उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में लगी आग पर वायुसेना ने काबू न पाया होता, तो यह बड़े संकट का सबब बन गई होती। हिमाचल के सोलन जिले के कसौली क्षेत्र में लगी आग सैन्य ठिकानों और आवासीय इलाकों तक पहुंच गई थी।
वन अमला आग बुझाने का कोई सार्थक उपाय कर नहीं पाया, तब भारतीय वायुसेना को राहत अभियान में उतरना पड़ा। उत्तरकाशी में जंगल की आग गंगोत्री राजमार्ग पर पहुंच गई थी, जहां गेस्ट हाउस में ठहरे 70 यात्रियों को बड़ी मुश्किल से बचाया गया। जम्मू-कश्मीर के उधमपुर और रामबन जिलों में कई दिनों तक पहाड़ धधकते रहे।
गर्मी का मौसम शुरू होते ही पहाड़ी वनों में आग लगने की घटनाएं प्रतिवर्ष सुर्खियां बनने लगती हैं, लेकिन किसी भी राज्य ने आग रोकने का स्थायी प्रबंध करने की जरूरत आज तक नहीं समझी है। इन घटनाओं से हजारों हेक्टेयर जंगल सुलगकर राख में बदल जाते हैं। हिमाचल के अकेले कसौली वन क्षेत्र में दस हेक्टेयर जंगल राख हो गया। उत्तराखंड के वनों में आग लगने की 388 से ज्यादा घटनाएं दर्ज होने के साथ तीन लोगों की मृत्यु हो गई। कोई 340 हेक्टेयर वन भूमि धधकती रही। चमोली के आदिबद्री और कालसी में ग्रामों तक आग पहुंच गई। पौड़ी में आग लगाने के आरोप में दो लोगों को हिरासत में लिया गया। जम्मू-कश्मीर के रामबन, चंदरकोट और उधमपुर में भी कई वन क्षेत्रों के धधकने की खबर आई। इन पहाड़ी क्षेत्रों में आग पर काबू पाना इसलिए मुश्किल होता है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में राहत आसानी से पहुंच नहीं पाती। यहां आग बुझाने का काम वन विभाग और स्थानीय लोगों की मदद से ही संभव हो पाता है।
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चीड़ के जंगल और लैंटाना की झाड़ियां इस आग को फैलाने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। दरअसल, चीड़ के पत्तों में एक विशेष किस्म का ज्वलनशील पदार्थ होता है। ये पत्तियां पतझड़ के मौसम में आग में घी का काम करती हैं। गर्मियों में पत्तियां जब सूख जाती हैं, तो इनकी ज्वलनशीलता और बढ़ जाती है। इसी तरह, लैंटाना जैसी विषाक्त झाड़ियां आग को भड़काने का काम करती हैं। करीब 40 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र में ये झाड़ियां फैली हुई हैं। इन पत्तियों में भयावह आग लग जाती है। इससे वर्षा कम होती है। तापमान बढ़ जाता है। इन वजहों से यहां पतझड़ की मात्रा बढ़ी, उसी अनुपात में मिट्टी की नमी घटती चली गई। ये ऐसे प्राकृतिक संकेत थे, जिन्हें वन अधिकारियों को समझने की जरूरत थी।
वैसे चीड़ और लैंटाना भारतीय मूल के पेड़ नहीं हैं। अंग्रेजों ने जब पहाड़ों पर आशियाने बनाए, तब उन्हें बर्फ से आच्छादित पहाड़ियां अच्छी नहीं लगीं। वे ब्रिटेन के बर्फीले क्षेत्र में उगने वाली चीड़ की प्रजाति के पौधे भारत ले आए और बर्फीली पहाड़ियों के बीच खाली पड़ी भूमि में रोप दिए। इन पेड़ों को जंगली जीव और मवेशी नहीं खाते हैं। इसलिए अनुकूल प्राकृतिक वातावरण पाकर ये तेजी से फलने-फूलने लगे। इसी तरह, लैंटाना को भारत की दलदली और बंजर भूमि में पौधारोपण के लिए लाया गया था।
यह विषैला पौधा भारत के किसी काम तो नहीं आया, लेकिन इसने लाखों हेक्टेयर भूमि में फैलकर उपजाऊ जमीन जरूर लील ली। ये दोनों प्रजातियां ऐसी हैं, जो अपनी छाया में किसी अन्य पेड़-पौधे को पनपने नहीं देती हैं। चीड़ की एक खासियत यह भी है कि जब इसमें आग लगती है, तो इसकी पत्तियां ही नष्ट होती हैं। तने और डालियों को ज्यादा नुकसान नहीं होता। पानी बरसने पर ये फिर से हरे-भरे हो जाते हैं। लगभग यही स्थिति लैंटाना की भी है।
