जब तक प्रधानमंत्री ने काकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन पर चुप्पी तोड़ी, उससे पिछले सप्ताह उनके गुमशुदा होने के पोस्टर फैल रहे थे सोशल मीडिया पर। पोस्टर पर उनके मुस्कुराते चेहरे के नीचे लिखे थे ये शब्द- ‘क्या इस व्यक्ति को देखा है आपने? नाम- नरेंद्र मोदी, छाती- 56 इंच, सुनने-देखने में अक्षम हैं। पिछली बार दिखे थे मेलोनी के साथ।’ इस पोस्टर को मैंने उस दिन देखा, जिस दिन प्रधानमंत्री ने वादा किया कि पेपर लीक की साजिश रचने वालों के लिए ‘त्वरित अदालतें’ बननेवाली हैं।
संयोग से मैं उस सुबह एक वकील दोस्त के साथ काफी पी रही थी, जो कभी मोदी के कट्टर भक्त होते थे। उन्होंने इस घोषणा को सुनने के बाद कहा- ‘क्यों नहीं हर अदालत को त्वरित बना पाए हैं मोदी पिछले बारह सालों में?’ सच यह है कि जितनी जरूरत है शिक्षा क्षेत्र में ‘त्वरित’ सुधार लाने की, उतनी ही जरूरत है न्याय प्रणाली में सुधारों को लाने की, लेकिन इन बातों को करेंगे किसी और दिन। आज मैं पूरा ध्यान देना चाहती हूं जंतर मंतर में जो हुआ उस पर।
पिछले सप्ताह मैंने लिखा था यहां कि मैं जंतर मंतर गई थी देखने कि कौन लोग वहां पहुंचे हैं समर्थन जताने और कहां-कहां से आए हैं। उस दोपहर इतने थोड़े लोग थे वहां कि अभिजीत दिपके मंच से उतरकर लोगों के साथ हाथ मिला रहे थे। इनमें मैं भी थी। मुझे उनकी विनम्रता देखकर अच्छा लगा, लेकिन उस छोटी-सी भीड़ को देखकर कल्पना नहीं कर सकी कि कुछ ही दिनों में नौजवानों का सैलाब पहुंचने वाला है देशभर से।
कहते हैं अब कि ये लोग इसीलिए आए थे कि उनको बहुत बुरा लगा जब सोनम वांगचुक को पुलिस ने जबरदस्ती उठाकर अस्पताल पहुंचाया था। हो सकता है यह एक कारण था, लेकिन जिस तादाद में नौजवान और बच्चे पहुंचे थे संसद तक जानेवाले ‘मार्च’ में शामिल होने, वे कभी न आते अगर कारण एक ही होता। ज्यादातर आए थे इसलिए कि किसी न किसी तरह उनको काकरोच जनता पार्टी ने छू लिया था पर्चों के लीक होने के मुद्दे को उठाकर। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगकर। प्रधानमंत्री ने अगर उनके साथ बातचीत का सिलसिला शुरू किया होता बहुत पहले, तो हो सकता है कि लाठी और आंसू गैस तक पहुंचने की नौबत न आती। उस समय नहीं बोले, क्योंकि उनको घेर रखा है कुछ ऐसे लोगों ने, जो अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी और राजनीतिक समझते हैं।
मैं इनको थोड़ा बहुत जानती हूं और मैंने पाया यह है कि इनमें अहंकार ज्यादा है और अक्ल कम। इसलिए इनमें से एक मोदी भक्त हैं, जिन्होंने कई दिन सोनम वांगचुक के अनशन का मजाक उड़ाया अपने आपको हर किस्म का खाना खाते हुए तस्वीरें बनाकर और सोशल मीडिया पर डालकर। तस्वीरों के साथ यह भी कहते रहे कि अनशन का जवाब वे देना चाहते हैं रोज खूब मजे का खाना खाते दर्शाकर। एक और ‘बुद्धिजीवी’ हैं जो रोज टीवी पर दिखते हैं मोदी की भक्ति करते हुए और अभिजीत दिपके की आलोचना करते हुए। इनका मानना है कि जितने भी लोग दिपके के साथ जुड़े हैं, वे वही राष्ट्र विरोधी लोग हैं जिनको शाहीन बाग और किसानों के विरोध प्रदर्शनों में देखा गया था और जिनको मोदी ने ‘आंदोलनजीवी’ कहा है बहुत बार।
