शहर के अंधेरे को इक चराग काफी है
सौ चराग जलते हैं इक चराग जलने से

एहतिशाम अख्तर का ये शेर उन लोगों के लिए है जो प्रतिरोध की पहली आवाज उठाते हैं। बहुत पुराना एक जुमला है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। राजनीति के चूल्हे की बात करें तो प्रतिरोध पीतल की वह हांडी है जो पीढ़ियों तक चढ़ सकती है। 2014 में यह बात तत्कालीन विपक्ष ने समझी थी कि युवाओं का प्रतिरोध ही कांग्रेस को सत्ता से हटा सकता है, और ऐसा हुआ भी। शायद इसलिए अभी की सत्ता युवाओं के मसले को कभी जेन जी तो कभी काकरोच जैसे मुद्दे तक सीमित कर राजनीति की सीमा से बाहर धकेलने की कोशिश करती है। सत्ता को पता है कि जब परिवर्तन होगा, तब यहीं से होगा। प्रतिरोध काम करता है…इस बीज वाक्य को लेकर राहुल गांधी युवाओं के मुद्दे पर आंदोलन करने के लिए निकल पड़े हैं। क्या गांधी प्रतिरोध की राह पर डटे रहेंगे? राजनीति में युवा शक्ति जैसी पीतल की हांडी बनाम विपक्ष पर बेबाक बोल

‘प्रतिरोध काम करता है… मैंने अपनी आंखों से देखा है… प्रतिरोध सीबीएसई है, प्रतिरोध नीट है… सोशल मीडिया पर मौजूदगी बनाने में वर्षों लगते हैं… मेरे एक करोड़ यूट्यूब फॉलोअर्स हैं, लेकिन मेरा अकाउंट दबाया गया है। अगर आप यह सोच रहे हैं कि सोशल मीडिया निष्पक्ष है और विपक्ष को सपोर्ट मिल रहा है, तो आप दूसरी दुनिया में जी रहे हैं।’

उद्धृत वाक्य राहुल गांधी के भाषण के अंश हैं, जो उन्होंने इंडिया ब्लॉक की बैठक में दिए थे। 2026 में उनके दिए इस भाषण पर बात करने से पहले हम 2014 में चलते हैं। तब जनसंचार के साधनों पर युवाओं को जेन जी कहने का चलन नहीं था। फिलहाल जेन जी शब्द के साथ बुरा यह है कि राजनीतिक संदर्भ में जेन जी कहते ही सत्ता पक्ष बांग्लादेश और नेपाल ले आता है। विपक्ष पर आरोप लगते हैं कि वह जेन जी को भड़का रहा है।

जेन जी यानी युवा पीढ़ी तो प्रागैतिहासिक काल में भी रही होगी। तब किसी युवा ने दो चकमक पत्थरों को रगड़कर आग पैदा की होगी तो उस वक्त के बुजुर्गों ने ताना दिया होगा कि हमारी नई पीढ़ी से कच्चा भोजन नहीं खाया जाता। शिकार को आग पर पका कर खाने वाली पीढ़ी को शायद उस वक्त के बुजुर्गों ने कोसा होगा। आग के बाद पहिए के आविष्कार ने भी डराया होगा। इन आदिम उदाहरणों से समझिए कि विपक्ष के लिए जेन जी समझने की चीज है तो सत्ता पक्ष के लिए डरने की।

हम बात 2014 के पहले की कर रहे थे। यूपीए का भ्रष्टाचार इंटरनेट का मुख्य मुद्दा बन चुका था। विपक्ष ने देश के युवाओं के सामने भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाया। तत्कालीन सत्ता के खिलाफ युवा एकजुट होने लगे। तत्कालीन प्रधानमंत्री को ‘मौनमोहन’ नाम दे दिया गया। दिल्ली का रामलीला मैदान युवाओं के जुटान का केंद्र बन गया। अण्णा हजारे की अगुआई में शुरू हुआ आंदोलन आम आदमी पार्टी की शक्ल अख्तियार कर गया। कई युवा अपने अच्छे-खासे करियर को छोड़कर आम आदमी पार्टी का हिस्सा बने।

2014 में देश का राजनीतिक इतिहास बदला तो उसके मूल में क्या था? उसके मूल में यही युवा थे, जिन्हें आज काकरोच का नाम दे दिया गया। आज सत्ता पक्ष काकरोच नाम की व्यंग्यात्मक पार्टी को क्यों खारिज करना चाह रहा है? या सत्ता पक्ष इन काकरोचों को इतनी जगह क्यों दे रहा है कि ये अपनी बात कहकर अपना राजनीतिक विरेचन कर लें? क्योंकि सत्ता पक्ष जानता है कि ये काकरोच देश का राजनीतिक इतिहास बदल सकते हैं। ये काकरोच देश की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक पार्टी को इतिहास बनने की कगार पर ला कर खड़ा कर सकते हैं।

बीते दिनों हुए बंगाल चुनाव ने देश की राजनीति का असली चेहरा सामने ला कर रख दिया है। जिन्होंने विपक्ष के खाते में रहकर वोट पाए थे, अब उन्हें विपक्ष में रहने में डर लगता है। राघव चड्ढा जैसे 2014 वाले जेन जी को छोड़ दीजिए, तो अब राजनीति के ‘मिलेनियल्स’, ‘बूमर’ कोई भी जमीनी संघर्ष नहीं करना चाहते। लोकसभा चुनाव के समय क्या बंगाल की जनता को यह अहसास था कि उनका वोट किसी अनाम-सी एनसीपीआई नामक दल को चला जाएगा? महाराष्ट्र में बचा-खुचा विपक्ष भी पक्ष बनने को तैयार बैठा है। ऐसे समय में राहुल गांधी के भाषण के मायने क्या हैं?