चीड़ और लैंटाना को उत्तराखंड से निर्मूल करने के लिए कई बार सामाजिक संगठन आंदोलन कर चुके हैं, लेकिन सार्थक नतीजे नहीं निकले। अलबत्ता, इनके पत्तों से लगने वाली आग से बचने के लिए चमोली जिले के एक गांव के लोगों ने चीड़ के पेड़ों की जगह हिमालयी मूल के पेड़ लगाने शुरू कर दिए। जब ये पेड़ बड़े हो गए, तो इस गांव में 20 साल से आग नहीं लगी। इसके बाद कई ग्रामवासियों ने इस देसी तरीके को अपना लिया। इन पेड़ों में पीपल, देवदार और अखरोट के वृक्ष लगाए गए हैं। यदि वन अमला ग्रामीणों के साथ मिलकर ऐसे उपाय करता, तो आज उत्तराखंड के जंगलों की यह दुर्दशा नहीं होती।
जंगल में आग लगने के कई कारण होते हैं। जब पहाड़ियां तपिश के चलते शुष्क हो जाती हैं और चट्टानें भी खिसकने लगती हैं, तो प्रायः घर्षण से आग लग जाती है। तेज हवाएं चलने पर जब बांस परस्पर टकराते हैं, तो इससे पैदा होने वाले घर्षण से भी आग लग जाती है। बिजली गिरना भी आग लगने के कारणों में शामिल है। ये कारण प्राकृतिक हैं और इन पर विराम लगाना असंभव है। मगर मानव-जनित जिन कारणों से आग लगती है, वे अधिक खतरनाक हैं। इसमें वन-संपदा के दोहन से अकूत मुनाफा कमाने की होड़ भी शामिल है। भू-माफिया, लकड़ी माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों का गठजोड़ इस कारोबार को फलने-फूलने में सहायक बना हुआ है। राज्य सरकारों ने विकास का पैमाना भी आर्थिक उपलब्धि को माना है, इसलिए सरकारें पर्यावरणीय क्षति को नजरअंदाज करती हैं।
आग लगने की अन्य वजहों में बीड़ी-सिगरेट भी हैं, तो कभी शरारती तत्व भी आग लगा देते हैं। कभी ग्रामीण अपने पशुओं के चारे के लिए सूखी और कड़ी पड़ चुकी घास में आग लगा देते हैं। ऐसा करने से धरती में जहां-जहां नमी होती है, वहां-वहां घास की नई कोंपलें फूटने लगती हैं, जो मवेशियों के लिए पौष्टिक आहार का काम करती हैं। पर्यटन वाहनों के साइलेंसर से निकली चिंगारी भी आग की वजह बनती है।
आग से बचने के कारगर उपायों में पतझड़ के दिनों में टूटकर गिर जाने वाले पत्तों का प्रबंधन महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही पत्ते आग लगने की बड़ी वजह बनते हैं। केंद्रीय हिमालय में 2.1 से लेकर 3.8 टन प्रति हेक्टेयर पतझड़ होता है। इसमें 82 प्रतिशत सूखी पत्तियां और बाकी टहनियां होती हैं। जंगलों पर वन विभाग का अधिकार होने से पहले अपने अनुभव के आधार पर ग्रामीण इस पतझड़ से जैविक खाद बना लिया करते थे। इन पत्तों को मवेशियों के बिछौने के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था। किंतु वन कानूनों के वजूद में आने से वनोपज पर स्थानीय लोगों का अधिकार खत्म हो गया।
इस सबके बावजूद जंगल में लगी आग को बुझाने के तरीके परंपरागत हैं। वन अमला हरी टहनियों की झाड़ू बनाता है और उसकी फटकार से आग बुझाने का काम करता है। इस तरीके से दावानल को नहीं बुझाया जा सकता। वनों में आग लगने का एक बड़ा कारण आरक्षित वनों, अभयारण्यों और उद्यानों से ग्रामवासियों का विस्थापन किया जाना भी है। ये जब तक जंगल के वासी रहे, तब आग बहुत कम लगती थी, क्योंकि ये लोग आग लगते ही उसे बुझा दिया करते थे।
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अमेरिका अब तक की सबसे भीषण आग से झुलस रहा है। इसके प्रांत कैलिफोर्निया के बड़े इलाके में जंगल धधक उठे हैं। दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। हजारों घर राख हो गए हैं। बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हो चुके हैं। हजारों एकड़ क्षेत्र बर्बाद हो गया है। यह आग असाधारण इसलिए भी कही गई। क्योंकि आम तौर पर जनवरी में वहां जंगल की आग का कोई मौसम नहीं होता। दावा किया गया कि जलवायु परिवर्तन, ऊंचे तापमान, शुष्क मौसम और सूखे ने अचानक ऐसे हालात पैदा कर दिए कि भड़की चिंगारियों ने तेज हवाओं के संग खौफनाक रूप धर लिया और बड़े इलाके को इस तरह तबाह कर दिया, मानो वहां कोई बड़ा बम गिरा दिया गया हो। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
