विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों की आस्था के बीच भारत की छवि विविधतापूर्ण देश की है। यही इसकी खूबसूरती है। इसे आस्था से परिपूर्ण धर्मपरायण देश भी माना जाता है। यहां करोड़ों लोग अपने-अपने धर्म का समर्पित भाव से पालन करते हैं। इससे उन्हें जीवन में नैतिकता से लेकर मर्यादा तक की सीख मिलती है। वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए संतुष्ट भाव से जीवन जीते हैं। यह धर्मपरायणता ही है कि जहां बड़ी संख्या में लोग अमरनाथ की दुरूह यात्रा करते हैं और तमाम कष्ट सह कर तथा खतरे का सामने करते हुए भी अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।
इसी तरह लाखों लोग कुंभ स्नान के लिए एक स्थान पर जुट जाते हैं। यानी हमारी धार्मिक मान्यताएं इतनी गहरी हैं कि एक विश्वास के सहारे हम पूरा जीवन गुजार देते हैं। मोक्ष और मुक्ति की उम्मीद लिए चलते रहते हैं। हम अपने देश में आस्था के विभिन्न रूप देखते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मगर देश को धर्म और धार्मिकता के अंतर को भी समझना होगा। मनुष्य के लिए धर्म महत्त्वपूर्ण है। मगर जिस तरह से पिछले कई वर्षों में धार्मिकता का दोहन किया गया और आस्था को ठेस पहुंचाई गई, यह चिंता का विषय है।
सामूहिक रूप से धर्म के प्रति समर्पित होना कोई गलत नहीं। इसी से हमने अपना सांस्कृतिक इतिहास रचा है और मन की शांति के लिए अपने धर्मस्थलों का निर्माण किया है। इनमें श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या भी है। कारसेवकों के बलिदान और त्याग के बाद मंदिर का निर्माण हुआ। जब इसका उद्घाटन हुआ था, तो देश-विदेश में लाखों लोग पूजा-अर्चना कर रहे थे और अपना जन्म सफल कर रहे थे, लेकिन इस सामूहिक धार्मिकता में आडंबर आ गया। फिर इसी के साथ शुरू हो गया आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला। देखते ही देखते वोटों की राजनीति भी शुरू हो गई।
पिछले दिनों देशवासियों को व्यथित करने वाली जानकारी सामने आई। पता चला कि श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में चढ़ाई गई राशि में भारी गोलमाल हुआ है। सवाल है कि मंदिर में न्यास होने और पूरी व्यवस्था के बावजूद दान तथा चढ़ावे की चोरी कैसे और क्यों हुई? ताज्जुब है कि लाखों-करोड़ों रुपए इधर से उधर होते रहे और इसकी भनक तक नहीं लगी। जिम्मेदार लोग आंखें मूंदे रहे। इन जिम्मेदार लोगों में न्यास के कर्ताधर्ता-सदस्य, नोट गिनने वाले लोग और गिनवाने वाले बैंक तथा उन पर नजर रखने वाले सीसीटीवी कैमरे के संचालक सब शामिल थे। सवाल यह है कि इन सबके रहते अमानत में खयानत कैसे होती रही। शुरू में तो विश्वास ही नहीं हुआ कि चढ़ावे की राशि भी गायब की जा सकती है। विवाद गहराया और लोगों का आक्रोश बढ़ा, तो सरकार हरकत में आई और एसआइटी गठित कर दी। इसने जो पहली रिपोर्ट दी, उसमें चिंता की बात यही थी कि चोरी हुई है। चढ़ावे को गिनने के स्थान पर लगाए गए सीसीटीवी कैमरे से पता चल रहा था कि मंदिर में चोरी हुई। जिन आरोपियों को संदेह के घेरे में लिया गया, उनकी और परिवारजनों की संपत्ति में बढ़ोतरी देखी गई।
यह बेहद निराशाजनक है कि निगरानी तंत्र में गंभीर खामियां पाई गर्इं। हर स्तर पर कोताही दिखी। जब इस पर भारी वाद-विवाद होने लगा, तो राजनीतिक खांचों में बंटे लोग आमने-सामने आ गए। इस मुद्दे पर अजीब तस्वीर सामने आने लगी। मंदिर संचालकों में भी कई लोग बंटे नजर आए। जब न्यास की बैठक हुई तो कोषाध्यक्ष ही मुखर दिखाई दिए। वैसे तो कोषाध्यक्ष का दायित्व बड़ा होता है, लेकिन यहां पता चला कि वे तो रुपए और चढ़ावा गिनने के बाद जो रिपोर्ट आती थी, उसी का ही हिसाब-किताब रखते थे।
गौरतलब है कि कुछ लोगों को जिम्मेदार ठहराए जाने के बाद जिस तरह की राजनीति होने लगी, उससे लोगों की आस्था डगमगा गई। इस प्रकरण के बाद बद्रीनाथ मंदिर में भी अनियमितता की खबरें आने लगीं। इस मामले में जांच हुई, तो समिति के अध्यक्ष के निजी सहायक को निलंबित कर दिया गया और बाद में उसकी गिरफ्तारी भी हुई। यह मामला तब सुर्खियों में आया, जब सोशल मीडिया पर मंदिर में चढ़ावे की गिनती के दौरान कथित गड़बड़ी के वीडियो और आरोप सामने आए। एक संगठन ने शिकायत दर्ज कर निष्पक्ष जांच और प्राथमिकी की मांग की थी। शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए उत्तराखंड सरकार ने पिछले सप्ताह तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई। राम मंदिर के बाद बद्रीनाथ धाम और फिर दूसरे मंदिरों में वित्तीय अनियमितताओं की जिस तरह की खबरें आ रही हैं, इससे लगता है कि धर्म की आड़ में आस्था से विश्वासघात किया जा रहा है। इस तरह धर्म के नाम पर आडंबर और राजनीति में देश उलझ गया है।
राजनीतिक और सामाजिक बहसों में यह तर्क भी दिया जाता है कि जिन्होंने मंदिर बनाने में कोई त्याग नहीं किया, उनको इस मामले में नहीं बोलना चाहिए। फिर एक और मत भी जनता के सामने रखा जाता है कि जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी आयु लगा कर मंदिर को संभव बनाया वह ऐसा नहीं हो सकता। अगर उनके सहयोगी दान और चढ़ावे में घपला करते पकड़े जाएं, तो इसमें उनका क्या दोष? जिस व्यक्ति पर ठीकरा फोड़ा गया, वह न्यास के महासचिव का चालक था। विचित्र बात है कि बड़े लोगों पर दोषपूर्ण प्रबंधन और लापरवाही के आरोप लगते हैं, लेकिन पकड़े जाते हैं साधारण लोग। सीसीटीवी फुटेज में साधारण कर्मचारी ही दिखाई देते हैं। आज इस पूरे परिदृश्य को देख कर आम आदमी स्तब्ध है। वह सोच रहा है कि यह कैसा माहौल है, जहां धर्म-कर्म से जुड़े लोग ही अधर्म करते रहे और उनकी आस्था को ठेस पहुंचाते रहे। काजल की कोठरी से प्रमुख चेहरों को बेदाग निकालने की कोशिश भी लोगों को बेचैन करती रही। होना तो यह चाहिए कि जो दोषी हैं उनको कठघरे में लाया जाए। केवल छोटी मछलियां पकड़ कर ही नहीं बैठ जाना चाहिए, हो सकता है कि बड़े मगरमच्छ अब भी कहीं छिपे हुए हों। उन्हें पकड़ना आवश्यक है, क्योंकि अगर उनको पकड़ा नहीं गया, तो आरोपों और कुप्रबंधन का यह सिलसिला चलता रहेगा। भविष्य में भी चढ़ावे सुरक्षित नहीं रहेंगे।
असल में आज धार्मिक स्थलों की व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने की जरूरत है। इन स्थानों पर पर जो करोड़ों का चढ़ावा चढ़ता है, उसे तहखानों में बंद करके रखने के बजाय उसके वित्तीय प्रबंधन की पुख्ता व्यवस्था हो। धार्मिक स्थल तो आत्मशुद्धि और आत्म परिष्कार का स्थान है। वहां लोगों ने अपने गाढ़े पसीने की जो कमाई चढ़ावे में दी है, उसका इस्तेमाल वंचित वर्ग की बेहतरी के लिए होना चाहिए। इससे शिक्षा संस्थान खोले जाएं। दान राशि से अस्पताल और वृद्धाश्रम भी खोले जा सकते हैं। ये सुझाव किसी को क्रांतिकारी लगते हैं, तो इसे दरकिनार कर सवालों का सामना तो किया जाए। अब यह जरूरी है कि वे सब चोर दरवाजे बंद कर दिए जाएं जिनमें से आरोपी अपने लिए रास्ता बना लेते हैं।
