राघव कत तोर करब बुराई…कुछ ऐसा ही कहते हुए लोगों ने इंस्टाग्राम पर राघव चड्ढा से नाता तोड़ना शुरू किया। आम आदमी पार्टी का जन्म ही इंटरनेट से हुआ था। इसी इंटरनेट के जरिए राघव चड्ढा का पुनर्जन्म किया गया। समोसे, स्विगी, जोमैटो कुछ ऐसे बीज शब्द थे, जिनके जरिए इनका सरोकारी चेहरा दिखाया गया। देश भर के लोगों के मोबाइल में इनकी असामान्य पहुंच का सामान्य कारण समझ में आया-सत्ता का सूत्रधार बनना। जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, उन्हें धुलाई मशीन के सामने कतार में खड़ा कर चड्ढा ने कहा कि सात लोग एक साथ गलत नहीं हो सकते। वहीं चड्ढा को उनके पूर्व प्रशंसक इंटरनेट की गलती मान रहे हैं। आज पूरी दुनिया बच्चों की आनलाइन पढ़ाई के खिलाफ हो रही है। इस राजनीतिक हादसे ने सबक दिया है कि इंटरनेट के नेता भी लोकतांत्रिक राजनीति की सेहत बिगाड़ते हैं। अब जरूरत इस बात की है कि जनता अपना ‘स्क्रीन समय’ कम करे। राजनीति में आदर्श को कुचलने में गुरु (केजरीवाल) और शिष्य (चड्ढा) की कड़ी प्रतियोगिता का विश्लेषण करता बेबाक बोल

‘एक आदमी गलत हो सकता है, दो गलत हो सकते हैं, तीन गलत हो सकते हैं, पर क्या सात लोग एक साथ गलत हो सकते हैं?’ यह सवाल राघव चड्ढा ने किया जो भाजपा में शामिल होते ही घोर आलोचनाओं के शिकार हो गए। राघव चड्ढा के सवाल का जवाब यही है कि गलती करने का कोई पैमाना नहीं होता है। अगर दिल्ली की कुल आबादी जितने लोग भी कोई गलती एक साथ करेंगे तब भी ‘गलती’ तो गलती ही रहेगी। राघव चड्ढा के मासूम तर्क के अनुसार गलती करने के बाद गब्बर सिंह की तरह पूछना चाहिए कि कितने आदमी थे…सात सरदार…। तो जाकर रामगढ़ वालों से कह दो कि कोई गलती नहीं थी। क्योंकि पार्टी थी एक और आदमी थे सात…।

क्या राघव चड्ढा ने तब आदमियों की गिनती की थी जब योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और न जाने कितने लोग या तो आम आदमी पार्टी से निकाले जा रहे थे या आंदोलन की हकीकत देख कर खुद ही जा रहे थे। अगर तब आम आदमी पार्टी से निकल रहे/निकाले जा रहे नेताओं की गिनती करते तो राघव चड्ढा को आम आदमी पार्टी वर्षों पहले गलत लग जाती। लेकिन वो साल कुछ और था…आम आदमी पार्टी के पास दिल्ली की सत्ता थी, पंजाब की सत्ता थी और देश में विस्तार होने की उम्मीद थी। इसलिए राघव चड्ढा ने केजरीवाल का ‘राजा बेटा’ बनना पसंद किया।

‘कृत्रिम मेधा अभिशाप या वरदान’ वाले निबंध तो आज लिखे जा रहे हैं, पर भारतीय संदर्भ में आम आदमी पार्टी इस देश की पहली ‘एआइ’ पार्टी है। आज आप फलां ‘ऐप’ पर अपनी तस्वीर डाल कर कहिए कि मुझे एडोनिस या वीनस जैसा सुंदर बना दो। क्षण भर में आपके अरमान पूरे हो जाएंगे। कुछ ऐसी ही एआइ कलाकारी भारत की राजनीति और लोकतंत्र के साथ हुई। ‘गैर सरकारी संस्था’ के नाम पर कुछ लोग जुटे और इंटरनेट पर अपने चेहरे को दूसरा गांधी के रूप में पेश किया। कांग्रेस की ऐसी तस्वीर बनाई कि नारा निकला, ‘हम भ्रष्टाचार बोलेंगे, तुम कांग्रेस समझना’। राघव चड्ढा जैसे ‘करियर’ बनाने निकले युवाओं में आधुनिक भगत सिंह दिखाया जाने लगा। देश के लोगों ने कर चले हम फिदा…अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों को शब्दश: लेते हुए दिल्ली और पंजाब की सत्ता सौंप दी।

जब दिल्ली की जनता के कर के पैसों का इस्तेमाल आम आदमी पार्टी पंजाब की सत्ता जीतने के लिए कर रही थी तब ‘अधिकारपत्र प्राप्त लेखाकार’ राघव चड्ढा को कुछ भी गलत नहीं लग रहा था। शायद पंजाब का नियंत्रण मिलने का ख्वाब था। लेकिन इस कृत्रिम राजनीति वाले नेताओं का हाल भी एआइ के किए अनुवाद जैसा साबित हुआ। नीली ‘वैगन आर’ जनता की गलतियों के संग्रहालय में भेज दी गई। सरोकारी राजनीति का सपना लेकर ‘आप’ से जुड़े नेताओं से कहा गया कि अब हमारा आपसे कोई सरोकार नहीं। जब जनता का भरोसा टूटने लगा, आम आदमी पार्टी के नेता सरकारी जांच एजंसियों के दायरे में आने लगे तो राघव चड्ढा पहली आजादी से पहले हमारे देश पर शासन करने वाले ‘गोरों’ के यहां भाग गए। एआइ के तैयार भगत सिंह तब तक भारत नहीं लौटे, जब तक उन्हें वाशिंग मशीन में धुलने के लिए कतार में खड़े रहने के संकेत नहीं मिल गए।

