प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष के बीच संबंध समकालीन राजनीति में विमर्श का एक महत्त्वपूर्ण विषय बन गया है। जनतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप, नोक-झोंक तथा टकराव अस्वाभाविक नहीं है। पर जो स्वाभाविक नहीं है, वह है शाब्दिक हिंसा और अमर्यादित आलोचना। यह संसदीय जनतंत्र की गिरावट के लक्षणों में से एक होता है। ऐसे में मर्यादा, सभ्य आचरण और चरित्र निष्प्रभावी लगने लगा है। वह जनमानस की अपेक्षा और राजनीतिक व्यवहार में बड़ा अंतर पैदा करने लगता है। धीरे-धीरे राजनीति से नैतिकता का संबंध समाप्त होने लगता है।
मोदी ने विपक्ष के प्रति अपनी पीड़ा राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के उत्तर में दिए गए अपने भाषण में व्यक्त की। पिछले एक दशक से अधिक समय से विपक्ष के निशाने पर भाजपा-आरएसएस कम और प्रधानमंत्री मोदी अधिक रहे हैं और उनके प्रति यह आक्रामकता सामाजिक-आर्थिक दर्शन पर नहीं होकर ‘मोदी’ पर है। विपक्ष की यह सबसे बड़ी भूल है।
प्रधानमंत्रियों के प्रति नापसंदगी पहले भी व्यक्त होती रही है। अटल बिहारी वाजपेयी को ‘संघ का मुखौटा’, इंदिरा गांधी को ‘मोम की गुड़िया’ मोरारजी देसाई को ‘बड़े व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधि’, चरण सिंह को ‘कुलक’, राजीव गांधी को ‘नासमझ’ और जवाहरलाल नेहरू को ‘अंतिम अंग्रेजी प्रधानमंत्री’ कहा गया। आपातकाल के दौरान भी इंदिरा गांधी के लिए किसी ने काटने-मारने की भाषा का प्रयोग नहीं किया। पर तब और अब में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। विपक्ष के खेमों से नफरती अभियान ‘…कब्र खुदेगी’ जैसे नारों में दिखने लगा है। मोदी ने ऐसा क्या गुनाह किया कि विपक्ष हिंसक भाषा का उपयोग कर रहा है? इसका उत्तर समकालीन राजनीति की हकीकत को सामने लाता है।
दरअसल, मोदी की आध्यात्मिक प्रतिबद्धता ने भारत को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने में धर्मनिरपेक्षीय संकोच समाप्त कर दिया। विपक्ष का चिंतन समूह इससे घुटन महसूस कर रहा है। वह भारत में उपराष्ट्रीयताओं, भाषाई प्रतिद्वंद्विताओं और अल्पसंख्यकवादी विचारों का प्रतिष्ठित उत्पादक रहा था। उस वैचारिक कारखानों पर लगभग ताला लग गया है। ऐसे में छटपटाहट कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वही कांग्रेस को संपूर्णानंद, केएम मुंशी, पट्टाभि सीतारमैया की भाषा बोलने नहीं देती है, जिसमें भारतीय सभ्यता के प्रति आदर था। हिंदुत्व विरोध के आधार पर अब राजनीति नहीं की जा सकती है। भले ही हिंदुत्व की परिभाषा संघ-भाजपा की शैली में नहीं हो, पर परिधि में आए बिना कांग्रेस या कोई अन्य दल अपने अस्तित्व को समृद्ध नहीं कर सकता है।
सत्ता और विपक्ष के बीच स्वस्थ आलोचनात्मक संबंध जनतंत्र को मजबूती देता है। एक बार वाजपेयी ने विपक्ष के लिए इस दोहे का प्रयोग किया था। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय/ बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।’ यह तब संभव है जब विपक्ष में रचनात्मकता हो। शाहबानो मामले पर केंद्र सरकार के मंत्री आरिफ मुहम्मद खान कांग्रेस के खिलाफ हो गए थे। उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी। राजीव गांधी ने उन्हें गद्दार नहीं कहा था। पर रवनीत सिंह बिट्टू का कांग्रेस छोड़ना राहुल गांधी की नजर में गद्दारी बन गया। जनतंत्र में विचारों का द्वंद्व व्यक्ति के मन में चलता रहता है और उसे अपने को बदलने का नैसर्गिक अधिकार होता है। इस पर प्रहार करना जनतंत्र को कैद करने जैसा होता है।
एक समय था जब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे आचार्य जेबी कृपलानी ने कांग्रेस छोड़ दी थी। तब संसद में कांग्रेस के सदस्य एमएन लिंगम ने कटाक्ष करते हुए उनसे पूछा था कि ‘आपने कांग्रेस कब छोड़ी?’ तो कृपलानी का जवाब था ‘जब से कांग्रेस में भ्रष्टाचार और कमीशन का विषाणु आ गया।’ उनकी पत्नी सुचेता कृपलानी कांग्रेस में ही रहीं और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं।
पीलू मोदी स्वतंत्र पार्टी के नेता थे। उन पर सत्तारूढ़ पार्टी सीआइए का एजंट होने का आरोप लगाती थीं। एक दिन वे अपने गले में ‘मैं सीआइए का एजंट हूं’ की पट्टी लगाकर संसद भवन में चारों तरफ घूम गए। समकालीन भारत में संसद और संसद के बाहर की संवाद शैली में कोई बुनियादी अंतर नहीं रह गया है। एक तरफ की बदजुबानी दूसरी तरफ को बदजुबानी का अवसर दे देती है। फिर टीवी स्टूडियो उसे खाद-पानी, प्रश्रय और प्रोत्साहन देते हैं।
भारतीय जनसंघ पचास-साठ के दशकों में सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी। यह नेहरूवादी आर्थिक नियोजन से असहमत थी। तब जनसंघ के सिद्धांतकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘द टू प्लान्स’ के नाम से वैकल्पिक आर्थिक दस्तावेज देश के सामने रखा। राम मनोहर लोहिया या जय प्रकाश नारायण के साथ राजनीतिक दस्तावेजों से लेकर राजनीतिक विमर्श होते रहते थे। तिब्बत के प्रश्न पर नेहरू की नीति के विरोध में जयप्रकाश नारायण का सारगर्भित भाषण आज भी उद्धृत होता है। 1989 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ईएमएस नंबूदरीपाद ने पुस्तिका जारी की थी ‘द आरएसएस एंड बीजेपी इन द सर्विस आफ राइट रिएक्शन’।
इसमें उन्होंने संघ और भाजपा को प्रतिक्रियावाद और दक्षिणपंथ का एजंट कहा। तब भाजपा ने ‘द ग्रेट ब्रिटेयल’ नामक पुस्तिका जारी कर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कम्युनिस्टों की साम्राज्यवादियों के प्रति पक्षधरता को उजागर किया। इस तरह के वैकल्पिक दस्तावेज और कार्यक्रम आम लोगों का प्रबोधन होते हैं। इसका समाधान क्या है? आज की स्थिति में लोक पहल ही एकमात्र रास्ता है। जब स्वतंत्र रूप से निष्पक्षता से अधिक दूर रहे बिना बात कही और सुनी जाएगी, तब राजनीतिक विमर्श और संबंधों का परिष्कार संभव है।
