भारत में महिलाएं देश की आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं। जब भी हम महिलाओं की समानता की बात करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि किसी भी वर्ग में समानता के लिए सबसे पहले अवसरों का बराबर होना बेहद जरूरी है। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि देश की राजनीति में महिलाओं की भूमिका अभी भी हाशिये पर है। यह स्थिति तब है, जबकि महिलाओं ने, राजनीति में जब भी मौका मिला, अपनी योग्यता और क्षमताओं का लोहा मनवाया है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आजादी के 75 वर्षों में लैंगिक समानता की दिशा में हासिल की गई उपलब्धियां आखिर गिनती की ही क्यों रह गई हैं? सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इस असमानता की खाई को अब तक क्यों नहीं भरा जा सका है?
इसमें कोई दोराय नहीं है कि स्त्री शक्ति ने देश-दुनिया में समय-समय पर अपनी प्रतिभा का बेहतर प्रदर्शन किया है। मगर महिलाओं को कमतर होने का अहसास दिलाने की पुरुष वर्ग की मानसिकता आज भी उन्हें उनके हक से वंचित कर रही है। नारी सशक्तीकरण की बातें कागजी योजनाओं में काफी अच्छी लगती हैं, पर धरातल पर अभी काफी कुछ होना बाकी है। खासतौर से देश की आधी आबादी को लोकतांत्रिक व्यवस्था में बराबरी का हक देने को लेकर।
महिलाओं को 33% आरक्षण की मांग आज भी अधूरी
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि विधायिका में महिलाओं के लिए पचास फीसद नहीं, बल्कि महज तैंतीस फीसद आरक्षण की मांग आज भी अधूरी है। पंचायत और स्थानीय निकाय स्तर पर आरक्षण से महिलाओं को प्रतिनिधित्व का मौका जरूर मिला, लेकिन यहां भी उनका कितना सशक्तीकरण हो पाया है, यह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षित, आर्थिक रूप से स्वावलंबी और ऊंचे पदों पर बैठी महिलाओं के विपरीत लैंगिक भेदभाव की उस तस्वीर को भी देखना होगा, जहां महिलाओं को यह भी पता नहीं कि कानून ने किन-किन क्षेत्रों में उन्हें कितना संरक्षित कर रखा है।
संसद में भी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। वर्ष 2024 के संसदीय चुनावों के बाद महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व मात्र चौदह फीसद ही है, इसीलिए उन पर दायित्व और प्रतिनिधित्व का भार निर्वाचित पुरुष सांसदों से कहीं अधिक है।
देश की मौजूदा जनसंख्या के अनुसार, लोकसभा में एक निर्वाचित सांसद औसतन 26 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि एक निर्वाचित महिला सांसद औसतन 92 लाख महिलाओं का प्रतिनिधित्व करतीं है। ऐसे में निर्वाचित महिला सांसदों का राजनीतिक दायित्व भी कहीं अधिक है।
जाहिर है, महिला अधिकारों और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व के दावों तथा उसकी वास्तविकता के मध्य एक गहरा विरोधाभास है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि डा आंबेडकर महिलाओं की उन्नति के प्रबल पक्षधर थे। उनका मानना था कि किसी भी समाज का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि उसमें महिलाओं की क्या स्थिति है।
‘महिलाओं के समुचित विकास के बिना देश का चहुंमुखी विकास संभव नहीं’
दुनिया की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है, इसलिए जब तक उनका समुचित विकास नहीं होता, कोई भी देश चहुंमुखी विकास नहीं कर सकता। डा आंबेडकर का मानना था कि सही मायने में प्रजातंत्र तब आएगा, जब महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा, उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिए जाएंगे और घर-परिवार एवं समाज में बराबरी का दर्जा मिलेगा।
यह सच है कि शिक्षा और आर्थिक तरक्की महिलाओं को सामाजिक बराबरी दिलाने में मदद करेगी। मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में पितृसत्तात्मक मानदंडों और परंपरागत मानसिकता के कारण महिलाओं को हाशिये पर रखा गया। आजादी के बाद देश के संविधान ने यह व्यवस्था दी कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में पुरुषों एवं महिलाओं के साथ समान व्यवहार किया जाएगा, लेकिन अधिकांश राज्य विधानसभाओं में महिला सदस्यों के प्रतिनिधित्व का परिदृश्य आज भी निराशाजनक है।
