‘ये उत्तर प्रदेश का ‘लंका कांड’ है… ‘लंकेश’ जाएगा… बड़े लोगों को बचाया जा रहा है, छोटे पकड़े जा रहे हैं… बड़ी मछलियां बाहर हैं, छोटी पकड़ी जा रही हैं… बड़ी मछलियों के ऊपर भी बड़े मगरमच्छ हैं, उन तक जांच की आंच कब पहुंचेगी!’ आठ लोगों पर प्राथमिकी दर्ज हुई है। विशेष जांच दल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को अंतरिम रिपोर्ट दे दी है। गिरफ्तार लोगों से पूछताछ जारी है।

मंदिर ट्रस्ट के मुखिया चंपत राय से भी तीन घंटे पूछताछ की गई है। चंपत राय का कहना है कि उनका चंदा चोरी से कोई लेना-देना नहीं… उन्हें अपने ड्राइवर टिन्नू यादव से ऐसी उम्मीद नहीं थी। विपक्ष किसी तरह से संतुष्ट नहीं। एक विपक्षी का कहना है कि सीबीआई जांच करे, दूसरे का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच हो, तभी ‘दूध का दूध, पानी का पानी’ होगा।

एक चैनल अपने ‘स्टिंग’ ऑडियो-वीडियो का झटका देता है, जिसमें एक चंदा चोर बताता है कि ढेर सारा सोना ‘दान पात्र’ में नहीं डाला गया। उसे अलग से एक कमरे में ले जाया गया। जब ट्रस्ट ने मांगा, तो नहीं दिया गया और बाद में भी नहीं दिया गया। वह चंपत राय को ‘बड़े साहब’ कहता है।

एक बाबा ने कहा कि पैसे को देखकर इनका दिमाग खराब हो गया… जब जेल जाएंगे, तभी ठीक हो पाएंगे। जब कुछ चैनल बाबा और बाबा के बीच बहस कराते हैं, तो ऐसे-ऐसे बाबा सामने आते हैं और आपस में ऐसी-ऐसी ‘तू-तू, मैं-मैं’ करते हैं कि एंकर और बाकी चर्चाकार भी अवाक् रह जाते हैं।

‘चढ़ावा चोरी’ की खबरें अब हर चैनल का ‘दैनिक फीचर’ हैं, लेकिन स्टिंग में ‘सोना चोरी’ के अलावा कोई नई बात नहीं आई। एक चर्चाकार साफ कहते हैं कि चंपत राय जवाबदेह हैं और सुप्रीम कोर्ट क्यों चुप है? एक अन्य एंकर कहता है कि शक की सुई चंपत राय की ओर जाती ही है।

भाजपा, संघ, हिंदुत्व या सनातन विचार हर रोज पिट रहा है। राम मंदिर की साख गिर रही है, लेकिन कहीं कोई ‘आत्मालोचना’ नहीं। इसी क्रम में एक दिन उत्तर प्रदेश में विपक्ष के नेता ने ‘एक्स’ पर श्रेय लिया कि प्रभु राम ने मुझे माध्यम बनाया… मेरी पोस्ट के बाद ही मामला सामने आया।

फिर एक दिन इकसठ बुद्धिजीवी अचानक मुद्दा बदलते हैं और राम मंदिर के चंदा चोरी कांड से रक्षात्मक बने सत्ता पक्ष को फिर आक्रामक होने का अवसर दे देते हैं। बुद्धिजीवियों का ‘बिरयानी प्रेम’ उमड़ता है। वे कहने लगते हैं कि पाकिस्तान से बातचीत शुरू करें… राज्य सत्ता अलग है और जनता अलग… ‘लोगों का लोगों से’ संवाद होना चाहिए। तिस पर संघ के एक बड़े नेता भी यह कहकर इन बुद्धिजीवियों की मांग के समांतर ‘टीप’ जड़ देते हैं कि सुरक्षा की नीति जरूरी है, लेकिन हमें दरवाजे खुले रखने चाहिए।

