“राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट, अंत समय पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट।” इस दोहे का भाव यह है कि ईश्वर का नाम सबसे बड़ा धन है जिसे जितना चाहो अपना सकते हो लेकिन विडंबना देखिए कि आज के दौर में पैसे की लालसा इतनी बढ़ गई है कि भगवान के नाम पर चढ़ाए गए दान की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
अयोध्या स्थित श्री राम मंदिर केवल पत्थरों से बनी एक इमारत नहीं है बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संघर्ष और भावनाओं का प्रतीक है। इस मंदिर के निर्माण के लिए देशभर के लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया। किसी ने एक रुपया दिया तो किसी ने करोड़ों। किसी ने अपनी जेब से पैसे निकाले तो किसी ने इसे जीवन का सबसे बड़ा धार्मिक कर्तव्य माना। वर्षों के इंतजार और लंबे आंदोलन के बाद जब रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए तो यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के विश्वास का उत्सव था।
इसी बीच मंदिर से जुड़े दान और आर्थिक लेन-देन में कथित अनियमितताओं की खबरों ने कई रामभक्तों को असहज कर दिया है। मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है और कुछ लोगों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना रहा है जबकि ट्रस्ट की ओर से आरोपों का अपना पक्ष भी सामने आ रहा है। अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा लेकिन जांच से भी बड़ा सवाल भरोसे का है।
मंदिर में चढ़ाया गया दान सिर्फ पैसा नहीं होता, वह श्रद्धा का प्रतीक होता है। जब कोई भक्त दानपात्र में अपनी मेहनत की कमाई डालता है तो वह यह विश्वास करके डालता है कि उसका योगदान धर्म और समाज के हित में उपयोग होगा। यदि उस धन के प्रबंधन पर ही सवाल उठने लगें तो सबसे बड़ी चोट किसी खाते या ट्रस्ट पर नहीं बल्कि लोगों की आस्था पर पड़ती है।
अगर जांच में किसी भी स्तर पर वित्तीय अनियमितता साबित होती है तो जवाबदेही किसकी होगी? क्या सिर्फ कुछ कर्मचारियों की या फिर पूरे प्रबंधन तंत्र की? करोड़ों रुपये के दान का हिसाब-किताब कितना पारदर्शी है? क्या नियमित ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए? क्या दान देने वाले श्रद्धालुओं को यह जानने का अधिकार नहीं कि उनकी आस्था से जुड़ा धन कहां और कैसे खर्च हो रहा है?
यह सवाल सिर्फ राम मंदिर का नहीं है। देश के हर बड़े धार्मिक संस्थान के लिए यह एक कसौटी है कि आस्था के साथ पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। आखिर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च-हर जगह दान लोगों के विश्वास से आता है और विश्वास की सबसे बड़ी शर्त जवाबदेही होती है।
राजनीतिक दल भी इस बहस से अछूते नहीं रह सकते। जब चुनावी मंचों पर राम का नाम राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनता है, तब राम के नाम पर जुटाए गए संसाधनों की पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है। सरकार का दायित्व है कि जांच निष्पक्ष हो, दोषी चाहे कोई भी हो, उसके खिलाफ कार्रवाई हो और भविष्य में ऐसी आशंकाओं की गुंजाइश खत्म करने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाई जाए।
आखिर में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि दान के पैसे में गड़बड़ी हुई या नहीं। सवाल यह है कि क्या करोड़ों रामभक्तों का विश्वास पहले जैसा मजबूत रह पाएगा? क्या भविष्य में एक रुपये से लेकर करोड़ों रुपये तक का दान देने वाला श्रद्धालु निश्चिंत होकर अपनी आस्था समर्पित कर पाएगा?
इन सवालों के जवाब फिलहाल एसआईटी की जांच और आने वाले समय के पास हैं। लेकिन एक बात तय है- राम का नाम आस्था का विषय है और आस्था की सबसे बड़ी रक्षा पारदर्शिता, ईमानदारी और जवाबदेही से ही हो सकती है।
यह भी पढ़ें दान पेटी से बैंक तक: मंदिरों में करोड़ों रुपये का हिसाब कैसे रखा जाता है?
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
