समय की बूढ़ी हथेली से फिसलता हुआ सत्य आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां विजय-गाथा के कथानक युगबोध के छल में कैद हो चुके हैं। रसातल में दबे हुए यथार्थ और रश्मियों के स्वप्निल गीतों के बीच एक गहरा सन्नाटा पसरा है, जो मौन की ठंडी नदी की तरह समाज की रग-रग में बह रहा है। जब वर्जनाएं शिशिर की तरह इतिहास को थाम लेती हैं, तब केवल प्रकृति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की चेतना भी जम जाती है। थरथराती हुई टहनियों पर लदी हिम की सुगंध दरअसल उस ठिठुरते हुए जनमानस की तरह है, जिसका इतिहास बर्फ के नीचे सहमकर और दबकर चेतना से शून्य हुआ जाता है।
शोर को गीत में बदलने की छटपटाहट और उमस से भरे दम घोंटते दिनों के बीच लयों का नवनीत खोजना ही वह संघर्ष है, जो मानवीय संबंधों को फिर से परिभाषित करता है। संबंधों की ऊष्मा जब नेह भीगी रागिनी में तब्दील होती है, तभी समाज का कसैलापन स्निग्धता से आच्छादित प्रीत में बदल पाता है। मगर आज के परिवेश में मानवीय संबंधों की स्थिति उस पंख टूटी सांझ की तरह हो चली है, जो वन में भटककर खो गई है।
समय की हथकड़ी पहने हुए लोग जब निर्वासन पर निकलते हैं, तो परिचय की चूड़ियां पहले ही टूटकर बिखर जाती हैं। स्मृतियों की परत पर जमी हुई दूरियां जब तक सांसों में उभरती हैं, तब तक संवाद के विहग अनजान नभ में उड़ जाते हैं।
ऐसे में सामाजिक न्याय का प्रश्न तब और गहरा हो जाता है, जब कथा जन-अभिषेक की हर बार अधूरी रह जाती है। संकल्प की छिदती हुई त्वचा और गरलदंतों के प्रहार से सत्ता और व्यवस्था के नागपाशों में केवल कल्पनाएं ही नहीं, बल्कि मनुष्य का आत्मसम्मान भी जकड़ कर चेतनाहीन हुआ है। सिसकते हुए सीवानों पर गांव दर गांव का जो दर्द पसरा है, वह इसी सामाजिक विषमता की उपज है, जहां रश्मियों के गीत स्वप्निल राख की ढेरी बनकर रह गए हैं।
क्षितिज पर दो रश्मि की ऋचाएं टांकने की कोशिशें उन धुंधली दिशाओं में रास्ता खोज रही हैं, जहां काजल नहीं बुहरा है और अंधेरों की दीवारें बहुत ऊंची हो गई हैं।
देहरी का पथरा जाना और रोशनी की बाट जोहते-जोहते आंखों का कुहरा जाना उस लंबी प्रतीक्षा का प्रमाण है, जो एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए की जा रही है। सलीबों पर टंगे फूलों और भीड़ के पहियों तले कुचले हुए पंखों का कुहरा स्पष्ट करता है कि व्यवस्था की चक्की में कोमल न्याय की मानवीय संवेदनाएं पिस कर रह गई हैं।
पांव और पंख के बावजूद मंजिल का न दिखना उस संवेदनहीन शून्यता को दर्शाता है, जहां आधुनिक मनुष्य अपने ही बनाए तंत्र में लगभग पराया हो गया है। यहां युग-यती का सो जाना और नेकी-नदी को भूल जाना उस नैतिक पतन का परनाला है, जो हमारे समाज के लिए आत्मघाती बनता जा रहा है।
ऐसे में मानवीय संबंधों के सृजन की प्यास ही वह एकमात्र तत्त्व है, जो इस बिखराव को जोड़ सकती है। जो गीत कल मेज पर अधलिखा छोड़ दिया गया था, उसमें नया छंद जोड़ना दरअसल टूटे हुए मानवीय संबंधों को फिर से युवा करने की प्रक्रिया है। अगर इसी को पहचान लिया जाए, इसी को थोड़ा बचा लिया जाए, तो उम्मीद की रोशनी एक बार फिर जिंदगी का जरिया बन सकती है।
चांदनी की गंध से आकाश को भरने का स्वप्न तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब न्याय के सहारे खड़ा होकर मौन वाचाल हो जाए। कुमुदिनी-सा खिला हुआ देह का छवि-ताल और चुप्पियों के पास सजे संबोधन ही वे सेतु हैं, जो व्यक्ति को समाज से जोड़ते हैं।
जब शब्द खो जाते हैं और अनसुनी, अनकही कहानी शेष रह जाती है, तब कल्पना-सी रातरानी की तरह स्मृतियां ही पास आकर सटती हैं।
सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब धधकते विद्रोह के स्वर बर्फ के नीचे से निकलकर मुखर हों और सरिता की तरंगों पर रागिनी का कुमकुम फिर से रचा जाएगा। विकास की अंधी दौड़ में जो पांव थक चुके हैं और जो पंख नागपाशों में जकड़े हुए हैं, वहां भूखे को न्याय के निवाले चाहिए।
आधुनिकता के नाम पर जो संबंध कल मेज पर अधलिखे छोड़ दिए गए थे, आज वे अपनी पहचान के लिए छटपटा रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन संबंधों से दूरी या उनका अभाव हमें अक्सर परेशान करता है, हम उसे फिर से हासिल करना चाहते हैं, लेकिन आधुनिक जीवन की नई परिभाषाएं हमें अपने खोखले दायरे पर ही गर्व करना सिखा चुकी होती हैं।
ज्योतिपंख गीत जब तक मौन रहेंगे, तब तक दिशाएं धूमिल ही रहेंगी। मानवीय संवेदनाओं का घायल पोर आज यह सवाल पूछता है कि क्या सृजना की यह थरथराहट केवल दर्द तक सीमित रहेगी या फिर यह किसी नए वसंत की आहट बनेगी।
मौन की ठंडी नदी और धूप से दहके हुए दिन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक ओर जहां पंख टूटी सांझ वन में भटककर खो जाते हैं, दूसरी ओर क्रांतिवाही स्वर बर्फ के नीचे दबकर भी अपनी गर्मी नहीं खोते।
यह पूरा परिवेश उस सृजनात्मक संघर्ष का है, जहां स्मृतियों के गलियारे में पारे की तरह फिसलता सत्य अपनी पहचान ढूंढ़ रहा है। ऐसे में संकल्प ही जीवन की सार्थकता है कि किस प्रकार भीतरी स्निग्धता से बाहरी कोलाहल को शांत किया जाए और किस प्रकार अधूरी कथाओं को संकल्प की पूर्णता तक पहुंचाया जाए।
