हमारे समाज में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि घर का काम मुख्य रूप से महिलाओं की जिम्मेदारी है और बाहर जाकर कमाना पुरुषों का दायित्व। मगर बदलते समय के साथ परिवार की यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। जब कक्षा छह के सामाजिक विज्ञान के एक पाठ में बच्चों से पूछा गया कि ‘क्या पिता खाना बना सकते हैं’ और ‘क्या मां घर के बाहर काम कर सकती हैं’, तो चर्चा केवल एक पाठ तक सीमित नहीं रही।
बातचीत बच्चों को परिवार, जिम्मेदारी और साझेदारी के नए अर्थ समझाने लगी। दरअसल, बच्चे परिवार और समाज को देखकर ही स्त्री और पुरुष की भूमिकाओं को समझना शुरू करते हैं। अगर वे बचपन से यह देखते और सुनते हैं कि घर का काम केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है और बाहर जाकर कमाना केवल पुरुषों का दायित्व है, तो यही धारणाएं उनके भीतर सामान्य और स्वाभाविक मान्यता के रूप में स्थापित हो जाती हैं।
बाद में यही धारणाएं लैंगिक असमानता, महिलाओं पर दोहरे बोझ और घर के काम के असमान बंटवारे को बनाए रखती हैं। आज के बदलते परिवेश में जब परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी साझा है, तो घरेलू जिम्मेदारियां भी साझा क्यों नहीं होनी चाहिए? खाना बनाना, बच्चों की देखभाल करना, सफाई करना या परिवार के अन्य सदस्यों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना केवल स्त्री का काम नहीं माना जा सकता।
पिता खाना बना सकते हैं और मां घर के बाहर काम कर सकती हैं। परिवार की भूमिकाएं स्थिर नहीं होतीं, बल्कि सहयोग, संवेदनशीलता और परिस्थितियों के अनुसार साझा की जा सकती हैं। शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तक की जानकारी देने का माध्यम नहीं है। वह बच्चों को समाज में उपस्थित असमानताओं को पहचानने, उन पर प्रश्न करने और अधिक न्यायपूर्ण संबंधों की कल्पना करने का अवसर भी देती है।
विद्यालय में बच्चों को लैंगिक संवेदनशीलता के बारे में पढ़ाना इसलिए जरूरी है, ताकि वे समझ सकें कि किसी कार्य को केवल स्त्री या पुरुष से जोड़ना उचित नहीं है। जब बच्चों को यह समझाया जाएगा कि पारिवारिक भूमिकाओं में सहयोग और लचीलापन एक संतुलित और सहयोगी वातावरण का निर्माण करते हैं, तो उनकी धारणा भी अलग जमीन पर विकसित होगी।
भूमिका-अभिनय यानी रोल-प्ले सामाजिक विज्ञान के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हुआ है, क्योंकि इससे बच्चों में सहानुभूति और समझ का विकास संभव हो पाता है।
जब बच्चे विभिन्न पारिवारिक भूमिकाएं निभाते हैं, तो उन्हें विविध दृष्टिकोणों की समझ प्राप्त होती है और वे पारिवारिक अंत:क्रियाओं की जटिलताओं की सराहना करते हैं। यह अनुभवात्मक अधिगम मानव व्यवहार और सामाजिक मानदंडों को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण साबित होता है, जो सामाजिक विज्ञान शिक्षा के केंद्रीय तत्त्व है। भूमिका-अभिनय के माध्यम से विद्यार्थी न केवल परिवार के भीतर विशिष्ट भूमिकाओं के बारे में सीखते हैं, बल्कि वे अपने निर्धारित परिदृश्यों की चुनौतियों का सामना करते हुए आलोचनात्मक चिंतन और समस्या-समाधान कौशल भी विकसित करते हैं।
