मौजूदा दौर में अगर लोगों की व्यस्तता पर गौर किया जाए, तो ऐसा लगता है कि ज्यादातर आबादी काम के बोझ से दब चुकी है और हर वक्त किसी बहुत जरूरी काम को पूरा करने में लगी हुई है। सच यह है कि व्यस्त दिखती यह आबादी अपने मोबाइल में और उसके भीतर सोशल मीडिया पर फैले रील के जंजाल में खोई लगती है। उठते-बैठते, चलते-फिरते, यहां तक कि जरूरी विमर्श और बैठकों में भी आदमी बेमतलब ही स्मार्टफोन की स्क्रीन में गुम दिखता है, रील में डूबता-उतराता रहता है।
हालत यह है कि रील को लेकर ज्यादा संवेदनशील लोग दाह-संस्कार जैसे अवसरों पर भी रील पर अंगुलियां चलाते रहते हैं। मानो घटनाओं का रील में होना जरूरी हो गया है। व्यक्ति की छोटी से छोटी निजी घटनाएं भी सोशल मीडिया पर डाल दी जाती हैं। घर के दरवाजे से बाहर निकलते हुए फिसल जाने की निजी घटनाओं के भी वीडियो बनाए जाते हैं। दरअसल, रील बनाना प्रसिद्धि बटोर लेने का साधन बन गया है। बल्कि इसके लिए घटनाएं बनाई जा रही हैं। फिल्मों की कतरनें डाली जा रही हैं।
सोशल मीडिया के जरिए दुनिया पर छा जाने का चलन नया नहीं है। रुपहले पर्दे के कलाकार रील की बदौलत दुनिया को आकर्षित करते रहे हैं। एक जमाना था, जब सिनेमा ही मनोरंजन के साधन हुआ करते थे। फिल्म कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा उसकी रील की लंबाई से लगाया जाता था। दर्शक सिनेमाघरों में टिकट खरीदते हुए पूछते थे कि यह फिल्म कितनी रील की है! जवाब में अगर सोलह रील सुनाई देता, तो लोग खुश हो जाते। अपने जमाने की सुपर हिट फिल्म ‘शोले’ तेईस रील की थी और उसकी कुल अवधि दो सौ चार मिनट थी। दर्शक तीन घंटे चौबीस मिनट सिनेमाघरों में सांस साधे बैठा रहता था।
हर इंसान के पास समय की कमी का रोना रो रहा है
अब हर व्यक्ति समय की भारी कमी बताता दिखता है। इसलिए एक से डेढ़ घंटे की फिल्में चलन में आ गई हैं। समय के साथ धैर्य भी घटा है। वह धैर्य मात्र तीस सेकंड की रील में सिमटता प्रतीत हो रहा है। एक रील समाप्त हुई नहीं कि लोग अगली रील पर बढ़ जाते हैं। अब हालत यह है कि उकसाने वाली रील का एक नया शगल शुरू हो गया है। इनके लिए निजता को भुनाया जा रहा है। एक ओर ऐसी गतिविधियों में लिप्त होने वालों की भरमार है और दूसरी ओर इनमें खोए लोगों की भी भीड़ है, जो निजी बेचैनी में चैन तलाशने का यत्न संजोती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आने से रील की लोकप्रियता में भारी इजाफा हुआ है। स्थिर छाया चित्रों का रील में समावेशीकरण चलन में आ गया है। लेखक और रचनाकार अपनी रचनाओं की कतरनें और छाया चित्र ऐसे छोटे वीडियो में डालते हैं, ताकि रील दर रील सरकाने की दौड़ में स्थिर छाया चित्रों को एक झलक का स्थान मिल सके। स्थिर छाया चित्रों के पीछे आवाजें डालकर आकर्षक और सुनने लायक बनाया जाता है।
कई बार ऐसे संक्षिप्त वीडियो के पार्श्व की आवाजें भौंडी और चिढ़ पैदा करने वाली होती हैं। मगर ऐसा लगता है कि लोग इसे लेकर एक प्रकार की दुविधा में रहते हैं या फिर सहज हो रहे हैं। मसलन, जिस व्यक्ति को पड़ोस की रसोई से बर्तनों की खटपट की आवाज परेशान कर रही हो सकती है, वह सो नहीं पाता होगा, वही मोबाइल में चल रही रील की पृष्ठभूमि में अजीब-सी हंसी और ठहाकों तथा अन्य आवाजों को लेकर सहज रह सकता है। जबकि यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भले ही ऐसी रीलें लोगों के लिए मनोरंजन के साधन हैं, पर आसपास के लोग इनसे परेशान रहते हैं।
इस प्रवृत्ति के बढ़ते जाने की लत अब विचित्र दिखने लगी है। इस लत के जुनून में डूबा कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना के दौरान अगर बच जाता है, तो वह वीडियो बनाने में मशगूल दिख सकता है। बात यहां तक जा पहुंची है कि घायल अवस्था में भी कुछ लोग ऐसे संक्षिप्त वीडियो को सोशल मीडिया पर डालते हैं और ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ की बदौलत अपने साथ हुई दुर्घटना पर सहानुभूति जुटाने की कोशिश करते हैं। ऐसे कुछ लोग कराहते दिख सकते हैं और अपने कष्ट और मुसीबत को लेकर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं।
इसके अलावा, आए दिन रील बनाने और देखने वाले लोग दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। वहीं एआइ के विस्तार के साथ लोग अब दुनिया की तबाही के रील भी बनाने लगे हैं। एआइ की मदद से आकाश से गिरती विशाल चट्टानें, चट्टानी ओलों की वर्षा से टूटते घर, तबाह होती सड़कें और तूफानों के भय से भागते लोग रील में दिखाए जा रहे हैं। तबाही के ऐसे वीडियो के बीच अजब-गजब-सी रीलों का दौर भी चल पड़ा है। आसमान से नोटों या जानवरों की वर्षा होती दिखाई देती है। ऐसे वीडियो से असल और नकल की पहचान गुम हो रही है।
कुल मिलाकर इस लत का जुनून लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। जमीनी स्तर पर इससे जुड़े कई अनुभव भयावह होते जा रहे हैं। लोग ‘रियल’ यानी वास्तविकता पर नहीं, ‘रील’ यानी आभासी पर भरोसा करने लगे हैं। ‘रील सच है और रियल भ्रम’ का भाव पनप रहा है! अब दुर्घटनाओं का दर्द महसूस नहीं होता। चौंक जाने का सुख गायब हो रहा है। रील का आभासी चित्रण, हकीकत के भाव को भंग कर रहा है, जिससे लोगों की तासीर बिगड़ रही है।
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