श्रीराम मंदिर में दान के गबन को भक्ति और आस्था के नाम पर सिर्फ हिंदुओं का मामला साबित करने वालों के लिए संदेश है। अयोध्या धाम में आस्था के आक्रमणकारियों को संदेश भेजा गया है कि भक्ति बुद्धि नहीं हरती है। भक्ति भ्रष्टाचार नहीं सिखाती। आस्था चेतना का अतिक्रमण नहीं करती है। कहते हैं कि बंद मुट्ठी लाख की, खुली तो खाक की। जब तक मंदिर नहीं बना था, आस्थावानों ने आपकी बंद मुट्ठी में सिर्फ अदृश्य राम-भक्ति देखी थी। मंदिर बनते ही, आपकी मुट्ठी खुलते ही सबसे पहले प्राण-प्रतिष्ठा का घनघोर राजनीतिकरण निकला। भक्तों को अहसास नहीं था कि मुट्ठी खुलते ही उनकी आस्था का इस तरह अनादर करेगी कि अभी तक के संभावित सबसे बड़े धार्मिक गबन पर चुप्पी बरतने का आदेश देने लगेगी। जिस मंदिर की नींव सुप्रीम कोर्ट से मिले अधिकार के रूप में रखी गई, वहां कानूनी जांच-परख को नकारने की कोशिश हुई। राम-भक्तों के सदियों के संघर्ष की बुनियाद पर मंदिर बना, लेकिन उसकी अट्टालिका से लहरा रही आपके लालच की पताका और आपके पतन पर बेबाक बोल।
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत
तुलसीदास कहते हैं कि काम, क्रोध, अहंकार और लोभ नरक की ओर ले जाते हैं। पर तुलसीदास की ये बातें चंपत राय व राम मंदिर जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के कर्ताधर्ता अपने लिए नहीं मानते हैं। राम मंदिर चंदा चोरी के आरोपी, यानी योगी के वेश वाले भोगी व्यवहारवादी हैं, जिन्हें अहसास है कि जो स्वर्ग है, यहीं है। वे तुलसीदास की बातें आपको सुनाएंगे, लेकिन अपने लिए वे परलोक नहीं, लोक वाली ‘आप गुरुजी बैंगन खाएं, औरन को प्रदोष बताएं’ वाली कहावत पर ही चलेंगे।
राम मंदिर जन्मभूमि के संघर्ष की कहानी तीन सदियों की आस्था से होकर गुजरती है। पीढ़ियों की पीड़ा ने अभी तो अपने जख्मों पर मरहम-सा महसूस किया था। अभी तो मंदिर बना ही था। कहते हैं कि इतिहास हमेशा विजेताओं के द्वारा लिखा जाता है। राम मंदिर जन्मभूमि के कारसेवक लोक से लेकर संवैधानिक अदालत में विजयी हुए। अभी तो इतिहास लिखने के लिए कलम पकड़ी ही थी कि गर्वित मन आस्था के इस आख्यान में गबन के क्षेपक से आहत हो गया।
यहां पर समस्या अपराध होना नहीं है। अपराध से कौन-सा युग, कौन-सा समय और कौन-सा क्षेत्र बचा है। अपराध तो त्रेता युग के राम-राज्य में भी हुए थे। तिरुपति में नकली घी से प्रसाद बनने का मामला आया तो क्या इस तरह के कुतर्क दिए गए कि हिंदुओं ने हिंदुओं को पशु-चर्बी से बना प्रसाद खिला दिया तो क्या हुआ? भारत के कई उन मंदिरों में अनियमितता के मामले आए, जहां दान के रूप में अकूत धन आता है। लेकिन वहां अपराध पर सवाल उठाने वालों को विधर्मी घोषित नहीं किया गया, बल्कि अपराधियों पर कार्रवाई की गई। तिरुपति के प्रसाद का ही उदाहरण सामने रख लीजिए।
समस्या इस बात की नहीं है कि अपराध हुआ है। समस्या यह है कि आप अपराध और अपराधी को किस तरह से देखते हैं। आपके व्यवहार ने आस्था के इस आश्रय की बुनियाद हिला डाली है। आने वाली पीढ़ियां यकीन नहीं करेंगी कि राम नाम से मिली सत्ता के शीर्ष से लेकर समर्थक तक कुतर्क कर रहे थे कि हिंदुओं का चंदा हिंदुओं ने ले लिया तो क्यों तकलीफ हो रही है? जिन लोगों ने चंदा नहीं दिया, वे क्यों हिसाब मांग रहे हैं? असली हिंदू दान देकर भूल जाते हैं, उसकी रसीद नहीं मांगते।
रसीद मांगना अगर आस्था के साथ खिलवाड़ है तो यह खिलवाड़ आपने शुरू किया ही क्यों? रसीद-पुस्तिका छापने जैसा विधर्मी काम किया ही क्यों? पहले ही घोषित कर देना चाहिए था कि अपने दान को आखिरी प्रणाम कर मंदिर से लौट जाइए। उस दान का चंपत राय, टिन्नू यादव या वैसी ‘बहुत-सी बड़ी मछलियां’, जिनका नाम अभी तक दुनिया नहीं जानती है, क्या करेंगे, उससे आपको कोई मतलब नहीं होना चाहिए।