लैंगिक संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाने का अर्थ केवल यह बताना नहीं है कि महिलाएं भी बाहर काम कर सकती हैं। इसका अर्थ यह समझाना भी है कि आर्थिक रूप से योगदान देने वाली महिला से घर की पूरी जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा करना असमानता है। इसी प्रकार पुरुषों को घरेलू काम से दूर रखना भी उन्हें देखभाल, संवेदनशीलता और पारिवारिक साझेदारी के अनुभव से वंचित करता है। साझा जिम्मेदारियां स्त्री और पुरुष दोनों को रूढ़िवादी भूमिकाओं की सीमाओं से बाहर आने का अवसर देती हैं।
बच्चों के भीतर नए प्रकार के सामाजिक बदलावों के प्रति लचीलापन विकसित करना और उन्हें बदलते परिवेश से अवगत कराना बेहद जरूरी है। इससे वे केवल अपने परिवार की भूमिकाओं को अलग दृष्टि से नहीं देखते, बल्कि समानता, सहयोग और संवेदनशीलता जैसे मूल्यों को अपने जीवन से जोड़कर समझते हैं। यही समझ आगे चलकर उनके व्यक्तिगत संबंधों, कार्यस्थल और सामाजिक व्यवहार को अधिक न्यायपूर्ण बना सकती है।
यह दृष्टिकोण न केवल पारिवारिक भूमिकाओं और जिम्मेदारियों की गहरी समझ विकसित करता है, बल्कि वास्तविक जीवन के मुद्दों पर गतिशील और रोचक तरीके से आलोचनात्मक चिंतन को भी प्रोत्साहित करता है। इस तरह के सामाजिक प्रशिक्षण पारिवारिक गतिशीलता की जटिलताओं तथा साझा जिम्मेदारियों के महत्त्व को सिखाने में भूमिका-अभिनय की उपयोगिता को उजागर करते हैं, जो एक संतुलित पारिवारिक जीवन के निर्माण में योगदान देती हैं।
अगर शिक्षा बच्चों को रूढ़िवादी लैंगिक भूमिकाओं पर प्रश्न करना नहीं सिखाएगी, तो समाज में वास्तविक बदलाव कठिन होगा। केवल महिलाओं का आर्थिक रूप से सक्रिय होना पर्याप्त नहीं है। परिवार और समाज की सोच तथा जिम्मेदारियों के बंटवारे में भी परिवर्तन आवश्यक है। अन्यथा महिलाएं बाहर काम करने के बाद भी घर के काम का पूरा बोझ उठाती रहेंगी और समानता का विचार व्यवहार में नहीं उतर पाएगा।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी अगर हम बच्चों को उन्हीं रूढ़िवादी लैंगिक भूमिकाओं, असमानताओं और लैंगिक असंवेदनशीलता के बीच बड़ा होने देंगे, तो समाज न तो प्रगतिशील बन पाएगा और न ही वैचारिक रूप से स्वतंत्र। बच्चों को शिक्षा के माध्यम से बदलती पारिवारिक भूमिकाओं, साझा जिम्मेदारियों और लैंगिक समानता से परिचित कराना बेहद जरूरी है। यही समझ उन्हें नए सामाजिक परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील और लचीला बनाएगी तथा एक अधिक समान, सहयोगी और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने में सहायता करेगी।
यह भी पढ़ें: CJP आंदोलन पॉलिटिकल पार्टियों के लिए कैसे बना इंस्टाग्राम की नई प्लेबुक? पीएम मोदी की एक पोस्ट पर एंगेजमेंट 290 फीसदी तक बढ़ा
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने न सिर्फ देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करवाया बल्कि इस देश की राजनीति को एक नई दिशा देने का भी काम किया। दरअसल, CJP के आंदोलन से देश की सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों को Gen Z की ताकत का पता चला। इस आंदोलन के बाद लगभग सभी राजनीतिक दल Gen Z युवाओं से जुड़ाव के लिए सभी जरूरी कदम उठाने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो CJP आंदोलन के बाद से इंस्टाग्राम पर लगातार एक्टिव रहने लगे हैं और यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की Instagram पर हर पोस्ट की एवरेज एंगेजमेंट 20 जुलाई के बाद करीब 290 फीसदी बढ़ गई है। पढ़िए पूरी लेख…