अगर ये लोग इस तरह की बातें कर रहे होते तो शायद प्रधानमंत्री चुप्पी न साधे रहते इतने दिन। समस्या यह थी कि इनके अलावा जाने-माने ‘राष्ट्रवादी’ टीवी एंकर भी थे, जिन्होंने कहना शुरू किया कि उनके पास सबूत है कि काकरोच जनता पार्टी के पीछे हैं ऐसी विदेशी ताकतें जो भारत को तोड़ना चाहती हैं। इस बात को और बुलंद किया मोदी के उन्हीं मंत्रियों ने, जिनको हमेशा हर विरोध प्रदर्शन के पीछे दिखता है विदेशी हाथ और जॉर्ज सोरोस के पैसे। ऐसी बातों ने प्रधानमंत्री को गलत रास्ते पर चलाया था तब तक, जब तक बहुत देर हो चुकी थी।
रही मेरी अपनी बात, तो मैंने शुरू से कहा था कि काकरोचों की बात सुनी जानी चाहिए और शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए, क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया है बहुत बार कि वे हर तरह से निकम्मे मंत्री हैं। यह बात जब मैंने मोदी के एक बुद्धिजीवी भक्त से कही, तो उसने कहा कि मोदी खुद धर्मेंद्र प्रधान को हटाना चाहते थे और पहले ही उनको बर्खास्त कर दिए होते अगर काकरोच जनता पार्टी ने अपना प्रदर्शन शुरू न किया होता। अच्छा ही हुआ कि काकरोचों को इतनी मोहलत दी गई थी, क्योंकि अब सारी दुनिया देख सकती है कि इस देश के नौजवानों में कितना गुस्सा है और अपने भविष्य को लेकर वे कितने मायूस हैं। इनका दुख, इनकी समस्याओं के बारे में अगर प्रधानमंत्री ने ध्यान दिया होता बहुत पहले, तो जो हिंसा हमने पिछले हफ्ते दिल्ली में देखी, शायद देखनी नहीं पड़ती।
तो अब क्या होगा? जब विपक्ष के तमाम बड़े राजनेताओं ने काकरोचों का खुल कर समर्थन किया और मोदी सरकार अकेली, दृष्टिबाधित और बधिर दिखने लगी, तो मामला सुलझाने की चुनौती बढ़ गई। मगर इतना कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री की लंबी चुप्पी ने उनका बहुत नुकसान किया है इसलिए कि इस चुप्पी को अहंकार के रूप में देखा गया है।
याद करना मुश्किल है कि जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे मोदी, तो उनको सबसे ज्यादा समर्थन मिला था नौजवानों का। वे वही थे, जिन्होंने अपने सारे सपने और सारी उम्मीदें मोदी के व्यक्तित्व में समेट ली थीं। ऐसा अभी कहा नहीं जा सकता है कि इसका लाभ अब कांग्रेस को मिलेगा, लेकिन इतना कहने को मैं तैयार हूं कि पिछले सप्ताह राहुल गांधी शायद पहली बार मोदी से बड़े राजनेता साबित होते दिखे।
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मोदी सरकार के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया है। सोनम वांगचुक, अभिजीत दीपके सभी इस इस्तीफे पर युवाओं को बधाई दे रहे हैं। इसी को लेकर अब संसद के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी अपना बयान जारी किया है। राहुल गांधी ने कहा, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हमारे शिक्षा व्यवस्था को फिर से संवारने की दिशा में बहुत बड़ा कदम है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
