भारत को आस्था और अध्यात्म का देश माना जाता है। मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि लोगों की श्रद्धा और विश्वास का केंद्र भी हैं। भक्तगण अपने साथ उम्मीद, विश्वास और आत्मिक शांति की तलाश में आते हैं लेकिन आज के दौर में कई बड़े मंदिरों की व्यवस्थाओं के रूप बदलते दिख रहे हैं। जहां की पहचान कभी भक्ति हुआ करती थी; वहां अब वीआईपी दर्शन, टिकटों की कई श्रेणियां, ठेकेदारी, व्यावसायीकरण और प्रशासनिक अक्षमता चर्चा का विषय बन गए हैं।
सवाल यह नहीं है कि मंदिरों में सुविधाएं क्यों बढ़ रही हैं, बल्कि यह है कि क्या इन सुविधाओं की आड़ में भ्रष्टाचार पनप रहा है? क्या प्रबंधन के नाम पर बनाई गई व्यवस्थाओं के तले श्रद्धालुओं की आस्था पिस रही है?
आज देश के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन भी एक तरह की श्रेणी व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। एक ओर वह श्रद्धालु है जो घंटों लाइन में खड़ा रहता है, दूसरी ओर वह व्यक्ति है जो विशेष शुल्क, प्रभाव या सिफारिश के आधार पर कुछ ही मिनटों में गर्भगृह तक पहुंच जाता है। भगवान के सामने सभी बराबर माने जाते हैं, लेकिन व्यवस्था में यह समानता खत्म होती नजर आती है, हालांकि आम तौर पर दिखाई नहीं देती। यह वीवीआईपी कल्चर केवल सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि धार्मिक समानता पर भी सवाल खड़ा करता है।
धार्मिक स्थलों के आसपास तेजी से बढ़ता व्यावसायीकरण भी चिंता का विषय है। कई स्थानों पर प्रसाद, फूल, पूजा सामग्री, पार्किंग, लॉकर और अन्य सेवाओं के नाम पर मनमाने दाम वसूले जाने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। श्रद्धालु जो शांति की तलाश में मंदिर पहुंचता है, उसे कई बार बिचौलिया, अवैध गाइड्स और अव्यवस्थाओं का सामना करना पड़ता है। आस्था का वातावरण अब कारोबारी केंद्र के तौर पर बदला हुआ नजर आता है।
देश के बड़े मंदिरों जैसे काशी विश्वनाथ, तिरुपति बालाजी, माता वैष्णो देवी जैसे मन्दिरों और अन्य प्रमुख तीर्थों में समय-समय पर प्रबंधन, निर्माण कार्य, खरीद प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आते रहते है। इसका हालिया उदाहरण अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि मंदिर भी है। यह भी सच है कि हर आरोप सही साबित नहीं होता और कई मामलों में जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होती है। फिर भी बार-बार विवादों का सामने आना इस बात का संकेत है कि धार्मिक संस्थानों में स्पष्टता और जवाबदेही बेहद जरूरी है।
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान से जुड़ी कथित चोरी या घोटाले का मामला भी इन्हीं अव्यवस्थाओं के चलते भक्तों के बीच चर्चा का विषय बना है। श्रद्धालु अपनी आस्था और विश्वास के साथ दान करते हैं, लेकिन जब उन्हीं दान पेटियों की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं, तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि मंदिरों और धार्मिक संस्थानों की निगरानी सवालों के घेरे में आ जाती है। यह उस जरूरत को जन्म देता है, कि मंदिरों की व्यवस्था और प्रबंधन बेहद सख्त होनी चाहिए।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन उन्हें व्यवस्था के कई स्तरों से गुजरना पड़ता है। कहीं लंबी कतारें हैं, कहीं विशेष टिकटों की अलग व्यवस्था और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग प्रवेश द्वार भी बने होते हैं। इससे आम आदमी के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता भी अब आर्थिक और सामाजिक हैसियत से तय होगा?
मंदिरों की व्यवस्था में तकनीक और आधुनिक प्रबंधन का उपयोग स्वागत योग्य है, लेकिन यदि इसका उद्देश्य केवल पैसा बनाना रह जाए और श्रद्धालु का अनुभव बेहतर न हो, तो उसका महत्व कम हो जाता है। धार्मिक स्थल को किसी व्यावसायिक परिसर के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि भगवान के उस घर में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे वह सभी के लिए समानता का केंद्र हो, जहां वीवीआईपी या आम आदमी जैसा कुछ भी न हो।
हालांकि, यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सभी मंदिरों की व्यवस्था ही खराब है। अनेक मंदिर प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य, अन्नदान और सामाजिक सेवा में उत्तम कार्य भी कर रहे हैं। लाखों लोगों को भोजन, चिकित्सा और सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इसलिए आलोचना का उद्देश्य मंदिरों को बदनाम करना नहीं है, बल्कि उनका मैनेजमेंट करने वालों को अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह बनाना है।
समय की मांग है कि सभी बड़े मंदिरों में पारदर्शी प्रबंधन, नियमित स्वतंत्र ऑडिट, वित्तीय जानकारी का इंटरनेट पर पारदर्शी होना, ठेकों और खरीद प्रक्रियाओं में खुलापन हो। इसके अलावा मंदिरों में वीवीआईपी कल्चर होना ही नहीं चाहिए, क्योंकि भगवान के लिए प्रत्येक भक्त समान है। जब मैनेंजमेंट ठीक होगा, तो भक्तों के लिए भगवान के दर्शन सहज होंगे, और ये उनके लिए मंदिर आने का सुखद अनुभव होगा; अन्यथा मंदिर के प्रशासन के प्रति लोगों की सोच लगातार नकारात्मक होती जाएगी।
(कल्याणी चौधरी जनसत्ता में इंटर्न हैं।)