राहुल गांधी के भाषण का बीज शब्द है – प्रतिरोध। प्रतिरोध काम करता है। राहुल गांधी जेन जी यानी युवाओं का राजनीतिक महत्त्व समझ रहे हैं। वे युवाओं के सामने पैदा हालात को भी समझ रहे हैं। बेरोजगारी तो ऐसा मुद्दा है जिसके साथ जनता ने शायद समझौता कर लिया है। फिर भी देश के युवा अपनी उम्मीद के मुताबिक रोजगार हासिल करने में जुटे रहते हैं।

बेरोजगारी से मुक्ति के लिए उनके पास एक ही उम्मीद बची थी – प्रतियोगी परीक्षाएं। लेकिन जब प्रतियोगी परीक्षाओं के ही अस्तित्व पर सवाल उठ जाएं तो युवाओं के सब्र का बांध टूटना लाजिम है। नीट, सीबीएसई, सीयूईटी जैसी परीक्षाएं तो बानगी भर हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय में कई परीक्षाओं में पर्चा लीक हुआ, कई परीक्षाएं रद्द हुईं। कई परीक्षाएं लेने के बाद या तो उनके नतीजे काफी दिनों तक रुके रहे या नतीजे आने के बाद भी विवादों में चले गए।

किसी भी देश के प्रशासनिक ढांचे की बुनियाद इस पर टिकी है कि वहां की परीक्षा व्यवस्था कैसी है। यह तो दिख चुका है कि पूरी परीक्षा व्यवस्था खामियों और भ्रष्टाचार का शिकार है। राहुल गांधी खुद कोटा में दावा कर चुके हैं कि नीट जैसी परीक्षाओं की तैयारियों में देश के अभिभावकों की जेब से उतने पैसे निकल रहे हैं, जितना इस देश के शिक्षा विभाग का कुल बजट होता है।

राहुल गांधी को यह बात समझ आ जानी चाहिए कि अगर देश की शिक्षा, परीक्षा और रोजगार का ढांचा ठीक नहीं होगा तो किसी भी तरह का ‘कोटा’ युवाओं को राहत नहीं दे सकता। शिक्षा और रोजगार का मुद्दा पूरे देश का मुद्दा है। अभी तो नीट के मुद्दे पर आपने अंगड़ाई ली है, लेकिन याद रखें, आगे जाति और धर्म की लड़ाई भी है।

नीट की परीक्षा होगी, नतीजे आएंगे और शायद यह मुद्दा आगे भुला दिए जाने की कोशिश होगी। आपसे अनुरोध है कि आप अपने बीज शब्द— प्रतिरोध से पीछे नहीं हटेंगे। प्रतिरोध किसी रंगारंग समारोह का मोहताज भी नहीं होना चाहिए, जिसके आयोजन में शिक्षा विभाग के बजट जितने पैसे की दरकार हो।

राहुल गांधी अपने बीज शब्द प्रतिरोध के साथ यह भी याद रखें कि जेन जी सिर्फ नीट, सीबीएसई नहीं है। जितना बड़ा और विविध यह देश है, उतनी ही बड़ी यहां की जेन जी है। जेन जी उन किसानों की संतानें भी हैं जो खेती में कोई फायदा नहीं देखकर शहरों में मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं। जेन जी राघव चड्ढा के मुद्दे वाले ‘डिलीवरी पर्सन’ भी हैं। कुछ जेन जी तक तो स्कूल, सीबीएसई, नीट, सीयूईटी पहुंचे ही नहीं हैं। जेन जी उस अस्सी करोड़ जनसंख्या का बड़ा हिस्सा भी होंगे जो सरकार के मुफ्त राशन पर निर्भर हैं। इसलिए आपको अपने प्रतिरोध का दायरा बड़ा करना होगा।

आपने ही कहा कि प्रतिरोध को काम करते हुए देखा है। आपको अपने इस देखे को राजनीतिक सत्य मानकर आगे बढ़ना होगा। 2014 के बाद आपने प्रतिरोध के कई मुद्दे उठाए हैं, पर कुछ दिनों के बाद पुराने प्रतिरोध को भूल जाते हैं। प्रतिरोध के साथ कबड्डी-कबड्डी नहीं खेलनी है कि एक बार इसे छूकर तो एक बार उसे छूकर भाग गए। प्रतिरोध के साथ सतत संघर्षरत रहना है।

जेन जी को इंटरनेट के साथ जोड़ा जाता है। आपको पूरे देश की जेन जी को यह समझाना है कि लीक वाले पेपर तो इंटरनेट से डाउनलोड हो जाते हैं, लेकिन जीवन जीने के लिए जरूरी रोटी इंटरनेट से डाउनलोड नहीं होगी। उसके लिए आपको जमीन पर संघर्ष करना होगा। आज आपके साथ अभिभावक खड़े दिख रहे हैं, क्योंकि उनके बच्चे नीट से जुड़े हैं। आपको पूरे देश के अभिभावकों को यह सवाल पूछने के लिए तैयार करना है कि देश का शिक्षा बजट इतना कम क्यों है? अंतिम बात, खुद के साथ विपक्ष को समझाते रहिए – डरो मत… प्रतिरोध काम करता है।