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जवाब में कई चर्चाकार और बुद्धिजीवी कहते हैं कि जब तक उनकी ‘गोली’ है, तब तक ‘बोली’ नहीं हो सकती। एंकर कहते हैं कि जब-जब बात की है, पछताए हैं। विपक्ष की ओर से बोलने वाले एक चर्चाकार ने कहा कि जो हमारे लोगों को मारते हैं, उनसे बातचीत कैसी! एक एंकर की लाइन रही कि यह ‘अमन की आशा’ की तरह का अमेरिकी खेल है।

फिर भी ‘चंदा चोरी’ की कहानी ही सबसे हिट कहानी रही। सुबह से शाम तक चैनलों में ‘चंदा चोरी’ की ताजा खबर देने की होड़-सी लगी रहती है। कोई ‘चंदा चोरी कांड’ को उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों से जोड़कर देखता है, तो कोई इस कांड पर ऑनलाइन सर्वे कराकर पक्ष-विपक्ष में ‘आधा-आधा’ करने लगता है।

फिर एक दिन उत्तर प्रदेश के बड़े विपक्षी नेता एलान कर देते हैं कि राम के दर्शन के लिए अयोध्या जाएंगे। प्रशासन उन्हें तुरंत घर में नजरबंद कर देता है। फिर विपक्ष के एक अन्य प्रवक्ता का बयान आता है कि राम मंदिर में हम सब दर्शन करना चाहते हैं, वहां लूटमार हो रही है… गजनी ने सोमनाथ सत्रह बार लूटा… इन्होंने राम मंदिर सत्तर बार लूटा… सभी विपक्षी नेताओं को मंदिर जाना चाहिए।

और शाम की बहसों में दो प्रकार के रामभक्त आमने-सामने होते हैं। एक कहते हैं कि ये जो नए भक्त बन रहे हैं, छद्म भक्त हैं… मौसमी भक्त हैं… ये ‘कालनेमि’ हैं, ‘मारीच’ हैं। नए भक्तों ने जवाब दिया कि आप लोगों की ‘बगुला भक्ति’ सारा देश देख रहा है। राम के नाम पर ट्रस्टियों ने लाखों गरीब भक्तों का दिया दान चुराया है। उनकी आस्था को चोट पहुंचाई है। राम जी आपको कभी माफ नहीं करेंगे।

इसी बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान आता है कि राजनीति का अंधधार्मिकीकरण नहीं किया जाना चाहिए। अहंकारी लोग बड़े-बड़ों को ले डूबते हैं। अहंकारी व्यक्ति अपना भी भारी नुकसान करता है।

इसी बीच विपक्षी दल के एक दक्षिणी नेता कहने लगते हैं कि हम 2029 में अपने नेता को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। एक चैनल की चर्चा में एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि विपक्ष के उक्त नेता सबसे अधिक साहसी हैं, लेकिन उनके दल की हालत ठीक नहीं। इस एलान के साथ ही एक चैनल दो लाइनें चिपकाता है—‘ये इनका “डिलूलू” क्षण है’, यानी यह भ्रांतिमूलक है, राजनीति का भ्रांतिमान अलंकार है।

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राम मंदिर जन्मभूमि के संघर्ष की कहानी तीन सदियों की आस्था से होकर गुजरती है। पीढ़ियों की पीड़ा ने अभी तो अपने जख्मों पर मरहम-सा महसूस किया था। अभी तो मंदिर बना ही था। कहते हैं कि इतिहास हमेशा विजेताओं के द्वारा लिखा जाता है। राम मंदिर जन्मभूमि के कारसेवक लोक से लेकर संवैधानिक अदालत में विजयी हुए। अभी तो इतिहास लिखने के लिए कलम पकड़ी ही थी कि गर्वित मन आस्था के इस आख्यान में गबन के क्षेपक से आहत हो गया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक