आभासी दुनिया के अत्यधिक इस्तेमाल से लोग अब अपने वास्तविक सामाजिक और पारिवारिक जीवन से दूर होने लगे हैं। इससे जहां अकेलापन और संवादहीनता बढ़ती जा रही है, वहीं मौलिक सृजनात्मकता और भरोसे का संकट भी पैदा हो रहा है। यह केवल मानवीय मनोभावों के मोर्चे पर पिछड़ने का सवाल नहीं है, बल्कि स्क्रीन के संसार में उपस्थिति दर्ज करवाने की सनक संबंधों में दरार से लेकर हिंसक बर्ताव और आपराधिक घटनाओं तक, हर पहलू से घातक सिद्ध हो रही है।
‘रील’ बनाने का जुनून अपनी ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थलों पर मौजूद अन्य लोगों के लिए भी असुरक्षा और असहजता का कारण बन रहा है। गांवों से लेकर महानगरों तक आभासी दुनिया के जाल में फंसे लोगों की सोच और मनोभाव किस दिशा में जा रहे हैं, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
पिछले दिनों हरियाणा के कैथल में एक घटना सामने आई। यहां दुल्हन जयमाला की रस्म के दौरान बहुत देर तक नृत्य करने और सोशल मीडिया के लिए ‘रील’ बनाने में व्यस्त रही। बार-बार बुलाने के बाद भी दुल्हन जब मंच पर नहीं पहुंची, तो दूल्हा बिना शादी किए बारात लेकर लौट गया। देखने-सुनने में यह एक सहज घटना लगती है, पर वास्तव में यह सोशल मीडिया की लत की कड़वी हकीकत बताती है। हाल के वर्षों में ऐसी बहुत-सी घटनाएं आभासी मंच पर जीवन के हर पल को परोसने के जुनून में सामाजिक-पारिवारिक संस्कारों से बढ़ती दूरी को दर्शाती हैं।
सूखती संवेदनाओं के साथ ही ‘रील’ बनाने के मामले यहां तक कि जीवन छिन जाने और मुकदमेबाजी का कारण भी बन रहे हैं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में ‘रील’ बनाने से नाराज पति को छोड़कर एक महिला मायके चली गई। इस मामले का एक पक्ष यह रहा कि पुलिस को दी गई शिकायत में महिला ने ससुराल वालों पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। जांच में पता चला कि मामला सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा सक्रिय रहने के कारण उपजे आपसी मतभेद से जुड़ा था।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि गिनती के पलों में कुछ विशेष परोसने के फेर में व्यक्तिगत जीवन में कुछ भी व्यक्तिगत नहीं रहा है। वैवाहिक आयोजन भी अब सोशल मीडिया में प्रचार का साधन बन गए हैं। ऐसे में बहुत से दूल्हा-दुल्हन आभासी दुनिया के लिए सामग्री तैयार करने में व्यस्त रहते हैं और वास्तविक जीवन से जुड़े सगे-संबंधियों को भी नजरअंदाज कर देते हैं। तकनीक के फेर में फंसकर शादी के लम्हों को सहेजने से जुड़े पारंपरिक रीति-रिवाजों की असली रौनक और महत्त्व कम होते जा रहे हैं। विवाह के वीडियो के जरिए सोशल मीडिया में छा जाने का जुनून ऐसा है कि इसके लिए बाकायदा पहले से तैयारी की जाती है। दूल्हा-दुल्हन ही नहीं, बल्कि करीबी रिश्तेदार और मित्र भी ऐसे वीडियो की पहुंच और प्रभाव बढ़ाने के लिए आभासी दुनिया में नए चलन को लेकर सजग रहने लगे हैं।
इसके विपरीत पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत सार्थक संवाद के जरिए परिवारजनों से मिली छोटी-छोटी समझाइशें दिखावे से परे नए रिश्ते को मन से अपनाने की राह दिखाती हैं। शादी में शामिल होने आए सगे-संबंधियों से मेल-मिलाप के लिए समय निकालना सामाजिक परिवेश से जोड़ता है। मगर आज के समय में ‘रील’ बनाने की व्यस्तता स्नेह-शुभकामनाएं देने पहुंचे लोगों की उपेक्षा का कारण बन रही है।