वास्तव में देश की आधी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित है। विश्व आर्थिक मंच की ‘ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स-2022’ की रिपोर्ट में भारत का नाम 146 देशों की सूची में 135वें स्थान पर रहा है। यह भी सच है कि भारत समेत अनेक देशों में आज भी महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर जागरूक नहीं हैं। लिंगभेद का शिकार सबसे ज्यादा आज भी महिलाएं ही हैं। कई परिवारों में लड़कियों को इस दौर में भी पढ़ाई से दूर रखा जाता है। जो महिलाएं घर-परिवार के प्रोत्साहन और संघर्ष से किसी तरह आगे निकल जाती हैं, उन्हें कभी पदोन्नति में बाधा, तो कभी कार्यस्थल पर उत्पीड़न झेलना पड़ता है। इसके अलावा देश में महिलाओं के कुपोषण का आंकड़ा भी हैरान करने वाला है।
महिलाओं को सिर्फ वोट बैंक न समझा जाए
आज जरूरत इस बात की है कि महिलाओं को सिर्फ वोट बैंक न समझा जाए। महिला सशक्तीकरण के नाम पर उन्हें हर महीने चंद रुपए की आर्थिक मदद देने से वे सही मायनों में सशक्त नहीं हो पाएंगी। कायदे से महिलाओं को हर क्षेत्र में प्राथमिकता दी जानी चाहिए और उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना होगा। यह तभी संभव होगा, जब महिलाओं की राजनीति में हिस्सेदारी बढ़ेगी और उनसे जुड़े मसलों पर विचार-विमर्श के बाद नीत निर्माण होगा।
देश में महिलाओं की सुरक्षा का सवाल भी अहम है। आज स्थिति यह है कि महिलाएं घर और बाहर कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। महिलाओं के प्रति अपराध के मामले साल-दर-साल बढ़ रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर रोक लगाने के लिए कानून नहीं बनाए गए हैं, मगर उनका प्रभावी अनुपालन नहीं हो पा रहा है। नतीजतन पीड़ित महिलाओं को न्याय के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। इसके बाद भी यह निश्चित नहीं होता है कि उन्हें सही मायने में न्याय मिल पाएगा या नहीं। ऐसे में महिलाएं अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने से भी कतराती हैं। इस स्थिति को हर हाल में बदलना होगा।
महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़े जाने की जरूरत
दरअसल, महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़े जाने की जरूरत है। देश की राजनीति से लेकर रोजगार के मामले में महिलाओं की भागीदारी कम होने के पीछे प्रमुख कारण अब तक समाज में पितृसत्तात्मक ढांचे का मौजूद होना है। महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर राजनीतिक वर्ग का भेदभावपूर्ण रवैया चिंताजनक है। इसलिए यह अनिवार्य हो जाता है कि विभिन्न स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी का विश्लेषण किया जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि समाज में आज भी कितनी असमानता है और इसे कैसे दूर किया जा सकता है।
अगर संसद से इस असमानता को समाप्त करने की शुरुआत की जाए, तो संभवत: यह देश के लिए एक बड़ा संदेश होगा और साथ ही महिला सशक्तीकरण की दिशा में बड़ी पहल साबित होगी। हमें इस बात को समझना होगा कि पुरुषों और महिलाओं की समान भागीदारी न केवल न्याय और लोकतंत्र के लिए अहम है, बल्कि यह सुव्यवस्थित मानव अस्तित्व के लिए भी अनिवार्य है। जाहिर है, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक और प्रशासन से लेकर राजनीति तक महिलाओं को अभी व्यापक अवसर तथा सुविधाएं देना बाकी है। यह काम सरकारों को भी करना होगा और समाज को भी।
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हाल के वर्षों में शिक्षा, अनुसंधान और अन्य वैज्ञानिक उपलब्धियों के मोर्चे पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। बावजूद इसके कभी डायन बताकर तो कभी जादू-टोना करने के नाम पर महिलाओं की हत्या कर दी जाती है। पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें।
