आजकल भारतीय ज्ञान परंपरा की खूब चर्चा हो रही है। इस पर गोष्ठियों, भाषणों एवं लेखों की विपुलता देखी जा सकती है। हालांकि इस परंपरा की चर्चा और उसको पुनर्जीवित करने की पहल स्वतंत्रता के बाद ही हो जानी चाहिए थी, पर हुआ नहीं। ऐसा नहीं होने का कारण था बौद्धिक और राजनीतिक, दोनों ही सत्ता पर यूरोप की संस्कृति, विचार और जीवन दर्शन से प्रभावित लोगों का दबदबा। इसलिए उनके ज्ञान के हम व्याख्याकार मात्र बने रहे और उसे अपने संदर्भों में ढालने के प्रयास को ही हम अपनी मौलिकता मानते रहे। हमारी कल्पनाओं में यूरोप बैठा दिया गया। भारतीय ज्ञान परंपरा का पहला कदम कल्पनाओं से यूरोप के जीवन दर्शन और मूल्यों को निकालना है। इसलिए इन गोष्ठियों और विमर्शों की निश्चित भूमिका है।

मगर इस वैचारिक पहल से भारत के मार्क्सवादी पूरी तरह से अलग हैं। जिस किसी ने भी प्राचीन भारत को सम्मानित स्थान देने का प्रयास किया, वे उनके कोपभाजक बने। उदाहरणार्थ हिंदी के विद्वान रामविलास शर्मा ने जब भारतीय संस्कृति को केंद्रीय स्थान दिया, तब उन्हें अवांछित घोषित कर दिया गया था।

वर्ष 2014 में नई शिक्षा पद्धति ने भारतीय ज्ञान परंपरा को लोक विमर्श का विषय बना दिया। ऐसा प्रोत्साहन आधुनिक भारत के इतिहास में इसे और इसकी पैरोकारी करने वालों को कभी भी नहीं मिला था। पर भारत की ज्ञान परंपरा का महत्त्व मार्क्सवाद या नेहरूवाद की जय-पराजय में नहीं देखा जाना चाहिए। इस परंपरा की एक विशिष्टता प्रतिकूल विचारों के साथ तर्क करना है। यही शास्त्रार्थ के नाम से प्रचलित और प्रसिद्ध हुआ करता था। इसलिए इसके लिए भावना से कहीं अधिक विवेकवाद का होना जरूरी होता है, लेकिन विवेकवाद को खतरा वैचारिक अवसरवादियों से होता है। बौद्धिक सत्ता पर जिसका भी नियंत्रण होता है, अवसरवादियों का झुंड उधर ही मुंह कर लेता है। वे विचारों की ताली बजाते हैं। जब वामपंथ मजबूत था, तब बौद्धिक भीड़ वहां सबसे अधिक थी। इसलिए यह भीड़ किसी वैचारिक सत्ता का सारथी नहीं हो सकती। इसी भीड़ से भारत की ज्ञान परंपरा को भी बचना है।

भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का मतलब सृजनशीलता और लेखनी तथा अभिव्यक्ति में मौलिकता पैदा करना है। इसी में स्थापित विचारों, परंपराओं और सोच को झकझोर देने की क्षमता होती है। जो बौद्धिक काम पिछली शताब्दियों में हुआ, उसकी छाया तक अभी नहीं है। इसके लिए तप, साधना और गैर भौतिकतावादी बने रहने की जरूरत है। इसे समझने के लिए बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है।

जयचंद्र विद्यालंकार ने ‘भारतीय इतिहास की मीमांसा’ दस वर्षों में लिखी। यह काम उन्होंने आजादी से पूर्व शुरू किया और 1954 में समाप्त किया। इस बीच वे स्वतंत्रता आंदोलन में तीन वर्षों तक जेल में भी रहे। उन्होंने लिखा कि उन्होंने खानाबदोश की जिंदगी व्यतीत करते हुए इस पुस्तक को तैयार किया। ऐसे वे अकेले नहीं हैं। खुद बिपिन चंद्र पाल, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद पर ‘द सोल आफ इंडिया’ लिखा, निर्धनता में जीते रहे। उनकी मृत्यु के बाद ‘द स्टेट्समैन’ ने 17 मई 1932 को इस बात का खुलासा किया कि ‘भारत के इस योग्यतम कलम के पास इस अखबार में स्तंभ लेखन से मिलने वाले मानदेय के अतिरिक्त रोजी-रोटी का कोई और साधन नहीं था।’

ज्ञान परंपरा व्यवहार होता है, न कि सिद्धांत। आठवीं शताब्दी में बौद्ध विद्वान शांतिदेव ने बोधिसत्व पर पुस्तक लिखी थी। उसके प्राक्कथन में जो कहा था, वही एक तरह से भारत की ज्ञान परंपरा का चरित्र माना जा सकता है। ‘मैं कुछ भी नया नहीं कह रहा हूं, इसलिए मैं कल्पना करता हूं कि इसमें आपके (पाठकों) लाभ के लिए कुछ भी नहीं है। इसे मैंने स्वयं के मस्तिष्क को समृद्ध करने के लिए लिखा है।’ उनकी पुस्तक का सत्ताईस भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उसकी प्रासंगिकता चिंतनशील लोगों के लिए सर्वत्र बनी हुई है।

सत्रहवीं शताब्दी में यशोविजय ने ‘ज्ञान का सार’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें बौद्धिक होने के लिए बत्तीस गुणों को उन्होंने गिनाया है, पर आज किसी भी विमर्श में यशोविजय और उनके जैसे मौलिक विद्वान न तो उद्धृृत होते हैं, न ही वे बौद्धिकों के स्वाध्याय की सूची में हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा की जड़ें महानगरीय नहीं हैं। बंगाल के नवदीप (नादिया) या बिहार के साहेबपसारी गांव से क्रमश: ‘नव न्याय’ और ‘न्याय दर्शन’ शुरू हुआ था। वहां न तो विश्वविद्यालय के चमकते बहुमंजिले भवन थे, न ही सरकारी अनुदान। पर यह सब अब इतिहास बन चुका है। उसी इतिहास को समकालीन संदर्भों में लाने के लिए रवींद्रनाथ ठाकुर ने विश्वभारती, महात्मा गांधी ने गुजरात विद्यापीठ और बिहार में श्रीकृष्ण सिंह ने नेतरहाट विद्यालय की स्थापना की थी। इनके पुनर्जीवित होने का एकमात्र लक्षण स्वाध्याय और चिंतन में स्वावलंबन है। पर आज पुस्तकालयों की खाली कुर्सियों और विमर्श में सतहीपन तथा नारेबाजों की बढ़ती तादाद उत्साह बढ़ाने वाली नहीं है।

संकीर्णताओं की प्रतिद्वंद्विता से बौद्धिक वातावरण में ह्रास होता है। कोई भी सभ्यता सड़क पर बौद्धिक झगड़ों और बौद्धिक नारेबाजी से न पुनर्जीवित होती है, न ही समृद्ध। भारतीय सभ्यता की समृद्धि के लिए यशोविजय, बिपिनचंद्र पाल, राधाकृष्णन जैसों के नए डाक-पते की जरूरत है। क्या हम उस प्रवृत्ति परंपरा और पथ को प्रेरित करने में सक्षम हैं या विश्वविद्यालय परिसर सिर्फ गोष्ठियों का गट्ठर परोसते रहेंगे? भारत को भारत के रूप में खड़ा कर देने के संकल्प की पूर्ति ही भारतीय ज्ञान की परंपरा बन जाएगी।