यह समझना आवश्यक है कि विवाह समारोह में वरमाला हो या विदाई की रस्म, हर रिवाज के साथ बहुत से भावनात्मक और सांस्कृतिक पक्ष भी जुड़े होते हैं। मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी बताते हैं कि संवेदनाओं के धरातल पर पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाने से मन में सकारात्मक जुड़ाव की अनुभूति को बल मिलता है।
इस सच्चाई को समझना जरूरी है कि सिर्फ चंद पलों को कैमरे में कैद कर लेने से उम्रभर के संबंध को मजबूती नहीं मिल पाती है। बिखरते वैवाहिक संबंधों के बढ़ते आंकड़े इस हकीकत को सामने रखते हैं। फिर भी जमीनी जुड़ाव और परंपरागत शैली में होने वाली भारतीय शादियों पर ‘रील’ की आभासी दुनिया हावी होती नजर आती है। शादी समारोह में सब कुछ सहेजकर संसार को दिखाने का जाने कैसा जुनून है कि कोने-कोने की सजावट, दूल्हा-दुल्हन की पोशाक, गहने, भोजन और मेहमानों तक को इसमें शामिल किया जाता है।
यह चिंताजनक है कि इंटरनेट की असीमित दुनिया से जुड़े जोखिमों के बावजूद लोग अपनी व्यक्तिगत जानकारियां भी आभासी दुनिया में साझा करने से गुरेज नहीं करते। अर्थहीन दिखावे के इस बोझ के नीचे दबकर असली जीवन का प्रेमपगा साथ गुम होता जा रहा है। ‘स्क्रीन’ में सब कुछ सहेजने के चलन में इंसानी मन ने कुछ सहेजना ही बंद कर दिया है। इसलिए वैवाहिक जीवन के द्वार पर दस्तक देते हुए ‘रील’ को आकर्षक और कलात्मक बनाने के बजाय भावी जीवन को सुंदर एवं स्नेहमयी बनाने की सोच जरूरी है।
अपनी खुशियों को खुद ही परेशानियों के स्याह घेरे में लाने वाले इस चलन पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। तकनीक से घिरते जीवन में यह आवश्यक हो गया है कि मधुर स्मृतियों का लेखा-जोखा आभासी मंच पर नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में मन के संदूक में संचित होना चाहिए। यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसे भाव-चाव किसी वीडियो में समेटने भर के लिए नहीं होते। बिखरते सामाजिक मूल्यों और रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट के मौजूदा हालात में आवश्यक है कि रीति-रिवाज, आपसी मेलजोल और संवाद का पुराना भाव फिर लौटे, ताकि जीवन के खास अवसरों पर दिखावे की चकाचौंध के बजाय आपसी स्नेह और सामाजिक-पारिवारिक मेल का भाव नजर आए।
यह भी पढ़ें: नारों से बने रिश्ते, पोस्ट में पली दोस्तियां और स्क्रीनशॉट में कैद भरोसा, रिश्तों की आधुनिक त्रासदी | मार्गदर्शन
निहारिका फेसबुक पर अति सक्रिय है। वह खुद को नारीवादी भी कहती है। शायद कथित नारीवादी बोझ के तहत ही किसी महिला से मिलने के बाद इस तरह के वक्तव्यों के साथ पोस्ट करती है कि इनसे मिल कर बहन जैसा लगा। किसी सामान्य जानकार महिला के यहां किसी कार्यक्रम में जाने पर बताती है कि हमारा सात जन्मों का बंधन है। फिर उसी महिला से जरा सा मनमुटाव होने के बाद वह सोशल मीडिया पर शिकायतों की भरमार भी लगा देती है। सात जन्मों का रिश्ता इतना बेमानी हो जाता है कि निजी व भावुक क्षणों में की गई बातचीत का ‘स्क्रीन शाट’ साझा करना शुरू कर देती है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