आप कुतर्क दे रहे हैं कि दान को चंदा मत कहो। राम-राम कहते-कहते, ‘मरा-मरा’ करने वालों को भी राम महिमा का भान हुआ। आप कह रहे हैं कि आस्था नहीं है, इसलिए दान को चंदा कह रहे हैं। वाल्मीकि की भेंट जब नारद मुनि से हुई तो उन्होंने वाल्मीकि को राम-राम का जाप करने को कहा। वाल्मीकि ने उल्टा ‘मरा-मरा’ का जाप करके भी इस नाम के मर्म को समझ लिया था।
रामधाम की अकूत संपत्ति के लालच में और आपके लालच के समर्थन में कथित भक्तों, संतों ने न्यूनतम मानवता को भी नष्ट करने की ठान ली है। आप कह रहे हैं कि जिन्होंने चोरी की, उसे कैंसर होगा, तड़प-तड़प कर मरेगा। क्या आपको कैंसर और उसके दर्द की भयावहता का पता नहीं? आज जो राम-भक्त, कारसेवक कैंसर के दर्द की तड़प में होंगे, सोचिए उनकी भावनाएं किस तरह से आहत होंगी।
आप लोगों को शायद पता नहीं है कि त्रेता युग में भी शाप देने की शक्ति हासिल करने के लिए तपस्वी होना पड़ता था, असली तपस्या करनी होती थी। सिर्फ तपस्वी की पोशाक पहनकर कोई शाप नहीं दे सकता। यह व्यंग्य करना क्रूरता लग रही है, लेकिन आपकी असंवेदनशीलता को देखकर आगाह करना पड़ रहा है कि रामजी न करें, अगर कल आपको कैंसर हो गया तो आपके परिजन अस्पताल के बजाय पुलिस थाने या ईडी से संपर्क करेंगे कि पता करिए, इन्होंने कौन-सा गबन किया था।
रामजन्मभूमि ट्रस्ट, सत्ता और उसके समर्थक तुलसीदास के जीवन को एक बार फिर से देख लें। राम के नाम पर सत्ता मिलने के बाद सत्ताधारियों को गलतफहमी हो गई है कि भक्ति तो बुद्धि हर लेती है और जनता आपके कुतर्कों को मानकर आपके पीछे चल देगी। लेकिन आपको आध्यात्मिक आस्था व राजनीतिक अंधभक्ति में शायद फर्क नहीं पता है।
जरा याद कीजिए, राम से जुड़ी लोककथाओं में गिलहरी के शरीर की रेखाओं को किस तरह देखा गया है। ‘गिलहरी प्रयास’ कोई जुमला नहीं, भक्ति की शक्ति ही है। भक्ति तो मीरा वाली शक्ति देती है, जो पुरुषवादी समाज के सामने अदम्य साहस से कहती है, ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’ भक्ति तो आपको कुंभनदास बनाती है, जो मुगल सम्राट अकबर के फतेहपुर सीकरी के बुलावे पर कहते हैं, ‘संतन को कहां सीकरी सो काम। आवत-जात पनहिया टूटीं, बिसरि गयौ हरि-नाम।’
आस्था का मंदिर बन जाने पर अब आप सिर्फ राजनीति की भक्ति कर रहे हैं। अब आपको सीकरी से सौ काम हैं। एक्सप्रेसवे से सीकरी आवत-जात के गबन में अब भूल गए हरि-नाम हैं। आम चुनाव को देखते हुए राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के राजनीतिकरण को राम-भक्तों ने बर्दाश्त कर लिया। अयोध्या धाम में आपके चुनिंदा राजनीतिक अतिथियों को भी आपके संघर्ष का अधिकार समझकर माफ कर दिया। आपने चुनाव को देखते हुए मंदिर का निर्माण पूरा होने का भी इंतजार नहीं किया।
अब आप चाहते हैं कि इस गबन और उसके आरोपियों को इसलिए माफ कर दिया जाए कि आप हिंदू आस्था के अग्रदूत बन चुके हैं। कुछ ‘छोटी मछलियों’ को आगे कर सभी ‘बड़ी मछलियों’ को फिर से राम-नाम को लूटने और उसका राजनीतिकरण करने की छूट दे दी जाए। आरोप है कि पहली बार मामला सामने आने के बाद चंपत राय ने कई तरह के असत्य बोले।
चंपत राय के साम्राज्य में जिस तरह से राम-नाम की लूट मची, उसे देखकर आने वाली पीढ़ियां यकीन नहीं करेंगी कि इस देश की आस्था की सबसे बड़ी लड़ाई की सफलता को संभालने की अगुआई इन्हें दी गई थी। अभी की पीढ़ी को जेन-जी कहकर कोसा जा रहा है। मगर जेन-जी आप जैसे वृद्धों को देखकर अचंभित है। जिस आरोप के लगते ही आपको इतनी लज्जा आनी चाहिए थी कि धरती फटे और आप समा जाएं, वहां आप धरती के अंदर गबन किया खजाना दबाकर अपनी कुर्सी को बचाए रखने का कुकर्म कर रहे हैं। जहां उम्मीद थी कि आप आस्था के लिए हवन करेंगे, वहां कह रहे हैं कि हम गबन करेंगे।
पद और पैसे का इतना मोह? आह! वृद्धों को कलयुग में बूमर कहा गया है। सब कुछ त्याग देने की इस उम्र में आप जैसे बूमर्स के मोह को देखकर जेन-जी कह रही है—हे राम!
