कभी-कभी लगता है कि यह समय पारिवारिक संबंधों के मोहभंग या पतन का है। देश के कोने-कोने से दिल दहला देने वाली खबरें आती रहती हैं। उदाहरण के तौर पर पत्नी ने प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या कर दी। घटना की हकीकत क्या थी और उससे जुड़े सिरे कहां तक जा रहे थे, उस पर विचार करने के बजाय लोगों ने ‘नीला ड्रम’ को एक मुहावरा बना दिया। एक अपवाद घटना कैसे सामान्य बना कर पेश कर दी जाती है, यह इसका उदाहरण है। इसी तरह, बेटे द्वारा पिता की हत्या और पत्नी के कहने पर बेटे की ओर से वृद्ध माता-पिता को घर से निकाल देने जैसे मामले भी अक्सर सामने आते रहते हैं।

ऐसा लगता है कि नई पीढ़ी के युवाओं में परिवार नाम की संस्था के प्रति कोई रागात्मक रिश्ता बचा ही नहीं। जैसे ही बच्चे कुछ समझने लायक हो जाते हैं, वे इस बात को भूल जाते हैं कि आज अगर वे इस लायक बन सके हैं, तो उसके पीछे उनके माता-पिता का ही योगदान है। युवा अपने हिसाब से जीवन जीने की कोशिश करते हैं और माता-पिता की उपेक्षा करते रहते हैं।

माता-पिता अगर बच्चों की बेहतरी के लिए कुछ अंकुश लगाते हैं, तो वे नाराज हो जाते हैं। हिंसा का सहारा भी लेने लगते हैं। स्मार्टफोन से वंचित करने के कारण कई बच्चे और बच्चियों के आत्महत्या कर लेने या फिर अपने परिवार के ही किसी सदस्य की हत्या करने तक की खबरें आती रहती हैं। वहीं संपत्ति को लेकर एक भाई ने दूसरे भाई को मौत के घाट उतार दिया। ऐसे तमाम मामले निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। इन्हीं सबको देखकर लगता है कि हमारा वह पारिवारिक सौहार्द कहां खो गया, जिसे हम आज याद करके पश्चाताप करते हैं कि क्यों धीरे-धीरे हम संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़ते चले गए।

कभी लोग बड़े प्रेम से साथ रहा करते थे। एक छोटा बच्चा दादा-दादी या चाचा-चाची की गोद में खेलते हुए बड़ा हो जाता था। घर के सुख-दुख में सबकी सहभागिता हुआ करती थी, लेकिन अब तो घर के बीच दीवार खड़ी हो जाती है। दो भाई अपनी-अपनी दुनिया में चले जाते हैं, एकदम अनजान बनकर। रक्त के रिश्ते रक्त बहाने पर आमादा हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि निर्मम दौर है यह।

ऐसा नहीं कि यह सब किसी गांव-कस्बे में ही घटित हो रहा हो। यह बड़े-बड़े महानगरों में भी देखा जा रहा है। संवेदना का ऐसा क्षरण हर कहीं आम होता जा रहा है। महानगर में अप-संस्कृति से ग्रस्त युवा पीढ़ी की अपनी दिशाहीनता है। वह हर गलत कार्य को अपना अधिकार समझकर घर से, समाज से बगावत कर रही है। चाहे सिगरेट, गांजा, हेरोइन या शराब पीने का मामला हो, या उन्मुक्त जीवन जीने की उत्कट इच्छा, इन सबको लेकर उसके अपने तर्क हैं कि यह तो उनकी अपनी आजादी का हिस्सा है।

युवा भूल जाते हैं कि इस तरह का जीवन आखिरकार नैतिक पतन की ओर ही ले जाता है। वे इस बात को समझ नहीं पाते और अंकुश लगाने पर हिंसा तक का सहारा लेने लगते हैं। कहीं शारीरिक हिंसा, तो कहीं मानसिक हिंसा।

हाल की अनेक घटनाएं इस बात का सबूत हैं कि नई पीढ़ी को अपने माता-पिता सबसे बड़े शत्रु नजर आते हैं या अपने शुभचिंतक सगे-संबंधी। हालांकि कई बार सगे-संबंधी भी ईर्ष्यावश भड़काने का काम करते हैं, लेकिन यह मामला अलग है। संबंधों में आ रही कटुता गहन विमर्श का विषय होना चाहिए।

यह आत्ममंथन की बेला भी है कि ‘हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी’। भारतीय समाज को विश्व में बेहद सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। वहीं समाज अब अगर तथाकथित आधुनिकता से ग्रस्त होकर आत्ममुग्धता का शिकार हो जाए या आत्मकेंद्रित, तो वे शाश्वत मूल्य कैसे बचे रह सकते हैं, जिसके कारण भारतीय परिवारों की प्रतिष्ठा वर्षों से कायम रही है।

सहजता-सरलता, पारिवारिकता, भाईचारा, त्याग, सहिष्णुता आदि अनेक मानवीय गुणों के कारण ही ‘वसुधैव कुटुंबकम’ जैसे मंत्र हमारे जीवन का अमिट हिस्सा बने और पूरे विश्व में भारत के प्रति आकर्षण बढ़ा। मगर हमारे ये अनमोल आत्मीय शब्द धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए हैं। लोग अपने अलावा किसी और को देखना नहीं चाहते। ‘मैं-वाद’ का दौर है। दंपति और बच्चों तक सीमित रहने की धारणा से बाहर निकलने का चलन खत्म हो रहा है।

अब तो ‘हम दो, हमारा कोई नहीं’ का चलन बढ़ रहा है। पता नहीं वह महान उदात्त समय लौट कर फिर कभी आएगा या नहीं। क्या भारतीय समाज अतीत की मधुर स्मृतियों में ही भटकता रहेगा और वर्तमान में उसका जीवन कुछ अलग रंग-ढंग में जीने के लिए विवश रहेगा? क्या कभी यह पतनकाल पुनरुत्थान काल में भी तब्दील होगा?

हालांकि तथाकथित आधुनिकता की ओर बढ़े कदम पीछे मुड़कर नहीं देखते, लेकिन शाश्वत मूल्यों की गठरी लेकर भी तो आगे बढ़ा जा सकता है। लोगों के भीतर सहिष्णुता, त्याग, उदारता और स्नेह का भाव बना रहे, तो इससे सुंदर बात क्या हो सकती है।