक्टरियों की बदबूदार और काली नालियां बेझिझक डाल दीं। जिन नदियों को जीवन का स्रोत माना गया, उनकी पूजा की गई, आज वही जल रासायनिक कचरे की वजह से अपना जीवन-तत्त्व खो रही है। अब नदियों की लहरों का रंग न तो आसमान जैसा नीला रह गया है और न ही वादियों जैसा हरा, बल्कि वह एक अजीबोगरीब गाढ़े कत्थई रंग के जहर में तब्दील हो गई दिखती है।

आधुनिक शहर के संभ्रांत लोग रोजाना शाम को उसके इन प्रदूषित किनारों पर टहलने आते थे, अपने लाखों रुपए के कैमरों से उसकी लाचारी और बदहाली की खूबसूरत तस्वीरें खींचते थे, फिर सोशल मीडिया पर ‘प्रकृति का प्रेमी’ तथा ‘जल बचाओ’ का तमगा लगा कर वाहवाही लूटते थे। विडंबना यह कि वे उसी वक्त अपनी कारों में रखा प्लास्टिक का ढेर सारा कचरा और जहरीली बोतलें नदी में फेंक देते थे। वह नदी हर पल घुट रही थी, चीख रही थी, लेकिन उसकी करुण पुकार उनके लाउडस्पीकरों के शोर में घुट रही थी।

यहां तक कि रहीम का वह प्रसिद्ध दोहा भी अब एक मजाक लगने लगा था, जहां उन्होंने कहा था, ‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।’ इंसानों ने पानी रखने की चिंता तो छोड़ दी थी, अलबत्ता जो पानी बचा था, उसे भी पूरी तरह से बेजान और बेआबरू करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

जो नदियां कभी मीलों चौड़ी हुआ करती थीं, अब महज एक पतली बदबूदार लकीर बनकर रह गई हैं। ठीक वैसे ही, जैसे किसी मरणासन्न और बेहद बीमार बूढ़े इंसान के हाथों पर नीली और सूखी हुई नसें उभर आती हैं। पूरे शहर में पानी का एक भयंकर और हाहाकारी अकाल पड़ गया था। विरोधाभास यह था कि जो लोग कल तक उसमें फैक्टरियों की गंदगी से लेकर मल-मूत्र बहाते थे, आज वही लोग प्लास्टिक की बड़ी-बड़ी बाल्टियां और डिब्बे लेकर उसके सूखे हुए किनारों पर कतारें लगाकर खड़े दिखते हैं। उनके चेहरों पर कई बार प्यास से ज्यादा अपनी मौत का एक गहरा और खौफनाक मंजर साफ दिखता है।

इंसानी लालच ने नदियों के प्राकृतिक भूगोल को एक कृत्रिम इतिहास में तब्दील कर दिया है। वे तमाम भविष्यवाणियां और चेतावनियां आज सच साबित हो रही हैं, जहां प्रकृति के असंतुलन को विनाश का सूचक बताया गया था। जिस जल को ‘अमृत’ कहा गया, वह आज कंक्रीट की बलिवेदी पर अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। जब नदी के बहते हुए पानी का मूल्य केवल टर्बाइन और डालर के तराजू पर तौला जाने लगे, तो सभ्यता का मानसिक अकाल साफ दिखने लगता है।

यह कैसी प्रगति है, जहां विकास के बड़े-बड़े विज्ञापनों के पीछे एक जलस्रोत की मरणशील चीखें छिपी हुई हैं? यह जल का संकट नहीं है, बल्कि यह इंसानी संवेदनाओं के पूरी तरह से सूख जाने का वैश्विक प्रमाण है।

जब नदी का वजूद ही समाप्त हो जाता है, तो उसके साथ वे तमाम सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासतें भी मौन हो जाती हैं, जो सदियों से उसके किनारों पर फली-फूली थीं। इंसानों ने नदियों का प्राकृतिक स्वरूप तो बहुत पहले ही छीन लिया था, पर आज उसकी गरिमा को भी पूरी तरह से बेआबरू करने पर तुला है। अब नदियां जीवनदायिनी धारा नहीं, बल्कि सिर्फ एक सूखी हुई धूल का मरुस्थल हैं, जहां इंसानी सभ्यता की नावें तैरती नहीं, बल्कि अपने ही विनाशकारी लालच के साथ जिंदा दफन हो जाती हैं। उसकी इस मूक विदाई पर संपूर्ण प्रकृति स्तब्ध है, और इंसान अपनी इस आत्मघाती जीत पर तालियां बजाने में मग्न है।