राज्यसभा में एआइ से बने इस नेता ने सजग रूप से वे सवाल उठाने शुरू किए, जिससे वे विपक्ष का हिस्सा नहीं लगें। जब सभी लोगों को सोशल मीडिया पर पहुंच की दिक्कत हो रही थी, वैसे समय में राघव चड्ढा का हवाईअड्डे पर समोसे वाला सवाल हर किसी की स्क्रीन पर दिखने लगा। हालत यह थी कि अगर आप परेशान होकर मोबाइल बंद भी कर देते तो राघव चड्ढा के सवालों के अंश दिखने बंद नहीं होते। एआइ के जरिए अब राघव चड्ढा का नया चेहरा तैयार किया जा चुका था। लेकिन भाजपा में शामिल होते ही लोगों ने एआइ के इस रूपांतरण को खारिज कर दिया। इंटरनेट से बने नेता का इंटरनेट पर बहिष्कार हुआ।

इंस्टाग्राम पर लोगों ने राघव चड्ढा को खारिज करना शुरू किया तो आरोप लगे कि उन्होंने इंस्टाग्राम पर नकली ‘फालोवर’ खरीदे। प्रकाश राज ने कहा कि राघव की बात मान लें कि एक को छोड़ भी दें, सात लोग गलत नहीं हो सकते तो इसी मापदंड से वे लाखों लोग भी गलत नहीं हो सकते जो ‘इंस्टाग्राम’ पर उन्हें ठुकरा कर चले गए। जिसे युवा बता कर लोकतंत्र का भविष्य माना गया वह भी राजनीति के बड़े-बुजुर्गों की तरह अपना स्वार्थ साधने में जुट गया।

अब बात करते हैं चड्ढा के राजनीतिक गुरु अरविंद केजरीवाल की। जिस गांधी की तस्वीर लगा कर सत्ता हासिल की, उसी तस्वीर को सरकारी दफ्तरों से हटवा दिया गया। दिल्ली के बाद पंजाब के लोगों ने इन पर भरोसा किया। पंजाब में विधानसभा की 117 सीटें हैं तो राज्यसभा की सात। केजरीवाल ने राज्यसभा की सीटें उन अमीरों को दीं, जिन्हें आम जनता से कोई मतलब नहीं है। जब आप पैसे की ताकत देख कर ही राज्यसभा के लिए टिकट देंगे, तो उन पैसों की जांच-पड़ताल हो जाना कौन सी बड़ी बात है। जो पैसे देकर टिकट लेंगे, वे पैसे बचाने के लिए उस खेमे की तरफ ही दौड़ जाएंगे जिधर से जांच-पड़ताल चल रही है।

केजरीवाल ने राज्यसभा के लिए पैसों की गठरी को चुना। अगर वे जमीनी नेता चुनते तो उनके सांसदों को चुराना इतना आसान नहीं होता। लेकिन उन्होंने पिछले दरवाजे से राज्यसभा में पैसों की गठरी को पहुंचाया। फिर हो गया हादसा तेरी गठरी में लागा चोर…सरीखा।

भ्रष्टाचार, लालच ये सब भारतीय लोकतंत्र के अभ्यास का हिस्सा हो गया है। लेकिन भारतीय राजनीति की सबसे अश्लील तस्वीर तब सामने आती है जब किसी भी तरह की आपदा आने पर अरविंद केजरीवाल राजघाट और गांधी को अवसर की तरह देखते हैं। उनके लिए तो राजघाट का मतलब ‘राजपाट’ ही हो गया है। अपने दफ्तर से गांधी की तस्वीर निकालने वाले को जब लगता है कि उनके राजनीतिक अस्तित्व की चिता तैयार है तो वे दौड़ पड़ते हैं गांधी की समाधि की तरफ। आज गांधी किसकी तरफ देखेंगे? पैसों की गठरी चोरी होने से दुखी हुए राजनीतिक धंधेबाज को या फिर ओड़ीशा में अपनी बहन का कंकाल ढोकर बैंक पहुंचे जीतू मुंडा को। ‘दूसरा गांधी’ के नाम पर कभी रीझ गई जनता के कंधों पर आदर्श का कंकाल पड़ा है। राजनीति में आदर्श की मौत के ‘प्रमाणपत्र’ पर ‘फूलछाप झाड़ू’ की मुहर लगी है।

भारतीय राजनीति में यह अलहदा मौका है, जब अनैतिकता के तराजू पर दोनों पक्षों का समान वजन है। कथित धोखा देने वाले और कथित धोखा खाने वाले, दोनों साझा रूप से राजनीतिक शुचिता के लिए धोखा हैं। आम आदमी पार्टी को राघव चड्ढा ने जो घाव दिया है, वो नया नहीं, बल्कि पार्टी के अस्तित्व में आने के साथ ही गहरा लग गया था। पार्टी से पलायन का यह घाव सालों से रिस रहा। एक साथ सात सांसदों के पार्टी को ठोकर मार देने के बाद अब कह सकते हैं कि यह नासूर बन गया है। स्वार्थ, निजी महत्त्वाकांक्षा और विश्वासघात की कोख से जन्मी पार्टी से और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं, क्योंकि केजरीवाल के समझने की संभावना शून्य है। शून्य की संख्या भी इसलिए कही गई क्योंकि इसके नीचे कोई संख्या ही नहीं है।